हमीरपुर हिमाचल का कोटा 

हमीरपुर…यानी शिक्षा का हब

क्षेत्रफल के लिहाज से हिमाचल के सबसे छोटे इस जिला ने शिक्षा के क्षेत्र में नया मुकाम हासिल किया है। कुल 1103 स्कूलों में सवा लाख छात्रों का भविष्य संवारने में अहम योगदान दे हमीरपुर ने एक ऐसी क्रांति लाई कि शिक्षा के साथ-साथ खुले रोजगार के दरवाजों से होकर प्रदेश ने तरक्की की राह पकड़ ली। राजस्थान के कोटा से भी आगे निकल हमीरपुर सही मायनों में देश का भविष्य बना रहा है…   

—नीलकांत भारद्वाज    

सबसे छोटे जिला की पहचान एचपीटीयू, आईएचएम एनआईटी

अपनी सौ फीसदी साक्षरता दर और यहां खुले राष्ट्रीय स्तर के शैक्षणिक संस्थानों के चलते प्रदेश के सबसे छोटे जिले हमीरपुर ने खुद की पहचान एजुकेशन हब के रूप में बनाई है। सरकारी और निजी स्कूलों के अलावा यहां एनआईटी जैसे राष्ट्रीय औद्योगिक संस्थान, आईएचएम, पोलिटेक्निकल कालेज, एचपीटीयू सरीखे बड़े शिक्षण संस्थान इसे एजुकेशन हब बनाने में अहम रोल अदा कर रहे हैं। क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे छोटे हमीरपुर जिले में आज सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की मिलाकर कुल संख्या 1103 है। इनमें से दस सीबीएसई से मान्यता प्राप्त हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का आंकड़ा 88610 के लगभग है। ये स्टूडेंट्स सिर्फ हमीरपुर जिला से ही ताल्लुक नहीं रखते, यहां अप्पर से लोअर हिमाचल तक के लगभग सभी जिलों के बच्चे अपना भविष्य संवारने आते हैं। इनमें कुछ यहां सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले परिजनों के साथ रहते हैं, तो कुछ पीजी में। शिक्षकों की बात करें, तो जिला में चल रहे इन 1103 स्कूलों में 6257 शिक्षक सेवारत हैं।

फैकल्टी भी हाइलीक्वालिफाइड

हमीरपुर में 2010 के बाद ऐसा दौर आया, जब बहुत सारे स्कूल उन बेरोजगारों ने खोले, जो हाइलीक्वालिफाइड थे। ये स्कूल ज्यादातर शहरी क्षेत्र में थे। वे बेरोजगार खुद पढ़े-लिखे थे, तो उन्होंने टीचर भी जेबीटी, बीएड, एमएड, टेट यहां तक कि पीएचडी प्रेफर किए। इससे यहां के शिक्षा स्तर में और सुधार आया। जब शहरी स्कूलों से लगातार बच्चे बोर्ड की परीक्षाओं में मैरिट में आने लगे, तो हमीरपुर के अलावा दूसरे जिलों से भी बच्चे यहां आकर पढ़ने लगे, लेकिन 2017 के बाद देखा जा रहा है कि शहरी स्कूलों में बच्चों की फीसें ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों से काफी अधिक हैं, लेकिन शिक्षा का स्तर ग्रामीण स्कूलों में बेहतर देखा जा रहा है।

सरकारी स्कूलों में 3657 शिक्षक, प्राइवेट में 2400

सरकारी स्कूलों की बात करें, तो मौजूदा समय में 3657 शिक्षक स्कूलों में तैनात हैं। इनमें प्रिंसीपल, हैड टीचर, टीजीटी, आर्ट्स, नॉन मेडिकल, मेडिकल, जेबीटी और सी एंड वी शामिल हैं, जबकि 433 पद खाली चल रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों में बच्चों की संख्या के अनुसार शिक्षक सेवारत हैं। औसतन 2400 शिक्षक निजी स्कूलों में कार्यरत हैं। जिला मुख्यालय हमीरपुर के चार से पांच किलोमीटर के दायरे में खुले स्कूलों की बात करें, तो यह आंकड़ा 19 का है।

1980 से हुई निजी संस्थानों की शुरुआत

जानकारों की मानें तो हमीरपुर में प्राइवेट स्कूल खुलने का ट्रेंड 1980 के बाद शुरू हुआ। उस वक्त यहां प्राइवेट स्कूल खुलने शुरू हुए। 1990 तक इस ट्रेंड ने जोर पकड़ लिया। कुछ स्कूलों को छोड़कर प्राइमरी की बजाय ज्यादातर मिडल स्कूल खोलने का ट्रेंड जोर पकड़ने लगा। कहते हैं कि जब हमीरपुर से शिक्षा मंत्री बने, तो उसके बाद यहां स्कूल न केवल स्कूल खुलने का चलन बढ़ गया, बल्कि दसवीं और जमा दो के प्राइवेट स्कूल की अधिक खुले। बताते हैं कि उस वक्त भोरंज और जाहू में तो लोगों ने दुकानों में ही प्राइवेट स्कूल खोल दिए। दो से तीन हजार में शिक्षक रखे जाने लगे, लेकिन 2003-04 में जब नई शिक्षा नीति आई और स्कूल मैदान, सेफ्टी नॉर्म्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस हुआ, तो दुकानों की तरह चल रहे यहां कई स्कूल बंद हुए।

शहरी से आगे निकली गांवों की पाठशाला

एक समय था, जब हमीरपुर के खासकर शहरी क्षेत्र के स्कूलों के बच्चों के नाम मैरिट लिस्ट में आते थे। इसका कारण यह भी था कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल शटर की दुकानों में ही खोल दिए गए थे। टीचर भी वे पढ़ाते थे, जो ग्रेजुएशन करने के बाद फ्री थे और कहीं दूसरे महकमों में नौकरी के लिए प्रयासरत थे, लेकिन जब सरकार ने अपनी शिक्षा नीति में बदलाव किया, तो इन स्कूलों में भी जेबीटी, बीएड और टेट क्वालिफाइड टीचर ही रखे गए। इन्फ्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ, तो जो बच्चे कल तक शहरी स्कूलों की मैरिट में जगह बना रहे थे, ऐसे बच्चे भी ग्रामीण स्कूलों में पढ़ने लगे। हमीरपुर जिले में  जहां गत वर्ष की बात करें या इस वर्ष की बोर्ड की परीक्षाओं में ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों ने मैरिट में धाक जमाई। फिर चाहे वो बड़सर उपमंडल का लिटिल एंजल स्कूल हो या धनेटा का गीतांजलि पब्लिक स्कूल, जिसने जमा दो में एक साथ तीन मैरिट झटकीं। प्रदेश भर में प्रथम स्थान हासिल करने वाला छात्र भी इसी ग्रामीण परिवेश के स्कूल से था।

क्या कहते हैं शिक्षाविद

एनआईटी-आईएचएम एचपीटीयू से है पहचान

हमीरपुर को एजुकेशन हब बनाने में बहुत से शिक्षण संस्थानों का अहम योगदान रहा है। चाहे वे स्कूल हों या यहां की कोचिंग अकादमियां। स्कूलों के अलावा राष्ट्रीय स्तर का एनआईटी यहां है। आईएचएम यहां है। एचपीटीयू यहां है, जो हमीरपुर को शिक्षा का हब बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं

आरसी लखनपाल, शिक्षाविद

कोचिंग अकादमियों का भी जिला में रोल अहम

हमीरपुर सबसे छोटा जिला है। यह प्रदेश का केंद्र बिंदु है। यहां स्कूलों के अलावा कोचिंग अकादमियां हैं, जो इसे शिक्षा का हब बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इन अकादमियों से कोचिंग लेने वाले छात्र बड़ी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर रहे हैं

प्रेम लाल शर्मा, रि. प्रिंसीपल

प्राइमरी एजुकेशन हो सही तभी बनेगा बच्चें का बेस

हां! यह सही है कि हमीरपुर शिक्षा का हब है, लेकिन धीरे-धीरे यह नशे का हब बनने लगा है। इससे बच्चों का पढ़ाई के प्रति रुझान कम हो रहा है। दूसरा मैं यह समझती हूं कि बेहतर प्राइमरी एजुकेशन की हमेशा यहां कमी रही है, जिससे बच्चों का बेस सही नहीं बन पाता।

डा. सुमन लता, शिक्षाविद

पहचान कायम रखने के लिए काम करें संचालक

हमीरपुर ने प्रदेश भर में जो एजुकेशन हब होने की पहचान बनाई है, उसे कायम रखने के लिए इस जिला के शिक्षण संस्थानों के संचालकों को और अधिक प्रयास करने की जरूरत है। समय बदल रहा है। प्रतियोगिता का युग है, ऐसे में शिक्षकों को भी और निपुण होना होगा

मिलाप चंद, रि.प्रिंसीपल

ग्रास रूट पर सुधार की अभी भी गुंजाइश बाकी

हमीरपुर हर तरफ से अच्छी प्रोग्रेस कर रहा है। ग्रास रूट पर सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। मैं समझता हूं कि चाहे इस जिला के शिक्षण संस्थानों के शिक्षक हों, स्कूल प्रबंधन समितियां हों, सबको मिलकर काम करना होगा, ताकि यह इस जिले की गरिमा एजुकेशन हब के रूप में बनी रहे

सोमदत्त सांख्यान, रि. डिप्टी डायरेक्ट

प्राइवेट स्कूलों का आपस में कंपीटिशन

एक समय था जब सरकारी और प्राइवेट स्कूलों का आपस में कंपीटिशन होता था। फिर चाहे वो परीक्षा परिणामों की बात हो या फिर बच्चों की संख्या की, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ऐसा देखा जा रहा है कि यहां प्राइवेट स्कूलों का प्राइवेट के साथ कंपीटिशन शुरू हो गया है। अपने स्कूल को दूसरे से बेहतर दर्शाने के लिए स्कूल प्रबंधन हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। इस आपसी खींचतान का एक फायदा तो अभिभावकों को हो रहा है कि दूसरे स्कूल के बच्चे अपने स्कूल में लेने के लिए प्रबंधन स्कूल फीस में भी रियायत दे देते हैं, लेकिन इससे शिक्षा की गुणवत्ता में फर्क जरूर पड़ा है, क्योंकि स्कूल प्रबंधन का ध्यान कहीं और चला गया है।

सरकारी स्कूलों से अच्छी खबर नहीं

ज्यादातर की कंपार्टमेंट या दो-तीन बच्चे ही पास

स्कूलों की परफार्मेंस वहां के परीक्षा परिणामों से आंकी जाती है। खासकर बोर्ड परीक्षाओं में पता चलता है कि क्या चला हुआ है। इस मामले में एजुकेशन हब के सरकारी स्कूल काफी निराश कर रहे हैं। देखा गया है कि एक साथ एक ही कक्षा में कहीं 20-20 बच्चों को कंपार्टमेंट आ जाती हैं, तो कहीं 40 बच्चों की कक्षा में दो से तीन छात्र ही पास हो पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की इतनी यूनियनें बन चुकी हैं कि ज्यादातर अपनी राजनीति में ही व्यस्त रहे हैं। शायद यही वजह है कि सरकारी स्कूलों के परिणाम हर साल निराश कर रहे हैं।

इमारतें बड़ी से बड़ी खेल मैदान गायब

हालांकि शहरी क्षेत्र के स्कूलों की बात करें, तो यहां बहुत से स्कूल अभी भी शिक्षा नीति के नियम पूरा करते नजर नहीं आते। स्कूलों की बिल्डिंग तो बड़ी-बड़ी बना ली गई हैं, लेकिन बहुत से स्कूलों में खेल मैदान नहीं हैं, यदि हैं भी तो नाममात्र। कारण जगह का अभाव। शायद यही वजह है कि अब बहुत से प्रतिष्ठित स्कूल अपनी ब्रांच शहर से हटकर ग्रामीण क्षेत्रों में खोलने के लिए प्रयासरत हैं।

मैरिट लिस्ट में कम हो रहे स्टूडेंट

क्या क्वालिटी से ज्यादा क्वांटिटी पर फोकस…?

अपनी बेहतरीन शिक्षा प्रणाली के कारण हमीरपुर जिला के शिक्षण संस्थानों ने खुद की पहचान एजुकेशन हब के रूप में बनाई है। यही कारण रहा कि स्कूल शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में यहां से निकलने वाली मैरिट लिस्ट हमेशा लंबी रही, लेकिन कुछ साल से इसमें गिरावट देखी जा रही है। वर्ष 2018 में जमा दसवीं की कक्षा में जो मैरिट लिस्ट 13 बच्चों की थी, इस बार वह दस पर पहुंच गई। जमा दो के भी ऐसे ही हाल रहे, जबकि ऐसा भी समय था, जब जिला भर से 20 से 25 बच्चे भी एक कक्षा में मैरिट लिस्ट में आए हैं। इसका कारण यह भी माना जा रहा है कि स्कूलों ने क्वालिटी की अपेक्षा क्वांटिटी पर फोकस करना शुरू कर दिया है। ऐसे में कहीं न कहीं इस शिक्षा हब की बजाय बच्चे चंडीगढ़ का रुख करने लग पड़े हैं।

कितने खुश हैं अभिभावक

स्कूल की फॉर्मेलिटीज़ में जा रही आधी कमाई

शिक्षा का हब तो लगता है कि अब गुजरे जमाने की बात हो रही है। स्कूलों में इतनी ज्यादा फॉर्मेलिटी करवाई जा रही है कि कमाई का आधा बजट उसी में चला जाता है। स्कूल प्रबंधन को क्वालिटी पर भी ध्यान देने की जरूरत है                         

—राजेश ठाकुर

बड़ी-बड़ी इमारतों से नहीं होगा, रिजल्ट भी चाहिए

जहां तक एजुकेशन हब की बात है, तो गरिमा बनाए रखने के लिए सार्थक कदम स्कूलों की ओर से बढ़ाए जाने की जरूरत है। केवल बड़ी-बड़ी ईमारतें खड़ी करने से काम नहीं चलेगा। बेहतर परीक्षा परिणाम भी देने होंगे       

—सुमना देवी

टीचर्ज तो क्वालिफाइड हैं, पर हैं कितने गंभीर

जहां तक पढ़ाई की बात है, तो आज हर स्कूल के पास हाइलीक्वालिफाइड टीचर्ज हैं। चाहे वे ग्रामीण परिवेश के स्कूल हों या शहरों के। डिपेंड यह करता है कि वे बच्चों को पढ़ाने के प्रति कितने गंभीर हैं। बड़ी ईमारतों से कुछ नहीं होगा                            

 —सुशील शर्मा

गिर रहे परीक्षाओं में नतीजे कुछ तो कमी आ रही है

ऐसा नहीं है कि स्कूलों में अच्छी पढ़ाई नहीं हो रही। पढ़ाई तो है, लेकिन जिस तरीके से पिछले कुछ साल से रिजल्ट आ रहे हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगने लगा है कि कहीं कुछ कमी रह रही है। स्कूल प्रबंधन को चाहिए कि उस कमी को दूर करें        

—अनिता कुमारी

अब सरकारी स्कूलों में सुविधाएं हैं, पर रिजल्ट…

हमीरपुर जिला के सरकारी स्कूलों के टीचर प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों से ज्यादा क्वालिफाइड हैं, लेकिन जो रिजल्ट सरकारी स्कूलों के आते हैं, उन्हें देखकर लगता है कि वे ज्यादा ध्यान पढ़ाने की ओर नहीं देते, जबकि सरकारी स्कूलों में आज हर तरह की सुविधाएं हैं   

 —रमेश कुमार, अभिभावक

You might also like