अब एक देश, एक कानून

Sep 16th, 2019 12:04 am

यह सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की टिप्पणी है कि कई बार कहने के बावजूद देश में समान नागरिक संहिता लागू नहीं की गई है। 1956 में हिंदू कोड बिल के पारित होने और कानून बनने के 63 लंबे सालों के बाद भी समान नागरिक संहिता नहीं है, जबकि संविधान के अनुच्छेद 44 और राज्यों के नीति निर्देशक सिद्धांतों में समान नागरिक संहिता की बात कही गई है, लिहाजा यह धर्म, मजहब का मामला नहीं है, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों और अधिकारों का मामला है। सर्वोच्च अदालत के एक न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद सवाल किया जा सकता है कि क्या देश में समान नागरिक संहिता, यानी एक देश, एक कानून का वक्त आ गया है? गोवा के उदाहरण को शानदार और अनुकरणीय मानते हुए, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार क्यों न पहल करे? इस मुद्दे को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और तीन तलाक कानून से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। यह देश के 137 करोड़ से ज्यादा नागरिकों की अस्मिता, आस्था और जीवन-शैली, संस्कृति से जुड़ा बेहद संवेदनशील मुद्दा है। बेशक आरएसएस, जनसंघ से लेकर भाजपा तक के संकल्प दस्तावेजों में समान नागरिक संहिता का उल्लेख रहा है, बेशक यह संघ परिवार की प्रतिबद्धता भी लगती रही है, लेकिन यह सिर्फ  उनकी बपौती का मुद्दा भी नहीं है। दरअसल टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय की ओर से आई है। यह कोई दखल या निर्देश नहीं है, लेकिन न्यायाधीश का सवाल बेहद गंभीर है। अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम सरीखे विकसित देशों में बुनियादी तौर पर समान नागरिक संहिता लागू है। उसके नाम भिन्न हो सकते हैं और वह संघीय स्तर पर लागू की गई है, लेकिन सामूहिकता में अलग-अलग कानून नहीं हैं। न्यायाधीश ने गोवा को उदाहरण माना है, क्योंकि वहां पुर्तगीज सिविल कोड, 1867 लागू था। गोवा पर पुर्तगाल का कब्जा था, जिसे 1961 में मुक्त कराया गया, लेकिन भारतीय संसद और सरकार ने उस सिविल कोड को बरकरार रखा। उसके मुताबिक, गोवा में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार से संबद्ध कानून एक जैसे हैं। जिनकी शादी पंजीकृत है, वे बहुविवाह नहीं कर सकते। लेकिन वहां हिंदू विवाह कानून लागू नहीं है। गौरतलब यह भी है कि हमारे देश में 6700 से अधिक वर्ग और 4000 से ज्यादा जनजातीय कबीले हैं। उनके धर्म, कायदे-कानून आदि अलग-अलग हैं। देश भर में ऐसा ही जारी रहा, तो संविधान और कानून के तौर पर अराजकता फैलना तय है। वैसे भी मुस्लिम, ईसाई और पारसियों के अपने-अपने पर्सनल लॉ हैं। सवाल है कि देश में एक ही विधान और एक ही कानून की स्थिति क्यों नहीं लागू की जा सकती? यह हिंदू बनाम मुसलमान अथवा हम भारत के लोग बनाम भारत के धर्म का मामला भी नहीं है। कृपया इसे वह सांप्रदायिक रंग मत दो। इस मुद्दे पर संविधान सभा की बैठकों में भी हमारे पूर्वजों ने विमर्श किया था, तभी संविधान में प्रावधान जोड़ा गया था। अब देश को आजाद हुए सात दशक बीत चुके हैं। संविधान को लागू हुए भी कमोबेश इतना ही वक्त हो चुका है। अब चिंतन और चर्चा करनी चाहिए कि क्यों न समान नागरिक संहिता की व्यवस्था लागू की जाए? इससे धु्रवीकरण की राजनीति पर लगाम लगाई जा सकेगी और महिलाओं की स्थितियों में भी सुधार आएगा। बेशक व्यक्ति-विशेष की अस्मिता और जीवन-शैली बरकरार रहे, लेकिन कुछ कानून सामूहिक होने चाहिए। विधि आयोग ने इस पर एक जनमत संग्रह कराया था। ज्यादातर मुसलमानों ने बदलाव का विरोध किया और इसे निजी, मजहबी मामलों में हस्तक्षेप माना। उसी आधार पर आयोग ने केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी थी, लेकिन अब इसे नए सिरे से संसद में बहस के जरिए ग्रहण किया जाए। बिना पूर्वाग्रह के इस पर विमर्श किया जाए और उस विमर्श को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया जाए। इसके तमाम पक्षों के खुलासे किए जाएं और विसंगतियों को दूर करने की जरूरत समझाई जाए। तभी समान नागरिक संहिता का कोई रास्ता निकल सकता है।

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