उप चुनाव की कमजोर मिट्टी

धर्मशाला विधानसभा उप चुनाव के पूर्वाभ्यास में दोनों प्रमुख पार्टियां एक तरह से कमजोर होने की प्रतिस्पर्धा कर रही हैं और अगर ताजातरीन घटनाक्रम को देखें, तो यह स्पष्ट है कि ‘तेरे सिवा भी कहीं पनाह भी भूल गए, निकल के हम तेरी महफिल से राह भूल गए’। भाजपा की कंदराओं में घूम रहा पत्र बम और उसकी निगहबानी में जांच का सफर अपने ही राहों पर पत्थर बरसा रहा है, तो दूसरी ओर कांग्रेस के मनोनीत प्रदेशाध्यक्ष के खिलाफ शुरू हुआ जेहाद सारे समीकरणों की ईंट से ईंट बजाने को आमादा है। उप चुनाव की धर्मशाला में हर मुसाफिर टिकट को तलबगार है, तो भाजपाई गमले की मिट्टी की उर्वरता में एक साथ कई नेता पैदा हो गए। जश्न-ए-बारात में शिरकत करती भाजपा के लिए बीसियों प्रत्याशियों की दौड़ में किसी एक को छू पाना कठिन है, तो संजीदगी से यह परख पाना भी आसान नहीं कि कौन सा चेहरा अधिक दमदार है। उप चुनाव की कमजोर मिट्टी पर राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का रोपण दोनों तरफ से भंवर खड़े कर रहा है, तो संगठनात्मक क्षमता में पार्टियों का नेतृत्व फौरी तौर पर हुक्म और हिम्मत की मझधार पर खड़ा है। भाजपा के पूर्व मंत्री के खिलाफ जांच का हवाला लें, तो ऐसी सियासत का निवाला निगलना मुश्किल है। दूसरी ओर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर के गिरेबां में पार्टी ने झांकना शुरू किया, तो पदासीन होने का अर्थ, शंकाओं की मलिनता में कसूरवार होने लगा। धर्मशाला के सशक्त उम्मीदवार सुधीर शर्मा की पीठ में छुरा कौन घोंप रहा है, जो अब खुन्नस की दीवारें चीख उठीं। प्रदेश कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर राष्ट्रीय सचिव सुधीर शर्मा ने सार्वजनिक तौर पर कुछ जाहिर किया है, वह भाजपा को सुकून दे सकता है या विपक्षी पार्टी के मंसूबों का रेत बहा देगा। सीधे और तीखे आरोपों की जद में राठौर की अस्वीकार प्रणाली पर उड़ा गर्द इतनी आसानी से नहीं बैठेगा, जबकि इसका सीधा असर धर्मशाला उप चुनाव में पार्टी संभावनाओं को क्षीण ही करेगा। राजनीतिक असंतुलन की पैमाइश में उप चुनाव की बिसात किसके लिए टेढ़ी खीर साबित होती है, इससे पहले यह तय है कि दोनों तरफ से अंदरूनी टकराव की मार है। कांग्रेस अपने गढ़े मुर्दों को उखाड़कर चुनावी श्मशान की राह देख रही है, तो भाजपा पुनः मोदी से मिले अल्लाहदीन के चिराग पर पुनः आश्रित है। स्थानीय और बाहरी की तफतीश में भाजपा ने चूं चूं का मरब्बा तैयार कर लिया और इसलिए यहां जन्मतिथि से जन्म स्थान तक पर्चे बंट रहे हैं। किसकी टांग कौन खींच रहा है और किसके बाजू में पार्टी बैठ रही है, इसका पता खुद भाजपा को अगर यकीन के साथ नहीं है तो अंतिम समय में कमजोर पालकी पर चुनावी दूल्हे को बैठाना कठिन हो जाएगा। यहां प्रश्रय और पालकी के बीच मुकाबला है। यानी कोई बड़े नेताओं, संघ परिवार या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पसंद है, तो किसी के समीकरणों में जाति या वर्ग की संज्ञाएं समाहित हैं। मोहरों की दलाली में राजनीति में चल रहा शह और मात अगर अपने-अपने दल के भीतर तक होता रहेगा, तो कोई सिकंदर नहीं, नीलांबर ही साबित होगा। जाहिर है उप चुनाव के इर्द-गिर्द सियासत की धमालचौकड़ी में सही उम्मीदवार के चयन में दोनों पार्टियां आहत हैं। धर्मशाला जैसे अति साक्षर तथा मैट्रो संस्कृति से प्रभावित प्रबुद्ध वर्गीय मतदाताओं के सामने दोनों पार्टियों की ओर से तैयार हो रही अगंभीर पृष्ठभूमि से यही प्रतीत होता है कि कमजोर उम्मीदवारों की पैरवी करते हुए, पूर्वाग्रह से ग्रसित माहौल परवान चढ़ रहा है।

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