कांगड़ा के देश भक्तों ने अंग्रेजों को निकालने की कई योजनाएं बनाई

समस्त कांगड़ा क्षेत्र में देश भक्त क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को पहाड़ों से निकाल फेंकने की अनेक योजनाएं बनाई। जसवां, गुलेर, हरिपुर, सुजानपुर, नादौन, कांगड़ा, धर्मशाला, नूरपुर, पठानकोट और ऊना में हजारों लोग स्वाधीनता संग्राम की इस प्रथम लड़ाई में कूदने के लिए तत्पर थे…

गतांक से आगे …

प्रताप चंद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर क्रांति की योजना की सफलता के लिए भरसक प्रयत्न करते रहे। कटोच थानेदार ने सरकारी अफसरी का लाभ उठाकर जन-जागृति में बहुत सहयोग दिया। उन्हीं दिनों  अंग्रेज सकरार ने राजा प्रताप चंद से अन्य स्थानों पर विद्रोह को दबाने के लिए सैनिक सहायता नहीं दी। इससे अंग्रेजों को प्रताप चंद की क्रांतिकारी योजना की जानकारी प्राप्त हुई। डिप्टी कमिश्नर कांगड़ा ने गुप्तचर भेजकर प्रताप चंद की गतिविधियों पर कड़ल जानकारी प्राप्त हुई। डिप्टी जॉन लेक के आदेश पर टिहरा के क्रांतिकारी थानेदार को शाहपुर भेजा गया और उसके स्थान पर एक योजना की पूरी सूचना अंग्रेजी अफसरों तक पहुंचाई। इस प्रकार इस विस्फोटक विद्रोह को आरंभ में ही दबा दिया गया। समस्त कांगड़ा क्षेत्र में देश भक्त क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को पहाड़ों से निकाल फेंकने की अनेक योजनाएं बनाई। जसवां, गुलेर, हरिपुर, सुजानपुर, नादौन, कांगड़ा, धर्मशाला, नूरपुर, पठानकोट और ऊना में हजारों लोग स्वाधीनता संग्राम की इस प्रथम लड़ाई में कदूने के लिए तत्पर थे। शिमला, अंबाला, लाहौर और दिल्ली से क्रांतिकारी संगठनों और देशी सेना के अनेक गुप्तचर, साधु, संत, फकीर, भिखारी आदि के रूप में यहां आकर देशी सेना, शासकों और जनसाधारण तक क्रांति का संदेश व इससे संबंधित योजनाओं का हवाला देकर जागृति पैदा करते रहे। इसी बीच पटियाला, जालंधर, मुलतान और लाहौर में इन फकरी गुप्तचरों को पकड़ा गया और जेलों  में बंद कर दिया गया। डाक द्वारा भेज गए क्रांति के संदेश  वाले पत्र भी पकड़े गए। फलस्वरूप, 23 मई, 1857 ई. से पंजाब के ज्युडिशियल कमिश्नर, रॉबर्ट मांटगोमरी के आदेशानुसार पूरे कांगड़ा क्षेत्र में साधुओं, फकरीरी, भिखारियों और पर्यटकों का आना-जाना बंद कर दिया गया।

नदी के नौ-घाटी पहाड़ी देरों और मुख्य मार्गों चौकियां स्थापित कर नाका गार्डज नियुक्त किए गए और बिना प्रवेश पत्र के किसी के अंदर आने की अनुमति नहीं दी जाती। मंदिरों , मस्जिदों और गुरुद्वारों, फकीरों, पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को अनेक यातनाएं सहन करनी पड़ी। अंग्रेज सरकार के कड़ेसुरक्षा उपायों के कारण क्रांतिकारियों की गतिविधियों में गंभीर रूकावट आई और बाहरी स्थानों से संबंध टूट गया। इसी दौरान 7-8 जून 1857 ई. को जालंधर में ‘ 36-नेटिव इनफैन्ट्री’ और 61-नेटिव इनफैन्ट्री ने विद्रोह कर दिया। इसी विद्रोह के कारण कांगड़ा में डिप्टी कमिश्नर, मेजर आर टेलर ने सुरक्षा के और कड़े प्रबंध किए। 12 जून, 1857 ई. को सतलुज, रावी और ब्यास नदी के फाटकों को बंद कर दिया गया और नौकाएं नष्ट कर दीं ताकि जालंधर के क्रांतिकारी सैनिक कांगड़ा में प्रवेश न कर  सकें। – क्रमशः   

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