कैद के भीतर नया उजाला

शिमला में राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में कैदियों को रोजगार से जोड़ने की परिकल्पना पर विमर्श की सबसे अहम कड़ी यही है कि जेलों में दो सौ करोड़ का कारोबार हो रहा है। हिमाचल का अपना रिकार्ड इस दिशा में अग्रणी तथा प्रेरणादायक रहा है और यही वजह है कि प्रदेश की जेलों में कैदियों की वार्षिक आय का आंकड़ा प्रति व्यक्ति औसतन छयालीस हजार रुपए तक है। जेलों के  जरिए जीवन की तबाह बसंत को हासिल करना किसी यज्ञ के समान है और इसलिए जब हिमाचल कैदियों की कारोबारी मेहनत से साढ़े तीन करोड़ जुटा लेता है, तो डीजी जेल, सोमेश गोयल सरीखे अधिकारी के पास आंकड़ों की सफलता का हिसाब सबसे बड़ा पुरुषार्थ बन जाता है। जीवन को जेल के कठोर वातावरण से अलहदा सार्थकता तक ले जाना ही अगर ध्येय बन जाए, तो यह संभव है कि मानव प्रवृत्ति खुद को नए पैमाने पर बुनना शुरू कर दे। हिमाचल की जेलें न तो अपराधियों से लबालब हैं और न ही अपराध के कदम प्रदेश को खूंखार बनाते हैं। प्रायः आवेश के आगोश में घृणित परिणति हुई या आयातित अपराध की संगत में हिमाचल का ‘कोई’ बिगड़ गया। यह दीगर है कि कानूनी तौर पर कुछ राहों के अपमान से भरे माहौल को देखें, तो नशे के आलिंगन में अपराधियों की एक नस्ल कैद में पहुंच रही है। बहरहाल जुर्म के कब्जे में अपराधियों को मिली कैद से पश्चाताप का सफर अगर अंतरात्मा जगा रहा है, तो मेहनत की नई मंजिलों पर काम की पैमाइश का जज्बा तैयार हो रहा है। हिमाचल की कुछ जेलों के दरवाजे अगर हर रोज कैदियों को जीवन के सन्नाटे से बाहर नए मकसद की रोशनी की तरफ रवाना करते हैं, तो यह स्वयं को सिद्ध करने का आश्वासन है। जेल से जॉब तक पहुंचे कैदियों ने दिहाड़ी का अर्थ बदला है, तो ऐसी उत्पादकता का मूल्य अर्जित लाभांश से भी कहीं अधिक है। ये सिक्के जिंदगी को बदलने के पहिए हैं और जहां अतीत से बाहर निकलने का श्रम, भविष्य की साधना को अर्पित है। हिमाचल के जेल प्रशासन ने तरह-तरह के प्रयोग करते हुए कैदी जीवन को समाज से आंख मिलाने का अवसर और मेहनत को मेहनताना हासिल करने का गौरव प्रदान किया है। खाने की थाली, बेकरी, फर्नीचर और शाल उत्पादन तक कैदियों के हुनर को तराशना, वास्तव में जेल के भीतर मानव क्षमता की खिड़कियां खोलने सरीखा इंतजाम है। नित नए प्रयोग करता हिमाचल का जेल प्रशासन अगर फूलों की नर्सरियां या वाहन धुलाई से पेट्रोल पंप संचालन तक कैदियों की प्रतिभा निखार रहा है, तो यह कैद के भीतर का सुकून है या पश्चाताप की जीवटता, जो हर साल आमदनी के जरिए अपना संगीत रच रहा है। ऐसे में कल प्रस्तावित नालागढ़ जेल में जीवनयापन के कौशल को कैदी अपने कर्त्तव्य की मशाल थामकर, औद्योगिक उत्पादन में निखारते हैं, तो इस सफर के वे खुद ही सारथी बनेंगे। जेल जैसे कठोर व अप्रिय शब्द से नई जिंदगी के दीप प्रज्वलित हो रहे हैं और आशाओं की किश्ती में नया किनारा दिखाई दे रहा है, अतः इस अभियान ने कहीं न कहीं अछूत मंजर को इनसानी स्वीकार्यता का आवरण सौंप दिया है।

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