चुनाव की तलाश में सियासत

By: Sep 11th, 2019 12:05 am

सियासत फिर हिमाचल के आकाश पर बिजली की तरह अपनी चमक, रोशनी व खतरे बता रही है। दो उपचुनावों की वजह और बही-खातों में भाजपा की चुनौती की आपूर्ति का रिकार्ड खड़ा है। धर्मशाला व पच्छाद से भाजपा को अपने विधायकों की वापसी का इंतजार है, तो बदलते समीकरणों में दो विधानसभा क्षेत्रों सरकार और संगठन की समीक्षा भी होगी। ऐसे में केंद्र के सौ दिन अगर भाजपा के जिस्म और जान का प्रदर्शन है, तो धर्मशाला और शिमला में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से अनुराग ठाकुर तक के संबोधनों को मुट्ठी में बंद करके पार्टी चुनाव में उतर रही है। पच्छाद को महज विधानसभा क्षेत्र मान भी लें, लेकिन धर्मशाला सियासत का ऐसा क्षेत्रफल है, जहां सरकार की दो साल में अर्जित ऊर्जा का हिसाब होगा। यह इसलिए भी कि भाजपा के लिए सर्वानुमति से उम्मीदवार का चयन बर्र के छत्ते से किसी एक को सुरक्षित बाहर निकाल लाने जैसा है। उम्मीदवारों की पैदाइश और पैमाइश को देखें तो तरफदारियों के मंच पर तशरीफ रखे हुए कई नेता, सियायत की अपनी संपत्ति नहीं खोना चाहेंगे। बहरहाल उम्मीदवारों से पहले जो पांत बिछी है, वहां चार नेताओं की संगत में सरकार की पतवार भी रखी है। धर्मशाला में सत्ता की रणनीति में जातीय समीकरणों के चार नेताओं का इंकलाब कम जोशीला नहीं और इस लिहाज से भाजपा का चाकचौबंद होना बताता है कि  उपचुनाव का सियासी महत्त्व विधानसभा में विधायक भेजने से कहीं ज्यादा है। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए दो उपचुनाव नए अवसर दे रहे हैं, लेकिन इनमें धर्मशाला में विकास का मुद्दा पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा के रिपोर्ट कार्ड के साथ चस्पां है और उन हालात का भी स्पष्टीकरण बनेगा, जहां सत्ता के बदलते आसमान ने विकास की जमीन चुरा ली। भाजपा के वादों की फेहरिस्त चाहे कितनी लंबी हो जाए, पिछली सरकार ने इस विधानसभा क्षेत्र में जो कार्य शुरू किए, उनकी समीक्षा ही नया मताधिकार बनेगी। जाहिर है यह मुकाबला कांग्रेस के बजाय सुधीर व किशन कपूर के कार्यकाल की पड़ताल करेगा, जबकि भाजपा की उम्मीदवारी में किशन कपूर, शांता कुमार के उत्तराधिकार का फैसला होना है। सीधे तौर पर सरवीण चौधरी के विभागीय कौशल और वर्षों से लटकीं स्मार्ट सिटी परियोजनाओं की कहानी चुनावी दीवारों पर पढ़ी जाएगी। इन्वेस्टर मीट के आयोजन की बढ़ती जिम्मेदारी में उद्योग मंत्री विक्रम सिंह का नया कैनवास कौन सी तस्वीर पेश करता है या ट्राइबल रंग में उतर कर हंसराज का इंद्रधनुष अपना आसमान कैसे प्रकट करता है, यह देखना होगा। रमेश धवाला पुनः कांगड़ा की राजनीति में हस्ताक्षर करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के संपर्कों में अपनी ताल बजा रहे हैं, तो यह  एक बड़ा राजनीतिक इश्तिहार होगा। भाजपा के इरादे जीत से आगे कांगड़ा के नसीब से जुड़ रहे हैं, तो जिला में पार्टी के अग्रणी नेताओं के अस्तित्व का भी फैसला होगा। सियासत के जिस दुर्ग में कांगड़ा का अतीत ही भाजपा का अस्तित्व था, वहां अब शिखर पर एक नई तस्वीर चाहिए। राजनीति को सदा कांगड़ा चाहिए और इसके लिए भाजपा धर्मशाला में हर सूरत ध्वजारोहण करना चाहेगी। बतौर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के हिस्से में लोकसभा चुनाव की खुशखबरी भले ही हो, लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले दो उपचुनावों की बिसात सरकार के प्रदर्शन और संगठन के सेतु से सफलता से गुजर जाने की परीक्षा रहेगी। आक्रामक सत्ता के सिपाहियों के आगे कांग्रेस खुद को इससे बेहतर ढंग से नहीं टटोल सकती। यह इसलिए कि कांगड़ा भाजपा के बीच सोशल मीडिया में चल रही चिट्ठियों का खुमार है, तो कांग्रेस का पिछले चुनाव का इतिहास बीमार है। 

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