चुनाव रोकना अलोकतांत्रिक

विनय छींटा

लेखक, शिमला से हैं

छात्र संघ चुनाव देश के अनेक बड़े विश्वविद्यालयों में बंद है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में भी सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्णय दे दिया है कि चुनाव नहीं होंगे। बल्कि राज्य के मुख्य छात्र संगठन एबीबीपी, एनएसयूआई, एसएफआई तीनों इसके समर्थन में हैं। प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव केवल छात्र समस्याओं को सुलझाने मात्र का जरिया नहीं हैं। प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव का महत्त्व बहुत ज्यादा है। राजनीतिक समाजीकरण को बढा़वा इस प्रक्रिया द्वारा मिलता है। अन्यथा देश की युवा पीढ़ी हमारी राजनीतिक व्यवस्था के कार्य करने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अनजान है…

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा है। राजनीतिक सत्ता के लिए स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बहुदल व्यवस्था और लोकतंत्र में जरूरी है। आज समस्त दुनिया में लोकतंत्र की सार्थकता पर चर्चा हो रही है। क्या लोकतंत्र वास्तव में सबसे बेहतर शासन प्रणाली है? या मौजूदा विकल्पों में लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन प्रणाली है? या लोकतंत्र का क्या विकल्प हो सकता है? अमरीकी लेखक फूंकूंयामा ने तो उदार लोकतंत्र को सबसे बेहतर शासन प्रणाली घोषित कर दिया है। लेकिन उसका पुरजोर विरोध हुआ। फूंकूंयामा का तर्क था कि उदार लोकतंत्र में वे सब गुण हैं जिनकी तलाश मानव ने आज तक की। वो श्रेष्ठ मिल चुका है। और अब सैद्धान्तिक संघर्ष खत्म हो चुका है। लेकिन जमीनी सच्चाई क्या है, यह अभी भी देखना है।

भारत में लोकतंत्र के प्रति सम्मान है। इंदिरा गांधी को छोड़कर सभी ने लोकतंत्र की रक्षा में अपनी भूमिका प्रदान की है। आपातकाल के बाद देश की जनता ने साफ कर दिया कि लोकतंत्र में ही देश की जनता की गहरी आस्था है। सवाल यह है कि असल में देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का शिक्षण कहां से  होता है? और व्यवस्था के प्रति सम्मान कहां से जागृत होगा। तो शिक्षण सस्थानों का नाम सबसे आगे होगा। छात्र संघ चुनाव देश के अनेक बड़े विश्वविद्यालयों में बंद है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में भी सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्णय दे दिया है कि चुनाव नहीं होंगे। बल्कि राज्य के मुख्य छात्र संगठन एबीबीपी, एनएसयूआई, एसएफआई तीनों इसके समर्थन में हैं। प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव केवल छात्र समस्याओं को सुलझाने मात्र का जरिया नहीं हैं। प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव का महत्त्व बहुत ज्यादा है।

राजनीतिक सामाजिकरण को बढा़वा इस प्रक्रिया द्वारा मिलता है। अन्यथा देश की युवा पीढ़ी हमारी राजनीतिक व्यवस्था के कार्य करने  की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अनजान है। राजनीतिक व्यवस्था कैसे कार्य करती है। लोकतंत्र कैसे मजबूत किया जा सकता है। छात्र राजनीति का इसमें विशेष महत्त्व है । भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में शिक्षण संस्थानों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से छात्रों को दूर रखना कहां तक उचित है। इससे देश की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति युवा वर्ग में अराजक माहौल और अंधविश्वास पैदा हो रहा है। छात्र संघ चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण की नर्सरी है। इसको केवल छात्र हितों तक कैंपस राजनीति तक देखना छात्र राजनीति के उद्देश्य से न्याय नहीं है । छात्र राजनीति का आधार तप है। जमीनी हकीकत है। आज देश के राष्ट्रीय स्तर के जितने बड़े नेता हैं वे छात्र राजनीति से निकले चेहरे हैं । इस बात को नहीं भूलना चाहिए। भारत में व्यवस्था के प्रति आस्था लोकतंत्र के प्रति गहरा चिंतन विश्वविद्यालय में होता है। देश की शासन प्रणाली को कैसे बेहतर किया जा सकता है। इसका चिंतन छात्र कर रहे हैं। लेकिन अगर उनको व्यावहारिक पक्ष से दूर रखा जाए तो परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं होंगे। इस बात को देखना पड़ेगा। छात्र संघ चुनाव के पीछे का आधार बहुत विस्तृत है। यह स्पष्ट है। समाज केंद्रित नेतृत्व की नींव यही पड़ती है। राजनीतिक संस्कृति का विस्तार यही पलता है। यह भी सच्चाई है। राजनीतिक समाजीकरण के क्षेत्र में भी छात्र संघ चुनाव का बड़ा योगदान है।

 समय- समय पर सरकारों ने तर्क पेश किया है कि छात्र राजनीति में हिंसा के कारण चुनाव बंद किया जाता है। यह तर्क सरकार का कुछ हद तक सही है। लेकिन देश की राजनीति में कितनी राजनीतिक हत्याएं होती हैं उस पर सवाल नहीं होते यह उचित तर्क नहीं है कि हिंसा से बचने के लिए आप राजनीतिक सामाजिकरण जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों को दरकिनार करें। राजनीतिक संस्कृति जैसे पक्षों की बलि केवल छुटपुट हिंसा के डर से दो। इसके दूरगामी परिणाम कैंपस हिंसा से ज्यादा घातक हैं। इस बात को सरकारों को समझना पड़ेगा। सत्ता परिवर्तन हुआ बीजेपी सरकार बनी लेकिन छात्र और शिक्षा क्षेत्र के मुख्य मुद्दे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। भाजपा सरकार साफ  अपने वादे से मुकरी, यह बहुत दुखद है कि वास्तव में छात्र किन पर भरोसा करें। क्या केवल राजनीतिक दलों को शिक्षा क्षेत्र के मुद्दों से फर्क नहीं पड़ता ? या सरकारें अपने विरोध में कोई स्वर नहीं सुन सकती हैं? यह बड़ा सवाल है।

सवाल यह भी है कि छात्र राजनीति से निकले चेहरे बड़ी राजनीति में भी सफल हुए हैं, इसके अनेक तर्क हैं जैसे विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भी हिमाचल विश्वविद्यालय में छात्र नेता रहें। हिमाचल कांग्रेस के अध्यक्ष कुलदीप राठौर भी छात्र नेता रहे। प्रदेश में एक मात्र सीपीआईएम के विधायक राकेश सिंघा भी छात्र नेता रहे हैं। हर राजनीतिक दल की शक्ति राजनीति में  विश्वविद्यालय से निकले छात्र नेता विराजमान हैं। सच्चाई है तो असल जिम्मेदार क्या वर्तमान पीढ़ी है या लंबे समय से चली आ रही छात्र राजनीति की परंपरा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। लेकिन राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक सामाजिकरण की दृष्टि से प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव बहुत बड़ा महत्त्व रखता है। छात्र राजनीति का योगदान वास्तव में अनदेखा हुआ है। इस सोच को बदलना पड़ेगा। हालांकि इसके नकारात्मक पक्ष भी हैं लेकिन उसका स्थायी समाधान चुनाव बंद करवाना नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर व्यापक सुधार है।

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