जूडो के द्रोणाचार्य जीवन शर्मा

भूपिंदर सिंह

राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक

अंब उपमंडल के पोलिया पुरोहिता गांव के जीवन शर्मा आज देश के सबसे बड़े प्रतिष्ठित प्रशिक्षकों के पुरस्कार द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित हैं। इनके पिता भारतीय सेना में नौकरी में होने के कारण इनकी प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर में हुई। बाद में चिंतपूर्णी से मैट्रिक करते समय एक दिन चचेरे भाई प्रवीण शर्मा, जो हिमाचल के खेल मंत्री भी रह चुके हैं, के साथ खेलते हुए उनके शारीरिक कौशल से प्रभावित होकर भविष्य में जूडो कराटे में अपने को मजबूत करने का संकल्प लिया…

खेलों में व्यक्तिगत उपलब्धियों के ताज हिमाचल ने पहने पर उसमें अधिकतर हिमाचल का सहयोग कहीं नजर नहीं आया। प्रतिभाएं अपने दम पर चमकी हिमाचल व देश को नाम दिया, मगर हिमाचल में उन्हें अधिकतर न परिचय मिला और न प्रश्रय। ऊना जिले के अंब उपमंडल के पोलिया पुरोहिता गांव के जीवन शर्मा आज देश के सबसे बड़े प्रतिष्ठित प्रशिक्षकों के पुरस्कार द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित है। इनके पिता भारतीय सेना में नौकरी में होने के कारण इनकी प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर में हुई। बाद में चिंतपूर्णी से मैट्रिक करते समय एक दिन चचेरे भाई प्रवीण शर्मा जो हिमाचल के खेल मंत्री भी रह चुके हैं, के साथ खेलते हुए उनके शारीरिक कौशल से प्रभावित होकर भविष्य में जूडो कराटे में अपने को मजबूत करने का संकल्प लिया।

बाद में पता चला कि यह दोनों अलग-अलग हैं कराटे एक कला है और जूडो एक ओलंपिक खेल। नान-मेडिकल  की पढ़ाई के लिए राजकीय महाविद्यालय हमीरपुर में प्री यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, मगर एक वर्ष बाद डीएवी कालेज होशियारपुर से अपनी स्नातक डिग्री के लिए पंजाब को अपना बना लिया। वहीं पर 1978 में तत्कालीन जूडो प्रशिक्षक स्वर्गीय वीएन गौड के प्रशिक्षण में जूड़ो खेल की बारीकियों को सीखना शुरू किया। खेल खून में ही विरासत में मिला है। पिता जी सेना में प्रशिक्षण प्राप्त कर मुक्केबाजी में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। दोनों छोटे भाइयों ने भी जूडो को अपनाया, दोनों ने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते हैं। छोटा भाई हिमाचल प्रदेश खेल विभाग में जूडो प्रशिक्षक कुलदीप शर्मा आजकल ऊना में अपनी सेवाएं दे रहा है।

1983-84 में राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान पटियाला से प्रशिक्षण में कोचिंग डिप्लोमा प्रथम श्रेणी में पास कर प्रशिक्षक की नौकरी कर ली। 1985 में दिव्य शर्मा से शादी की वह भी जूडो प्रशिक्षक है। आजकल वे भारतीय खेल प्राधिकरण के भोपाल केंद्र में जूडो की प्रमुख प्रशिक्षक हैं। इस तरह पूरे घर-परिवार में जूडो ही जूडो है। 1988 में बंगलूर के खेल छात्रावास में जूडो खिलाडि़यों को प्रशिक्षण शुरू किया। 2000 में तबादला राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान पटियाला हो गया। यहां पर शिक्षण विंग के साथ-साथ उत्कृष्ट प्रशिक्षण केंद्र में भी प्रशिक्षण शुरू किया। 2016 तक शिक्षण विंग के मुख्य प्रशिक्षक रहे इस अवधि 2001 में टीएफ विश्वविद्यालय वुडापेस्ट से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी का मान्यता प्राप्त तीन महीने का जूडो प्रशिक्षण में कोर्स पास किया। 2002 में टोकियो से कोडोकान अंतरराष्ट्रीय संस्थान में एक महीने का जूडो प्रशिक्षण में क्लीनिक लगाया तथा चार डान ब्लैक वैल्ट डिग्री प्राप्त की। खेल मनोविज्ञान, खेल प्रशिक्षण विज्ञान आदि पर दर्जनों सेमिनार लगवाए और स्वयं भी भाग लिया। 1987 में अंतरराष्ट्रीय जूडो फेडरेशन के तकनीकी अधिकारी की परीक्षा ए ग्रेड में पास कर कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिताओं में रैफरी की भूमिका भी निभाई। राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान से 2016 में तबादला भारतीय खेल प्राधिकरण के प्रशिक्षण केंद्र भोपाल हो गया और 31 जुलाई, 2017 को जीवन शर्मा ने स्वेच्छा से भारतीय खेल प्राधिकरण को अलविदा कहकर सेवानिवृत्ति ले ली। 20 वर्ष तक भारतीय खेल प्राधिकरण के शिक्षण विंग में मुख्य प्रशिक्षक रहे जीवन शर्मा 1996 से लेकर 1998 तक भारतीय जूडो टीम के मुख्य प्रशिक्षक भी रहे।

1987, 1988 तथा 2002  में कनिष्ठ भारतीय जूडो टीम के राष्ट्रीय प्रशिक्षक रहे जीवन शर्मा 2002 से लेकर 2006 तक तथा 2012 से लेकर 2013 तक भारतीय महिला जूडो टीम के मुख्य प्रशिक्षक भी रहे। 2005 में पाकिस्तान की महिला जूडो टीम को भी प्रशिक्षण दिया। भारतीय टीम का एशियाई, राष्ट्रमंडल व विश्व प्रतियागिता में प्रतियोगिता पूर्व में प्रशिक्षण तथा प्रतियोगिता में प्रशिक्षक की भूमिका कई जगह निभाई। मुख्य प्रशिक्षक के रूप में भारतीय टीम प्रतिनिधित्व विश्व जूडो प्रतियोगिता पेरिस 1997, ओसग्का 1995 व कैरो 2003 में किया। ओलंपिक खेलों में भाग लेना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात है। जीवन शर्मा ने राष्ट्रीय प्रशिक्षक के रूप में 1996 एरलांटा 2008 बिजिंग में भाग लिया तथा 2012 लंदन ओलंपिक में भारत के मुख्य जूडो प्रशिक्षक के रूप में प्रतिनिधित्व किया। लगभग 300 जूडो के राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों को प्रशिक्षण दिया तथा उनमें से 160 ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए पदक जीता। आजकल यह प्रतिभावान प्रशिक्षक इंस्पायर खेल संस्थान नई दिल्ली में जूडो प्रशिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं 2017 से दे रहे हैं। लगभग चार दशकों के जूडो प्रशिक्षण अनुभव वाले इस द्रोणाचार्य अवार्डी प्रशिक्षक को हिमाचल प्रदेश खेल विभाग ने कभी अपने यहां बुलाने का अभी तक कष्ट नहीं किया है। हिमाचल के इस एकमात्र द्रोणाचार्य अवार्डी प्रशिक्षक के अनुभवों से हिमाचल महरूम है।  हिमाचल प्रदेश सरकार को इस तरह की प्रतिभाओं को प्रदेश में बुलाना चाहिए, ताकि हम पहाड़ी भी कला संस्कृति व खेल के क्षेत्र में अपना शानदार इतिहास बना सकें।

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