पीएम के बर्थ डे पर सुनाया दुखड़ा

राजा का तालाब -जहां पूरा देश में धूमधाम से पीएम का जन्मदिन मनाया जा रहा है। वहीं पौंग विस्थापितों ने पीएम को अपना दुखड़ा सुनाया है। प्रदेश में विभिन्न जगहों पर रह रहे पौंग बांध विस्थापित परिवारों ने सोमवार को अलग-अलग स्थानों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सचिव जल संसाधन मंत्रालय एवं अध्यक्ष हाई कमेटी को पिछले 50 वर्षों से उनके साथ हो रहे शोषण एवं समझौते के अनुसार पुनर्वास न होने पर अलग-अलग पत्र प्रेषित कर अपनी व्यथा उजागर की। पौंग बांध विस्थापितों रामपाल वर्मा, एमएम चौधरी, रमेश धीमान, तरसेम लाल, प्यारे लाल, बाबू राम, सुनील, रमेश, सुरजीत, वकील, रछपाल सिंह व अन्य विस्थापितों ने प्रधानमंत्री सहित पांच अन्य एजेंसियों को पत्र प्रेषित किए हैं। पत्र में राजस्थान में पानी के अभाव में 1960 में पौंग बांध का निर्माण से प्रदेश की सबसे उपजाऊ अपनी हल्दून घाटी जलमग्न गंवाने। जबकि बांध निर्माण से 339 गांवों के 1.5 लाख लोगों के बेघर होने। बांध का निर्माण होने से राजस्थान की रेतली भूमि को सींचने व बांध से पैदा होने वाली 360 मेगावाट बिजली से केंद, पंजाब, राजस्थान सरकार के लाभान्वित होने, 1970 में तीनों  राज्यों के मुख्यमंत्रियों में हुए समझौते के अनुसार जिला श्रीगंगानगर में 15.625 एकड़ भूमि देने। 2.20 लाख एकड़ आरक्षित भूमि देने और राजस्थान में बांध के पानी से हरियाली फैलने के बाद राजस्थान सरकार ने नए कानून बनाकर उन्हें तंग करने, वहां के भू-माफिया द्वारा उनकी जमीनों पर गैर कानूनी तरीके से कब्जा करने। झूठे इकरारनामे से उनकी भूमि छीनने। तथा सचिव जन संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार की अध्यक्षता में विस्थापितों की समस्या के समाधान हेतु हाई पावर कमेटी का गठन करने। वहीं प्रदेश उच्च न्यायालय ने हाई पावर कमेटी को तीन महीने के अंदर बैठक करने का आदेश देने और 1996 से अब तक मात्र 24 बैठकें करने का जिक्र किया गया है। विस्थापितों ने पत्र के माध्यम से समझौते के अनुरूप द्वितीय चरण में दी जा रही भूमि पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव बताया है। विस्थापितों ने पत्र में प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि उनका पुनर्वास 2.20 लाख आरक्षित भूमि पर ही किया जाए। वहीं राजस्थान सरकार द्वारा भूमि न देने की स्थिति में  हाई पावर कमेटी की 23वीं बैठक के निर्णय के अनुसार 48 वर्षों के उत्पीड़न का मुआवजा व  श्रीगंगानगर में समझौते के तहत दी जाने वाली भूमि की आज के मूल्य की राशि देने का आग्रह किया है। विस्थापितों ने पत्र में अपनी दयनीय हालत का भी हवाला दिया है।

 

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