माता नबाही देवी

By: Sep 28th, 2019 12:08 am

इस मंदिर में प्रदेश से ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से भी हजारों की तादाद में श्रद्धालु मां के दर्शनों व मन्नतें पूरी होने के लिए आते हैं। यहां पर खुदाई के दौरान मिली पत्थर की शिलाएं मंदिर परिसर में देखी जा सकती हैं। मान्यता है कि नबाही देवी मंदिर 13वीं शताब्दी में स्थापित किया गया है…

मंडी जिला के सरकाघाट उपमंडल से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित माता नबाही देवी का भव्य मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। इस मंदिर में प्रदेश से ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से भी हजारों की तादाद में श्रद्धालु मां के दर्शनों व मन्नते पूरी होने के लिए आते हैं। यहां पर खुदाई के दौरान मिली पत्थर की शिलाएं मंदिर परिसर में देखी जा सकती हैं। मान्यता है कि नबाही देवी मंदिर 13वीं शताब्दी में स्थापित किया गया है। मंदिर के नामकरण के बारे में अनेक धारणाएं हैं। कहा जाता है कि जब एक बंजारा घने वीरान जंगल से जा रहा था, तो एक छोटी कन्या ने उसे आवाज दी और चूडि़यां पहनाने के लिए कहा, बंजारे ने जब कन्या को चूडि़यां पहनानी शुरू की तो कन्या ने एक-एक करके अपनी नौ भुजाएं आगे की। यह देख कर बंजारा घबरा कर भागने लगा, तब कन्या ने उसे रुकने के लिए कहा और बोली, डरो मत मैं नवदुर्गा नबाही माता हूं। उसी समय कन्या ने बंजारे को चूडि़यां पहनाने के बदले कुछ पत्थर दिए। जब घर जाकर बंजारे ने उन पत्थरों को देखा, तो वे सोने के बन गए थे। इस घटना को बंजारे ने लोगों को बताया और तभी इस मंदिर का निर्माण हुआ था तथा आज भी यह शक्तिपीठ प्रदेश में अपनी पहचान बनाए हुए है। वैसे तो मंदिर में हर रोज श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन विशेष नवरात्र मेलों में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। हर वर्ष आषाढ़ संक्रांति को यहां पर तीन दिन का मेला लगता है। इसमें हजारों की तदाद में श्रद्धालु प्रदेश व बाहर के राज्यों से माता के दर्शनों के लिए आते हैं। नई फसल के रोट पकवान मंदिर में चढ़ाते  हैं तथा अन्न ग्रहण करते है। कहा जाता है कि मुगलों के शासन के समय क्रूर मुस्लिम लुटेरे महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर चढ़ाई की और मंदिर को तोड़ने एवं लूटने का प्रयास किया, तो मां भगवती ने पत्थरों के गोले बरसाए थे। मंदिर परिसर में पांच मंदिर हैं, जिनमें लक्ष्मी-नारायण, राधा- कृष्ण, संतोषी माता, नैना माता व शिव परिवार, नंदी बैल व शेर की प्रतिमा है। मंदिर प्रांगण में पांच समाधियां हैं, जो हजारों साल पहले महात्माओं ने ली थी। मंदिर प्रांगण में एक वट वृक्ष है जिस पर सुहागिन स्त्रियां अपना सुहाग चुड़ा बांधकर पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। मंदिर के मुख्य द्वार में एक तरफ  भैरो नाथ व दूसरी तरफ हनुमान जी की मूर्ति है।  मंदिर के साथ साथ लगता एक तालाब है पहले यह पानी से भरा रहता था, लेकिन आजकल यह सूखा पड़ा है। पहले इसमें कमल के फूल खिलते थे। तालाब के बीच शिव मंदिर का निर्माण किया गया है। कहा जाता है कि मंडी रियासत के राजा ने यहां पर आयोजित किया जाने वाला मेला बंद कर दिया था, जिससे राजा तत्काल अंधा हो गया। पुरोहितों ने राजा को कहा कि मां की नाराजगी से तुम्हारा यह हाल हुआ है। राजा द्वारा माता के मंदिर में माफी मांगने पर आंखों की ज्योति लौट आई। वर्ष 1994 में स्थानीय लोगों द्वारा मंदिर कमेटी का गठन कर मंदिर के विशाल भवन का निर्माण किया गया तथा वर्ष 2007 में इस मंदिर का सरकारीकरण किया गया। हिमाचल प्रदेश के धार्मिक स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित  करने की आवश्यकता है। जिससे प्रदेश पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तथा प्रदेश के राजस्व में भी इजाफा होगा ।

– देशराज नामदेव

 

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