मीडिया ने भाषा को आम जन तक पहुंचाया

Sep 22nd, 2019 12:05 am

हिमाचल में मीडिया की ग्रोथ के साथ

 भाषायी परिवर्तन – 2

अब वह जमाना नहीं रहा जब जालंधर, चंडीगढ़ या दिल्ली से प्रकाशित अखबार हिमाचल में आया करते थे। अब हिमाचल, खासकर कांगड़ा खुद एक मीडिया हब बन गया है। हिमाचल में अब यहीं से प्रकाशित अखबार बिकते हैं। मीडिया की इस ग्रोथ के साथ कई भाषायी परिवर्तन भी आए हैं। ये भाषायी परिवर्तन क्या हैं, इन पर दृष्टिपात करते विभिन्न साहित्यकारों के विचार प्रतिबिंब में हम पेश कर रहे हैं। पेश है इस विषय पर विचारों की दूसरी और अंतिम कड़ी…

राजेंद्र राजन

मो. – 8219158269

गत दो दशकों में जिस तीव्रता से प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया का विस्तार हुआ है, जाहिर तौर पर उसमें हिंदी भाषा की बड़ी भूमिका है। मीडिया के माध्यम से देश में एक नए बाजार का सृजन हुआ है। इसका श्रेय निरंतर बदल रही हिंदी को है जो संप्रेषण का सशक्त माध्यम बनकर करोड़ों दिलों तक पहुंच रही है। बाजार की मांग है कि उसके उत्पाद का संदेश उस भाषा में हो जिसे उपभोक्ता तुरंत समझ ले और प्रोडक्ट की खूबियों को आत्मसात कर ले। अखबार को खबरें बेचनी हैं, टीवी को विजुअल और रेडियो को ध्वनि। ऐसे भाषा के संस्कारों का टूटना व विखंडित होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे हम सब स्वीकार कर चुके हैं। एसपी, डीसी, कांस्टेबल, लाई डिटेक्टिव टेस्ट, ऑबजरवेशन, आईसीयू, टैक्स्ट बुक, एफआईआर, प्राइवेट स्कूल, ऐसे सैकड़ों या हजारों शब्द हैं जो हमारी जुबान पर इस हद तक काबिज हो चुके हैं कि हम चाहकर भी उनका विकल्प नहीं ढूंढ सकते। यानी अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं का हिंदी में प्रवेश जारी है। हिंदी भाषा की शुचिता और शुद्धता पर घोर संकट है और विदेशी भाषाओं का हिंदी में आक्रमण दूध में शक्कर की तरह घुल-मिल चुका है। भाषाविद मानते हैं कि हिंदी की पारंपरिक मौलिकता को खतरा है, लेकिन दूसरा मत यह है कि अगर हिंदी को जन-जन तक पहुंचाना है तो उसे अपनी बेडि़यां तोड़नी होंगी। भाषा जनमानस को संस्कारित करती है, लेकिन मीडिया के पास इतना धैर्य, वक्त या बड़े सरोकार कहां हैं जो वह पत्रकारों को यह बता सके कि खबर लिखते वक्त किन शब्दों से बचना है और किनका प्रयोग करना है? मीडिया में भाषा के चलताऊ, फूहड़ या अंग्रेजीदां शब्दों की भरमार के पीछे कारण यह है कि उसे खबर आमजन तक पहुंचानी है। ठीक उसी टूटी-फूटी, तोड़ी-मरोड़ी भाषा में जिसमें लोग बातचीत करते हैं। दूसरे, भाषायी अखबारों या टीवी चैनल्स के पत्रकारों पर विज्ञापन जुटाने का अतिरिक्त बोझ बना रहता है। वे मीडिया संस्थानों के खजाने को भरे या खबरों की ड्राफ्टिंग पर फोकस कर भाषा को सजाएं या संवारें? आज मीडिया का साहित्य से दूर-दूर का रिश्ता भी खत्म हो चुका है। अच्छा साहित्य ही भाषा के संस्कार पैदा करता है। रेडियो एक सशक्त मीडिया है। आकाशवाणी के राष्ट्रीय चैनलों में भाषा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सरल हो। आम आदमी समझ सके। यही कारण है कि करोड़ों लोग आज भी रेडियो के दीवाने हैं। अगर टीवी, अखबारों से लोगों का मोहभंग हो रहा है तो रेडियो से रिश्ते और प्रगाढ़। लेकिन हिमाचल की ही बात करें तो आकाशवाणी शिमला से सायं व प्रातः प्रसारित होने वाले समाचारों की भाषा बेहद अखरती है। ‘सरकारी प्रेस नोट जर्नालिज्म’ को खबरों में हूबहू चस्पां कर देना बताता है कि क्षेत्रीय रेडियो समाचारों में कितना अधिक अधकचरापन है। रेडियो पर अधोसंरचना, तत्त्वावधान, अंतर्गत, महत्त्वाकांक्षी जैसे भारी-भरकम तत्सम व संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग बताता है कि रेडियो का न्यूज रूम भाषा के मामले में कितना निर्धन है। पत्रकारिता में कंटेंट को किंग माना जाता है। टीवी में विजुअल सब कुछ कह देता है। एंकर ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो दर्शक की भावनाओं को छू ले। यहां दुख, त्रासदी, शोषण भी बिकता है। जटिल मुद्दों को समझाने का हुनर टीवी ने विकसित किया है। शब्दों के साथ-साथ जब स्क्रीन पर तस्वीरें तैरने लगती हैं तो एंकर की भाषा और भाव उसे सशक्त बनाते हैं। साहित्यकारों की आम धारणा है कि पत्रकारिता ने भाषा को बिगाड़ा है। उसकी शुद्धता को तार-तार कर दिया है। अंग्रेजी का तबका अपनी चकाचौंध में जी रहा है। वह हिंदी को काले धब्बों की तरह देखता है। मगर टीवी चैनलों पर या रेडियो पर विज्ञापन की भाषा हिंदी है क्योंकि प्रोडक्ट को  करोड़ों दर्शकों के दिलों में उतरना है। विज्ञापन की क्रिएटिव हिंदी भाषा जादू जगाती है। वह बाजार को समृद्ध करती है। अखबारों और सैकड़ों न्यूज चैनल्स और एफएम रेडियो की ग्रोथ ने हिंदी के बल पर ही अपने लिए करोड़ों पाठक, दर्शक, श्रोता तैयार किए हैं। हिंदी को सरल बनाने में मीडिया का अहम योगदान है। अंग्रेजी के वर्चस्व से हिंदी को कोई खतरा नहीं है, उलटे यह समृद्ध, संपन्न और एनरिच हो रही है।

भाषायी अनुशासन ताक पर है

गुरमीत बेदी

मो.-9418033344

भारत के लिए एक बड़ी ही मशहूर कहावत है। कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। यानी भारत में हर चार कोस पर भाषा बदल जाती है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में कितनी भाषाएं बोली जाती होंगी। उपलब्ध आंकड़ों  के अनुसार भारत में फिलहाल 1365 मातृभाषाएं हैं जिनका क्षेत्रीय आधार अलग-अलग है। हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में देखें तो भले ही यहां की राजभाषा हिंदी है, लेकिन प्रदेश के विभिन्न अंचलों की बोली में बहुत भिन्नता है। यह इस प्रदेश की खूबसूरती भी है। मीडिया के विस्तार के साथ-साथ इन बोलियों और भाषा में कितने परिवर्तन आए हैं, यह शोध का विषय है। एक समय था जब प्रदेश में दो-तीन अंग्रेजी के और तीन या चार हिंदी समाचार पत्र आते थे और वह भी जालंधर व चंडीगढ़़ से प्रकाशित होकर। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सिर्फ  दूरदर्शन था और उसके भी इक्का-दुक्का पत्रकार थे। अलबत्ता आकाशवाणी के जिला प्रतिनिधि जरूर थे। लेकिन पिछले  दो-अढ़ाई दशक के दौरान प्रदेश में नए समाचार पत्र आए हैं और अधिकांश समाचार पत्रों के हिमाचल संस्करण प्रदेश में ही प्रकाशित होने लगे हैं। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक चैनलों का भी विस्तार हुआ है और बड़ी संख्या में युवा प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़कर पत्रकारिता में सक्रिय हुए हैं। स्वाभाविक ही है कि मीडिया के विस्तार के साथ-साथ भाषायी परिवर्तन भी देखने को मिल रहे हैं। आज से 100 साल पहले जब महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’  निकालते थे तो भाषा के अनुशासन का चाबुक अपने पास रखते थे। लेकिन नए दौर की पत्रकारिता में भाषायी अनुशासन को एक तरह से किनारे पर रख दिया गया है। खबर भेजने की हड़बड़ी या फिर पत्रकारिता में नए प्रयोग करके कुछ नया कर दिखाने की ललक में हिंदी व अंग्रेजी के अनावश्यक घालमेल ने भाषा का स्वरूप ही बिगाड़ दिया है। हिंदी को समृद्ध करने की बजाय हिंदी को संक्रमित किया जाने लगा है। बाजारवाद का बढ़ता हुआ प्रभाव भी मीडिया में दृष्टिगोचर होने लगा है। विज्ञापनों को असरदार बनाने के लिए उनकी बानगी व भाषा बदली है। एफएम रेडियो ने समाचार प्रसारण और मनोरंजन की दुनिया को पूरी तरह से बदल डाला है। दर्शकों व श्रोताओं को आकर्षित करने के लिए भाषाओं की खिचड़ी बनाकर परोसने की कवायद जारी है। मीडिया के स्वरूप में विकृतियां भी आई हैं। खबर को बढ़ा-चढ़ाकर या सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करने की होड़ में भाषा में आक्रामकता का पुट भी महसूस किया जाने लगा है और कहीं-कहीं भाषा अमर्यादित होती भी नजर आती है। बाजार में उपभोक्तावादी संस्कृति का मानवीय संवेदनाओं से कोई सरोकार नजर नहीं आता। यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है। लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया में जब किसी घटना का विवरण देते समय किसी के उद्गारों या कथन को उसकी बोली में प्रस्तुत किया जाता है तो भाषा में आंचलिकता की महक भी महसूस होती है। उस अंचल से जुड़ा पाठक उस खबर से और भी भावनात्मक रूप से खुद को जुड़ा पाता है। यह भाषा की खूबसूरती भी है। भाषा को समृद्ध बनाने में मीडिया तभी सकारात्मक भूमिका निभा सकता है, जब उत्साही पत्रकारों के पास शब्दों का भंडार हो, शब्दों के चयन में वे सजग हों, जल्दबाजी के शिकार न हों और सुधि संपादक भी भाषा को विकृत होने से बचाने के लिए अनुशासन का चाबुक अपने पास रखें। अगर ऐसा नहीं होता है तो मीडिया के विस्तार से जो भाषायी परिवर्तन हो रहे हैं, वे हमारी आने वाली पीढि़यों को दिग्भ्रमित करेंगे। न इंग्लिश अपने मूल स्वरूप में रहेगी और न हिंदी। फिर हम अपनी भाषा पर गौरवान्वित कैसे होंगे?

आगामी अंकों में देखें

अशोक गौतम

अतिथि संपादक

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि तथा संभावना

भाषा का स्तर केवल मीडिया पर निर्भर नहीं होता

डा. जयप्रकाश सिंह

मो.-9882601975

भाषा का स्तर केवल मीडिया प्लेटफॉर्म की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता। यह सत्य है कि प्रत्येक मीडिया प्लेटफॉर्म की प्रकृति का अपना मिजाज होता है। मीडिया का कोई भी प्रकार अपने इस मिजाज के अनुरूप ही शब्दों की मांग करता है और धीरे-धीरे उसके आसपास एक खास किस्म का भाषायी परिवेश पैदा होता है। यही भाषायी परिवेश मीडिया विशेष की पहचान बन जाता है, लेकिन ऐसा नहीं कह सकते कि नव-मीडिया या नव-तकनीक ही भाषायी स्तर के एकमात्र निर्धारक हैं। मीडिया तक पहुंच भी एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पक्ष है, जिससे काफी हद तक मीडिया की भाषा प्रभावित होती है। प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य करने के लिए भाषागत पकड़ एक महत्त्वपूर्ण योग्यता होती थी। इसीलिए इन प्लेटफॉर्म्स पर अपेक्षाकृत भाषा का एक सधा रूप हमारे सामने आता है। लेकिन सोशल मीडिया में सक्रिय होने के लिए ऐसी किसी भाषायी योग्यता की जरूरत नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हो सकता है और अपने भावों-विचारों को अपनी शब्द संपदा के अनुसार रखने की कोशिश करता है। इसलिए शब्द कई बार परिमार्जित नहीं होते, वाक्यों की बनावट लड़खड़ाई हुई होती है। सोशल मीडिया पर भाषा का स्तर तकनीक से ज्यादा पहुंच का प्रश्न बन जाता है। सीमित पहुंच वाले मीडिया प्लेटफॉर्म और सार्वभौमिक पहुंच वाले मीडिया प्लेटफॉर्म की भाषा एक जैसी नहीं हो सकती। अधपकी भावनाएं, अस्पष्ट विचार यदि आधी-अधूरी भाषा में सामने आ रहे हैं तो शुरुआती दौर में उनको मौका मिलना ही चाहिए। जहां तक बात भाषायी सलीके या संस्कार की है तो इसे तकनीकी क्षेत्र से इतर एक वृहद परिप्ररेक्ष्य में देखना होगा। भाषा का प्रश्न सीधे शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। परिवेश की भाषा और शिक्षा की भाषा में हमने इतनी बड़ी खाई पैदा कर दी है कि नई पीढ़ी में भाषायी संजीदगी कम होती जा रही है। विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में कहें तो हम एक मूक पीढ़ी को गढ़ रहे हैं, जो किसी भी भाषा के प्रति बहुत सहज नहीं है। भाषा के प्रति व्यवहार लापरवाही भरा है। इसके दर्शन मीडिया में भी हो रहे हैं। सामाजिक स्तर पर भी शब्दों को लेकर प्रतिबद्धता का क्षरण आसानी से देखा जा सकता है। ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ वाली परंपरा में शब्द और भाषा ईश्वर बन जाते हैं और किसी भी तरह कुछ भी बोलकर काम निकालने की मानसिकता की भाषा कामचलाऊ हो जाए तो इसे सामाजिक स्खलन के प्रतीक के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए।

मीडिया में भाषा का रूप विकृत हुआ

डा. श्रीया बक्शी

मो.-9419956733

संचार और संवाद के लिहाज से भाषायी शुद्धता और पूर्णता बेहद जरूरी हो जाती है। जब बात मीडिया की आएगी तो यहां भाषायी शुद्धता, स्पष्टता और उपयोग में दक्षता और भी अहम हो जाती है। चिंताजनक यह कि तकनीकी के वर्तमान दौर में मीडिया में उपयोग होने वाली भाषा का रूप भी विकृत हुआ है। मीडिया समाज में कितना प्रभाव पैदा कर पाता है, इसका निर्धारण इससे होता है कि उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली भाषा का किस तरह से उपयोग किया जाता है। परंपरागत मीडिया की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि भाषा के महत्त्व से किसी तरह का कोई समझौता न हो, उसके लिए इसमें सेवारत पत्रकार एवं लेखक व्यक्तिगत एवं पेशेवर जीवन में गहन एवं गंभीर अध्ययन करते थे ताकि भाषा को लेकर स्थापित मानकों के साथ कोई समझौता न हो। लेकिन सोशल मीडिया सरीखे मीडिया के नूतन माध्यमों के आगमन के साथ ही ये भाषायी प्रतिबद्धताएं हाशिए की ओर खिसक गईं। अब सोशल मीडिया में खुद को महत्त्वपूर्ण मानने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ लिखना है, बिना यह सोचे-समझे कि उस अभिव्यक्ति की भाषागत मांग क्या है। सोशल मीडिया पर एक होड़ सी मची हुई है, अपनी वॉल को ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रखने की। इस आपाधापी में किसी के पास इतना वक्त ही नहीं बचा कि कुछ लिखने से पहले पर्याप्त स्व-अध्ययन भी किया जाए। इस दौड़ में हम अपने भाषायी ज्ञान को उस स्तर तक ले जाने में हर तरह से अक्षम हैं जहां से समुचित शब्द, सुपरिभाषित व्याकरण में बंधकर भाव खुद को सही रूप में अभिव्यक्त कर पाएं। शब्दों और व्याकरण के स्तर पर पाई जाने वाली त्रुटियां मुख्यधारा के परंपरागत मीडिया में आम तौर पर दृष्टिगत हो जाती हैं। हैरानी यह कि यह मानवीय चूक के बजाय लापरवाही ज्यादा प्रतीत होती है। इसका एक कारण शायद यह भी हो सकता है कि मीडिया संस्थानों में प्रूफिंग डेस्क लगातार खत्म होते जा रहे हैं। कारण चाहे जो भी हों, लेकिन मीडिया जगत में भाषा के स्तर पर जो संकट पैदा हुआ है, वह चिंताजनक है। मीडिया की विश्वसनीयता यदि आने वाले समय में भी बनाए रखनी है तो प्रमाणित और निष्पक्ष खबर के साथ-साथ भाषायी पवित्रता को भी जिंदा रखना होगा। तभी मीडिया अपने निर्धारित लक्ष्यों तक पहुंच पाएगा।

सिडनी के शहर में लघु भारत का दृश्य

शेर सिंह

साहित्यकार

-गतांक से आगे…

क्या नाचने वाले, क्या बजाने वाले, सब मस्त थे! जैसे एक-दूसरे को वर्षों से जानते, पहचानते हों! दर्शक अभिभूत होकर मंत्रमुग्ध से उन्हें देख रहे थे। लड़के-लड़कियों ने सफेद रंग के कुर्ते, नीले जीन्स और कमर में केसरिया पट्टी अथवा दुपट्टे बांध रखे थे। भीड़ द्वारा उत्साहित करने पर वे और भी तेज गति से ढोल-ताशे बजाने तथा नाचने लगे थे। कुछ समय के पश्चात सबके द्वारा अपने-अपने घरों से लाई गणेश की मूर्तियों को सामूहिक तौर पर विसर्जन किया जाना था। यहां कोई मराठी नहीं था, कोई तमिल या पंजाबी, हरियाणवी या हिमाचली, गुजराती, बंगाली, बिहारी या कन्नड़ नहीं था! बल्कि देश से बाहर लघु भारत था, भारत की संस्कृति थी। भारतीय परंपरा तथा समृद्ध रीति-रिवाजों का भव्य दर्शन, प्रदर्शन था। यदि कुछ और था तो वह भारतीयों की एकता थी, भारतीयों का अपनापन था। लगता था सबके मन भावनाओं के आधिक्य से भर उठे थे। ऐसा आभास हो रहा था मानो सभी का मन एक हो गया हो! सभी भावविभोर थे। अपने देश, अपनी मिट्टी की महक जैसे सबकी सांसों में समा गई थी। हमने मंदिर के कंटीन से कूपन लिया और डोसा, मेंदु बड़ा, पाव-भाजी, वेज रोल आदि के स्वाद का आनंद लिया। मंदिर विशाल परिसर में फैला हुआ है। मंदिर में काम करने वाले पुजारी, कर्मचारियों के लिए लकड़ी के एक-एक मंजिला घर बने हुए हैं। घरों के नाम भी भारतीय केदारनाथ, कैलाश आदि-आदि। आज के दिन मंदिर में अपने आने को सार्थक एवं शुभ मानकर फिर हम अपने अगले गंतव्य की ओर चल पड़े। घने जंगल वाला रास्ता था। गाड़ी में जीपीएस लगा रखा था। वही गाइड कर रहा था। लगभग 15-20 किलोमीटर के पश्चात हम स्टेल विल पार्क, जिसका दूसरा नाम वाइल्ड हिल लुकआउट था, में पहुंचे। यह एक टीले जैसी जगह थी। बहुत तेज एवं अत्यंत ठंडी हवाओं ने हमारा स्वागत किया। ठंडी हवाओं के कारण हमारे दांत बजने लगे। लगा, रोहतांग की बर्फीली हवाओं से सामना हो रहा है। टीले के आगे हरे रंग का विशाल समुद्र था। अनंत जलराशि! अथाह समुद्र! आकाश और समुद्र जैसे एक-दूसरे का आलिंगन कर रहे थे! एक जहाज समुद्र में लंगर डाले हुए था। पीछे की ओर उतनी ही हरियाली से भरा घना जंगल था। घने तथा छत्ते वाले पेड़ों के आधिक्य से जमीन का टुकड़ा तक नहीं दिख रहा था। जहां बीच में थोड़े से खुले भाग दिखे, वहां टूरिस्टों का जमघट लगा था। दरअसल, यह पैराग्लाइडिंग एरिया अथवा पैराग्लाइडिंग प्वाइंट था। हमने तैयार होते पैराग्लाइडर्स और उनके जुनून को उनके करीब जाकर देखा। वे हमारे सामने तैयार हो रहे थे। हमारे पास से ही टीले से उड़ रहे थे। उड़ने के कुछ ही मिनटों में तेज हवा के कारण वे हजारों फीट ऊपर आसमान में पहुंच जाते। वहां से वे एक पक्षी के आकार के बराबर उड़ते नजर आते। आकाश रंग-बिरंगे पैराग्लाइडर्स से भर गया था। यह बड़ा ही जोखिम भरा, लेकिन दुःसाहसिक काम लगता था क्योंकि टीले के एकदम सामने समुद्र था और पैराग्लाइडर्स समुद्र के ऊपर उड़ रहे थे। बहुत लुभावना मगर बड़ा विस्मयकारी तथा अत्यंत रोमांचक दृश्य था। पैराग्लाइडिंग के साहस को मैंने मन ही मन शाबाशी दी! मैंने पहली बार अपने सामने पैराग्लाइडर्स को उड़ान भरते हुए कुल्लू-मनाली के सोलंग नाले में देखा था। दूसरी बार कुल्लू के बिजली महादेव में। और अब तीसरी बार यहां ऑस्ट्रेलिया के वाइल्ड हिल लुकआउट में देख रहा हूं। हालांकि अपने बचपन के दिनों में कुल्लू में अपने घर के पास धान के खेतों, रोपों से होते हुए ब्यास नदी के ऊपर से विदेशी पैराग्लाइडर्स को उड़ते, आसमान में मंडराते, नदी के पार होते हुए अनेकों बार देखा था। वह बचपन था। बहुत जिज्ञासा और अचंभा होता था। कैसे उड़ते हैं, क्या पहनते हैं, कैसा अहसास होता होगा, यह जिज्ञासा अक्सर मन में बनी रहती थी। इसे मैंने कुल्लू में तथा अब अपने साठ वर्ष की आयु के पश्चात यहां देखा और अनुभव किया। लेकिन जैसी उत्सुकता, जो रोमांच बचपन में होता था, वैसा ही रोमांच, वैसी ही जिज्ञासा, वैसी ही खुशी आज भी महसूस कर रहा था। यहां बहुत से लोग जिन्होंने शायद पहले कभी पैराग्लाइडर्स या पैराग्लाइडिंग नहीं देखी होगी, वे हैरानी तथा अपने डर भरे चेहरों से उन्हें देख रहे थे। सामने विशाल प्रशांत महासागर था। समुद्र से आती तेज और ठंडी हवाओं के कारण कंपकंपी छूट रही थी। इसलिए हम यहां अधिक नहीं रुके। घने पेड़ों वाले जंगल के बीच घुमावदार तथा ढलानदार सड़क से हम अब स्टेनवेल बीच की ओर चल पड़े थे। रास्ते में छोटे-छोटे, साफ.-सुथरे घरों वाले गांव फिर से दिखने लगे थे। भारतीय गांवों के विपरीत ये सुंदर, स्वच्छ एवं हर सुविधा से युक्त 7-8 घरों वाले चमकते, आकर्षित करते गांव थे। समुद्र के ऊपर बनी लगभग 10-12 किलोमीटर लंबी सड़क अथवा पुल से हम स्टेनवेल बीच पर पहुंचे। पैराग्लाइडर्स प्वाइंट से यह बीच लगभग 20-25 किलोमीटर दूर है। यहां भी हमारे आगे अथाह समुद्र था। सागर की ऊंची-ऊंची उठती, बैठती लहरें थीं। उन लहरों पर कलाबाजियां करते मनमौजी लोग थे! लोगों की उत्सुक, उल्लसित भीड़ थी। बीच के किनारों तक समुद्र की विशाल और ऊंची लहरें आती तथा किनारे को और भी पीछे धकेलती हुई लौट जाती। मेरा जी चाह रहा था कि समुद्र को तथा उसकी लहरों को अपनी बांहों में भर लूं! लेकिन नजरें गड़ाकर जितना भी देखता था, आंखें जैसे उनको और अधिक अपने अंदर समा लेने, उन्हें भर लेने को जैसे प्रेरित करती लग रही थी। मैं उछलती, मचलती लहरों का इंतजार करने लगा कि मुझ तक आए तो मैं उन्हें स्पर्श करूं। उन्हें छू लूं। इससे पहले कि मैं समुद्र के आगे नतमस्तक होता, जल देवता के सामने अपना शीश झुकाता, समुद्र के जल और उसकी लहरों को स्पर्श करता, समुद्र ने मुझे छू लिया। मचलती लहरें मुझ तक आई और मेरे जूते, कपड़े भीगोकर वापस चली गईं। मैंने समुद्र के जल को अपनी अंजुरी में लिया और अर्घ्य के रूप में सूर्य भगवान को अर्पित-समर्पित करते हुए वापस समुद्र में डाल दिया। मैं बहुत वर्षों के पश्चात समुद्र से मिला था। एक पहाड़ का व्यक्ति नदी-नाले, जल-वर्षा, बर्फ-बादल तो बहुत देखता है। परंतु समुद्र देखना, समुद्र तक पहुंच पाना इतना आसान नहीं। मैं अपने को इस मामले में सौभाग्यशाली मानता हूं। प्रथम बार 18-19 वर्ष की अवस्था में मुंबई में देखा और मिला था। भारत में अंतिम बार अंडेमान-निकोबार द्वीप समूह यानी पोर्ट ब्लेयर में देखा था। अंडेमान के पश्चात 2014 में केरल के कोच्ची में मिलन हुआ था। इन चार वर्षों के अंतराल के पश्चात यहां ऑस्ट्रेलिया में सिडनी शहर एवं सिडनी के समीप स्टेनवेल बीच में फिर समुद्र से, सागर से, वरुण देवता से मिलने और स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पिछले कल यानी शनिवार को यहां का अधिकतम तापमान 30 डिग्री के आस-पास था। आज अचानक ही अधिकतम तापमान 18 डिग्री तक गिर गया था। धूप निखरी हुई थी। लेकिन सर्द हवाओं के कारण ठंड महसूस हो रही थी। बीच पर कुछ समय बिताने, नर्म रेत पर अधनंगे लेटे हुए धूप सेंकते लोगों, सागर की लहरों पर कलाबाजियां करते तैराकों, अपनी आंखों में समुद्र को समा लेने की असफल-असंभव चेष्टा के पश्चात शाम होते-होते हम वापस सिडनी लौट आए थे। यह सितंबर का महीना था। वसंत ऋतु अपने पूरे शबाब पर थी। घर पहुंचे तो घर के आगे वाले पार्क में सितंबर माह में ‘स्प्रिंग फेस्टिवल’ की धूम मची हुई थी। 

-समाप्त

तमाशा-सा होते हम

भारत भूषण ‘शून्य’

स्वतंत्र लेखक

तमाशा दिखाना एक कला है, लेकिन यह जिंदगी का अखिल विन्यास नहीं। न ही यह सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों का मंच हो सकता है। शब्दों की शालीनता, तमाशे को खूबसूरत बनाए रख सकती है, लेकिन जब भाषा को ही तमाशे का साधन और साध्य दोनों में बदल लिया जाए तो तमाशेबाज का उतना नहीं बिगड़ता, जितना तमाशा देखने और तालियां पीटने वाले का बिगड़ चुका होता है। साधनों के चिमटे से ही साध्य को पकड़ने का सामर्थ्य पैदा हुआ करता है। यदि चिमटे को ही साध्य बना लिया जाए तो हम वक्त के आगे खींसे निपोरने वाली प्रजाति बने रहेंगे। नीतियों में नैतिकता का तड़का लगाए बिना किसी सामाजिक उद्देश्य की सार्थक प्राप्ति किसी काल का सच नहीं बनी। मात्र मंत्र उच्चारण से जीवन के सार सूत्र कभी हाथ नहीं लगे। सूत्र पकड़ने के लिए तथ्यों से आंखमिचौनी करना हमेशा हवा-हवाई बना रहेगा। यह नहीं हो सकता कि छाज पर कूड़ा फैलाकर इसे छाजते रहें और किसी सार की प्राप्ति हो जाए। छाज को भी अपनी कला दिखाने का तभी आनंद आएगा, जब उस पर अनाज रखा जाए, वरना हाथों का श्रम और छाज का गम दोनों हमारी झोली का हिस्सा बनेंगे। सत्ता का मोह इतिहास में दर्ज वह सच्चाई है, जिससे कोई सच्चा फकीर ही बच पाया है। फकीरी की इस अमीरी को पकड़ सकने वाला ही राज की नैतिकता पर खरा उतर सकता है। भाषाई चमत्कार से अलंकृत व्यक्ति, जिंदगी से मिले ज्ञान को भी शोभा मान लेने की गलती जरूर करेगा। गलतियों के इस बाजार में सही कहने वाले को मूर्ख बताना भी हमारे हिस्से का भाग्य बना रहेगा, यदि आंख और मस्तिष्क के द्वार खुले रखने की योग्यता हम पैदा नहीं कर लेते।

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