रिश्तों की मित्रता, मित्रता के रिश्ते

कुमार सिद्धार्थ

स्वतंत्र लेखक

मनुष्य के जीवन में अनेक नाते होते हैं और उनके जरिए उसे प्रेम का अनुभव होता है। ये नाते भाई-बहन का नाता, पति-पत्नी का नाता, माता-पुत्र का नाता, पिता-पुत्र का नाता आदि में से कुछ नातों का मुझे अनुभव भी है। मेरी माता थी, पिता थे, भाई हैं। फिर भी अपने जीवन में मुझे आत्मानुभूति मैत्री के संबंध में ही हुई। मां को बच्चे को देखकर आत्मा का दर्शन होता है, उसमें अपना ही रूप दिख पड़ता है। वह एक विशेष अनुभव होता है। इसी तरह ऐसे किसी के जीवन में कुछ और अनुभव होते हैं। जिसके जीवन में माता का अनुभव होता है वह परमेश्वर को मातृरूप में देखता है। जिसके जीवन में पिता के संबंध में अनुभव होता है, वह परमेश्वर को पितृरूप में देखता है। किंतु मेरे जीवन में वह स्थान मैत्री को मिला है। मैं भी जब ईश्वर का अनुभव करता हूं तो ‘त्वमेव माता व पिता त्वमेव’ यही अनुभव करता हूं, ईश्वर सब कुछ है। फिर भी मन में यही आता है कि वह मेरा सखा है, मित्र है। इसलिए मैं सारी दुनिया पर वही न्याय लागू कर कहा करता हूं कि अब संख्यभक्ति का जमाना आ गया है। मैत्री में अत्यंत निर्भयता होती है। वहां स्वार्थ की बू तक नहीं होती है। अन्य संबंधों में स्वार्थ या आसक्ति होती है। माता-पुत्र से कुछ नहीं चाहती है, वह उस पर निःस्वार्थ प्रेम करती है, फिर भी उसके मन में बच्चे के लिए आसक्ति होती है। इस तरह किसी नाते से आसक्ति, किसी में स्वार्थ तो किसी में दोनों होते हैं, किंतु मैत्री का संबंध आसक्ति और स्वार्थ से रहित ही हो सकता है। यह नहीं कि वह वैसा ही होना चाहिए, पर हो सकता है। इसलिए अध्ययन करते-करते जब मैं वेद तक पहुंचा तो वेद के इस मंत्र ने मेरा ध्यान खींच लिया। मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षंताम। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। यानी सारी दुनिया मेरी ओर मित्र की दृष्टि देखे, इसलिए मैं भी सारी दुनिया की ओर मित्र की दृष्टि से देखूंगा। वैसे वेद में मातृभाव, पितृभाव आदि के वाक्य भी आए हैं लेकिन इस वाक्य ने मुझे खींच लिया। इस तरह मेरे जीवन में यह एक विशेष वस्तु रही है। मित्रों के लिए मुझे इतना प्रेम है कि यद्यपि उनके आचार-विचार मेरे आचार-विचारों के साथ नहीं मिले, उनमें बचपन से आज तक काफी फर्क पड़ा तो भी मेरी प्रीति अत्यंत निरपेक्ष रही है। वे मित्र हैं, बस, इससे ज्यादा मैत्री का कोई कारण नहीं। मैं जब यह देखता कि मेरे मित्र किसी विषय में प्रवीण हो रहे हैं  तो मैं उन विषयों का अध्ययन कम कर देता था। मुझे लगता था कि वह अध्ययन कर ही रहा है तो मैं भी नाहक उसका बोझ क्यों उठाऊं? आज मेरी मां होती तो उसके और मेरे बीच में मैत्री की ही भावना होती। पिता होते तो मैं मानता हूं कि उनके और मेरे बीच मैत्री की ही भावना होती, यद्यपि उनके और मेरे बीच कुछ संकोच था। मैं उन्हें योग ही मानता था।  पहले भी, अब भी मानता हूं। कारण, ईश्वर के साथ मेरी मैत्री की ही भावना है। एक बार बालकोबा ने मुझे सितार की पुस्तक दी। उन दिनों वह सितार सीख रहा था। मैंने पुस्तक के सहारे मांड राग दो-तीन दिनों में बजाया। बालकोबा ने कहा कि तुमने बहुत अच्छा बजाया। तब मैंने उसे यह कहकर छोड़ दिया कि अब मुझे आता ही है, बालकोबा को आता है। एक मनुष्य प्रवीण हो रहा है तो मैं क्यों सीखूं? ये सभी मुझे छोड़ ही नहीं सकते। अभी तक का मेरा यही अनुभव रहा है। किसी को किसी कारण से दूर जाना पड़ा तो वह भी दिल से दूर नहीं हुआ और ऐसे लोगों को उसका रंज भी रहा। इस तरह मुझमें मैत्री की भावना है। कभी-कभी लोग मुझे नेता बनाने की फिक्र में पड़ते हैं तो मैं कहता हूं कि नेता बनना मेरे स्वभाव में नहीं है। यद्यपि गांधीजी जैसे और जमनालालजी बजाज जैसे मार्गदर्शन करने वाले मुझे मिले तो भी मेरा दिल उनकी ओर मैत्री के नाते से ही देखता है। विचारों के आदान-प्रदान में मैं हमेशा स्वतंत्र रहा हूं। मेरा विचार किसी ने नहीं माना, इसका मुझे तनिक भी दुख नहीं हुआ। मैत्री के नाते में वह बैठता ही नहीं। मैत्री में तो चीज जंचती है, उसे लेना और जो नहीं जंचती, उसे छोड़ना पड़ता है। इसलिए मेरी बात किसी ने नहीं मानी तो उसका मुझे अभिमान और खुशी मालूम हुई कि उसे यह बात कबूल नहीं, इसलिए उसने नहीं मानी। इस तरह अपने को स्वातंत्र्य का अत्यंत प्रेमी मानता हूं और यह बात मैत्री के कारण ही हो सकी।

 

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