ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’

अमरीका आज हिंदुस्तान लग रहा है। अमरीकी स्टेट टेक्सस का शहर ह्यूस्टन तो ‘मोदीमय’ हो गया है। हालांकि यहां 1.5 लाख से ज्यादा भारतवंशी बसे हैं, लेकिन चारों तरफ  ‘तिरंगा’ शान से लहरा रहा है। वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारे ऐसे गूंज रहे हैं मानों हम भारत के ही किसी हिस्से में हों! ह्यूस्टन में 20 से ज्यादा भव्य मंदिर हैं, जहां पूजा-पाठ जारी रहते हैं और घंटों की ध्वनियां भी गूंजती रहती हैं। यहां ऑयल इंडिया, गेल, ओएनजीसी के दफ्तर हैं। यहां कश्मीरी पंडितों, सिख और बोहरा समुदायों के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की। कश्मीरियों ने अनुच्छेद 370 खत्म करने और सिखों ने करतारपुर कारिडोर बनवाने के लिए प्रधानमंत्री का आभार जताया। कुछ चेहरे इतने भावुक दिखे कि प्रधानमंत्री का हाथ ही चूम लिया और हमेशा, हर जगह साथ चलने का वादा किया। लगातार महसूस होता रहा मानो हम ‘लघु भारत’ को देख-सुन रहे हों! यह कोई सामान्य घटना नहीं है। ह्यूस्टन के गली-बाजारों में ‘हाउडी मोदी’ और ‘हर हर मोदी’ की गूंज सुनाई दे रही है। यह आयोजन न तो भारत सरकार का है और न ही संघ-भाजपा परिवार ने कराया है, बल्कि ‘टेक्सस इंडिया फोरम’ ने अपने प्रधानमंत्री के अभिनंदन में इतना विशाल आयोजन किया है। लोगों की भीड़ ने टिकट खरीद कर अपनी भागीदारी तय की है, लेकिन अपने देश में कुछ ‘रुदालियां’ हैं, जिनका पेशा ही रोना-छाती पीटना है। लेकिन अमरीकी शहर  में प्रख्यात भारतीय शेफ  किरण वर्मा ने ‘नमो थाली’ सजाई है। उसे प्रधानमंत्री मोदी को पेश किया जाएगा और बाद में वही थाली सार्वजनिक तौर पर बिकने लगेगी। इसी तरह एक भारतवंशी हलवाई ने मोदी की पसंदीदा मिठाइयां बनाई हैं। वह ह्यूस्टन का प्रसिद्ध मिष्ठान्न आउटलेट है। गुजरात मूल की महिलाओं और कन्याओं ने गरबा नृत्य के जरिए अपने प्रधानमंत्री का स्वागत किया। चारों तरफ कलात्मक और सांस्कृतिक इंद्र धनुष बिखरे हुए थे, लेकिन इन तमाम गतिविधियों से अधिक गौरतलब यह रहा कि अमरीका में ईसाइयों के सर्वोच्च धर्मगुरू पोप के बाद इतना विशाल समुदाय भारत के प्रधानमंत्री के सम्मान में उमड़ा। दर्शक और श्रोता न तो भारत के नागरिक रहे हैं और न ही वे मोदी-भाजपा के समर्थक वोटर हैं, लेकिन अपने मूल देश के प्रधानमंत्री मोदी को सुनने और उनका अभिनंदन करने को वे उतावले हैं। नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं, जिनके सार्वजनिक मंच पर अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप आए और लोगों को संबोधित किया। बेशक उनका मकसद चुनावी हो सकता है और उनकी निगाहें भारतवंशी वोट बैंक पर हों, लेकिन यह भूलना नहीं चाहिए कि टं्रप आज भी अमरीकी राष्ट्रपति हैं-दुनिया के सबसे विकसित और ताकतवर देश के निर्वाचित राष्ट्रपति। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘प्रथम’ होने के कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं और यह सिलसिला जारी है। दरअसल यह भारत के नागरिकों और विदेश में बसे भारतवंशियों के प्रति प्रधानमंत्री मोदी के प्रत्यक्ष जुड़ाव का करिश्मा है कि वह अमरीका के भारतीयों में ही नहीं, वहां के गोरे लोगों में भी आश्चर्य के स्तर पर लोकप्रिय हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी का 2014 के बाद छठा अमरीकी प्रवास है। अमरीकी राष्ट्रपति से तो बीते तीन माह के दौरान वह तीसरी बार मिल रहे हैं। अभी द्विपक्षीय संवाद भी होना है, जलवायु पर शिखर सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भी दोनों नेता रू-ब-रू होते रहेंगे। हर बार एक अंतरंग संवाद…एक अंतरंग मुलाकात…बेशक यह भारत-अमरीका संबंधों के शिखर का कालखंड है। बेशक अमरीका की कुछ नीतियों से भारतीयों को नुकसान हुआ है, लेकिन अमरीका के साथ हमारा करीब 150 अरब डालर का कारोबार है-अधिकतम। दोनों देश रणनीतिक साझेदार हैं। दोनों बुनियादी और मानसिक तौर पर लोकतांत्रिक भी हैं। क्या कुछ नुकसान के मद्देनजर अमरीका सरीखे देश से संबंध खट्टे किए जा सकते हैं? बेशक कई दृष्टियों से प्रधानमंत्री मोदी का यह सात दिवसीय अमरीकी प्रवास ऐतिहासिक कहा जा सकता है। ह्यूस्टन को ऊर्जा की ‘अंतरराष्ट्रीय राजधानी’ माना जाता है, क्योंकि यहां अमरीका का 50 फीसदी से भी ज्यादा तेल का उत्पादन होता है। इस क्षेत्र से हमारा 2018 में 4.3 अरब डालर का व्यापार भी हुआ है। ऐसे क्षेत्र में सार्वजनिक आवाज उछले-‘आप कैसे हैं मोदी जी?’ तो उस पर तंज नहीं कसना चाहिए। आखिर मोदी संपूर्ण भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। ऐसे अंतरराष्ट्रीय प्रवास के दौरान देश के प्रधानमंत्री के लिए समवेत स्वर होना चाहिए। घरेलू समस्याएं अपनी जगह हैं और बेहद महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन विदेश में देश के गर्व, गौरव, सम्मान को धूल धूसरित करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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