अथ हाउसिंग बोर्ड कथा

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

क्या आप कभी देश के किसी हाउसिंग बोर्ड कार्यालय में गए हैं? यदि नहीं गए हैं तो जरूर जाइए। वहां हर रोज पीडि़त आत्माओं का कुंभ लगता है, जो भांति-भांति की कथाएं लेकर उपस्थित होती हैं। आदमी कैसे बूढ़ा होता है, इसका जीवंत उदाहरण है, हाउसिंग बोर्ड। हाउसिंग बोर्ड मैं भी गया था। तब एक सहज ही प्रश्न उठा कि यहां आने से फायदा क्या है? लेना एक न देना दो, व्यर्थ चक्कर काटते रहो, उत्तर जो सात साल पहले मिला था, वही मिलेगा-‘अभी प्रायोरिटी तय हो रही है’ या ‘अभी लॉटरी निकलेगी’ या फिर ‘अभी मकान नहीं बने।’ यह भी हो सकता है कि आपको आपके किसी बकाया का पेनल्टी सहित जमा कराने का पत्र भी थमा दिया जाए या फिर आपने जो जमा कराया है उससे ही इनकार कर दें। हाउसिंग बोर्ड नौकरशाही का आदर्श है तथा भारतीय बाबू परंपरा का सजीव दस्तावेज भी। आते-जाते रहिए, संबंधित आदमी सीट पर नहीं मिलेगा, केवल जनसंपर्क अधिकारी बैठा हुआ है, जो बातों की मलहम बांट रहा है। तौबा-तौबा! घाव इतने गहरे कि उस पर मलहम से कब तक बहलाया जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर आदमी पसीने से नहाया पहुंचता है तथा इस नक्कारखाने में खो जाता है। एक कोहराम व चिल्ल-पों मची हुई है। आवास के स्थायी हल की आशा में लोगों के चेहरों पर झुर्रियां आ जमी हैं, लेकिन हाउसिंग बोर्ड के एक शिकन भी नहीं पड़ती, कानों पर जूं नहीं रेंगती या कि चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता। यह भी कह सकते हैं कि लातों के देव बातों से नहीं मानते, इसलिए यहां यत्र-तत्र थूक-फजीहत होते देखा जाना आम बात है। बस समस्या है तो एक ही जवाब मिलता है, आवेदन लिखकर रिसीप्ट में दे जाइए, उत्तर पहुंच जाएगा, लेकिन उत्तर नहीं मिलता। उलटे इस बीच यदि बकाया है और सजगता नहीं बरती गई है तो पेनल्टी बढ़ती चली जाती है। रोज-रोज नई-नई योजनाएं धन बटोरने के लिए जनता में उछाली जाती हैं, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात। केवल एक ही कार्य है, बस धन काउंटर पर जमा कराते जाओ तथा मकान मत मांगो, मकान तो आपकी आने वाली पीढ़ी को मिलेगा। मैं अब हाउसिंग बोर्ड गया तो मेरा एक लंगोटिया मिल गया। सफेद दाढ़ी-मूंछों में बुढ़ापा, थका-सा पोर्च में पसीने पोंछ रहा था, मैंने कुछ पल से गौर से पहचानने के लिए देखा, जब आश्वस्त हो गया कि वही है तो मैं बोला-‘रमेश हो न तुम ?’ मुझे पहचान गया तथा लिपट कर रोने लगा। मैंने कहा-‘तुमने यह अपना क्या हाल बना लिया है ?’ वह जोरों से रोने लगा। मैंने कहा-‘क्यों, क्या बात है ? मुझे अपनी समस्या तो बताओ।’ सुबकता हुआ बोला-‘मुझे इससे बचा लो दोस्त।’ मैंने कहा-‘किससे ?’ ‘हाउसिंग बोर्ड से।’ मैं सकते में आ गया। अच्छे-अच्छों का जीवन बर्बाद किया है इस मुये ने।                                                                                                                                                                                                                            

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