असली व्यंग्य वही जो अंतस को गहरे स्पर्श करे

Oct 27th, 2019 12:05 am

गुरमीत बेदी

मो.-9418033344

व्यंग्य रचनाएं हमारे भीतर गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने भी ला खड़ा करती हैं जिनसे हम आए दिन बावस्ता होते हैं। व्यंग्य लेखन समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति भी देता है और समाज को उद्वेलित करके उसे झिंझोड़ता भी है। असली व्यंग्य वही है जो अंतस को गहरे तक स्पर्श करे। प्राचीन साहित्य से लेकर आधुनिक काल तक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति ने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी चौंध से एक अलग ही उपस्थिति दर्ज करवाई है। रामचरितमानस तथा महाभारत में भी व्यंग्य लेखन के प्रमाण मिलते हैं। देश के मूर्धन्य साहित्यकार भी परिस्थितियों के अनुसार व्यंग्योक्तियों से अपनी बात कहते आए हैं और व्यंग्य की एक सशक्त एवं अनिवार्य उपस्थिति आज हिंदी साहित्य की धरोहर बन गई है। हिंदी साहित्य में व्यंग्य की एक पुरानी परिपाटी रही है और संत साहित्य में भी व्यंग्य का पुट देखने को मिलता है। ‘कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई चुनाय, ता चढि़ मुल्ला बांगि दे क्या बहरा हुआ खुदाय’- संत साहित्य में कबीर की व्यंग्य क्षमता का प्रमाण है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और बाद में भी हमारे देश में प्रचुर व्यंग्य लेखन हुआ है। हरिशंकर परसाई की रचनाएं आजाद भारत का सृजनात्मक इतिहास कही जाती हैं। व्यंग्य को आज सामाजिक सतर्कता के हथियार के अलावा समाज के आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है। व्यंग्य को आज साहित्य के एक तीखे औजार के तौर पर देखा व महसूस किया जाता है और इसकी मारक शक्ति से कोई भी नकाब ओढ़कर बच नहीं सकता। समाज में व्याप्त विसंगतियों और विकृतियों पर व्यंग्यकार से अधिक चोट भला कौन कर सकता है।  व्यंग्यकार की उंगलियां हमेशा समाज की नब्ज पर रहती हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में क्या पल रहा है, इसकी एक व्यंग्यकार बराबर टोह लेता रहता है। एक सैनिक अगर सरहद पर मुस्तैद रहकर दुश्मनों के नापाक इरादों का मजबूती से जवाब देता है तो एक व्यंग्यकार अपनी कलम की ताकत से सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में व्याप्त ढकोसलों, अन्याय, पाखंड और दोहरे चरित्रों की कलई खोलते हुए उन्हें बेनकाब करता है। व्यंग्यकार समाज का पहरेदार है। व्यंग्यकार लकीर के फकीर न होकर नए समय के नए सवालों की गंभीरता से पड़ताल व विवेचन करते हुए सच्चाई को निडरता से सामने लाने का रचनाधर्म निभाते हैं। व्यंग्य से आज कोई भी विषय अछूता नहीं है और अपनी रचनात्मक चेतना व अनुभवों के तार्किक विश्लेषण से व्यंग्यकार अपने सामाजिक सरोकार पूरी दृढ़ता के साथ निभाने को तत्पर रहता है। ढर्रों से हटकर अगर आज व्यंग्य लिखे जा रहे हैं तो यह साफ  है कि नए समय के सवालों से व्यंग्यकार बावस्ता है और अपने लेखन के जरिए वह बराबर इन सवालों में हस्तक्षेप कर रहा है। व्यंग्य का जन्म अपने समय की विद्रूपताओं के भीतर से उपजे असंतोष से होता है। इस विधा में व्यंजना के माध्यम से व्यंग्यकार विसंगतियों पर चोट करते हुए पाठक को सचेत करता है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त असंगतियां और इन असंगतियों की जटिलताओं के बीच जी रहे जनमानस की वेदना व छटपटाहट ही व्यंग्य की आधारभूमि बनती है। व्यंग्य लेखन के लिए स्थितियों का गंभीरता से आकलन व मनन जरूरी है। जब हम महज किसी खबर को आधार बनाकर उस पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी को ही व्यंग्य मानने लगते हैं तो इस विधा का क्षय होने लगता है। अतिप्रकाशन ने रचनात्मक व्यंग्य की गरिमा को निश्चित तौर पर चोट पहुंचाकर इसे भोथरा करने का प्रयास किया है। अखबारों के संपादकीय पन्नों में निश्चित शब्द सीमा के व्यंग्य के कालम पढ़ते हुए कई बार सोचना पड़ता है कि क्या यह जो पढ़कर हटे हैं, वह सचमुच में व्यंग्य था? जीवन की आपाधापी के बीच महज कालम पूरा करने के लिए व्यंग्य की रचनात्मकता को दांव पर लगाना और तात्कालिकता के जाल में फंसकर व्यंग्य उत्पादित करने का लोभ न संवार पाना आज रचनात्मक व्यंग्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है।   परसाई कहा करते थे कि व्यंग्यकार का मानवीयता और मानव जीवन से गहरा सरोकार होना चाहिए। यदि यह सरोकार उसके पास नहीं है तो वह जो कुछ लिखेगा वह खुद फूहड़ हो जाएगा, हास्यास्पद हो जाएगा, उसकी धार खत्म हो जाएगी और यह सस्ती एवं टुच्ची चीज बन कर रह जाएगी। हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में जितनी बहसें कहानी, कविता व उपन्यास के परिदृश्य को लेकर होती आई हैं या हो रही हैं, उतनी बहसें, गोष्ठियां व वक्तव्य व्यंग्य लेखन की विधा को लेकर नहीं हुई। अब व्यंग्य साहित्य को समर्पित पत्रिकाओं, व्यंग्य यात्रा, अट्हास सहित कुछ साहित्यिक संस्थाओं ने अपने स्तर पर व्यंग्य के विभिन्न पहलुओं व विषयों को लेकर चर्चाओं, गोष्ठियों व वक्तव्यों का सिलसिला शुरू किया है, लेकिन अभी भी बड़े पैमाने पर ऐसे आयोजन दरकार हैं। निश्चित तौर पर इनके जरिए व्यंग्य की वर्तमान स्थिति की पड़ताल होती रहती है और व्यंग्य विधा को अपनाने वाले नए लेखकों को आत्ममंथन करने, वरिष्ठ व्यंग्यकारों का सान्निध्य हासिल करने और चर्चाओं में अपने विचार रखने का मौका मिलता है। स्वाभाविक रूप से इसका प्रभाव उनकी रचनाशीलता में परिलक्षित होने लगता है। व्यंग्यकार समाज का सबसे बड़ा चिकित्सक भी होता है और चित्रकार भी। राजनीति व समाज की जुगलबंदी पर उसकी पैनी निगाह रहती है। वह पीड़ा को शब्द देता है। जनता के भीतर पल रही कसमसाहट का चित्रण करता है। अगर करुणा की अंतर्धारा भी व्यंग्य के भीतर रहती है तो व्यंग्य और भी मारक व प्रभावशाली होकर सामने आता है। व्यंग्यकार को समझौतावादी नहीं बल्कि विद्रोही और विचारों से क्रांतिकारी होना चाहिए।  समकालीन व्यंग्य की अगर पड़ताल की जाए तो एक बात साफ  तौर पर सामने आती है कि व्यंग्यकार का राजनीतिक व सामाजिक विवेक घुप्प अंधेरे में टिमटिमाते जुगनुओं सा अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पा रहा है। साथ ही समकालीन व्यंग्य में सामाजिक जीवन का श्वास बड़ी शिद्दत के साथ महसूस होता है और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को तिलमिला देने वाले व्यंग्य बराबर लिखे जा रहे हैं। व्यंग्य की सुंदरता यही है कि वह अंतस को गहरे स्पर्श करे। व्यंग्य संवेदनशील एवं सत्यनिष्ठ मन द्वारा विसंगतियों पर की गई प्रतिक्रिया है। व्यंग्य लेखन के लिए युगचेतना और युगबोध का स्पष्ट बोध भी जरूरी है। व्यंग्य के रूपक और चित्र-विधान अगर आम जनजीवन से लिए हुए हों और भाषा में इतना दम व धार हो कि वह सीधे पाठकों के मर्म को भेदकर उसे मर्माहत और बेचैन कर दे तो व्यंग्य का असर कई गुणा बढ़ जाता है। व्यंग्यकार की भाषा की सहजता और जीवंतता पर ही व्यंग्य टिका रहता है और जहां भाषा व शिल्प कमजोर हुआ नहीं कि व्यंग्य महज सपाट बयानी बनकर रह जाता है। शिल्प की सजगता ही व्यंग्य लेखन की विशेषता है। भाषा में वक्रता के द्वारा व्यंग्यकार शब्दों और विशेषणों का विशिष्ट संयोजन करते हैं। नई पौध के व्यंग्यकारों को भी यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए।

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि और संभावना-4

अतिथि संपादक : अशोक गौतम

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि तथा संभावनाएं क्या हैं, इन्हीं प्रश्नों के जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचल में व्यंग्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस सीरीज की चौथी किस्त…

विमर्श के बिंदू

* व्यंग्यकार की चुनौतियां

* कटाक्ष की समझ

* व्यंग्य में फूहड़ता

* कटाक्ष और कामेडी में अंतर

* कविता में हास्य रस

* क्या हिमाचल में हास्य कटाक्ष की जगह है

* लोक साहित्य में हास्य-व्यंग्य

बाढ़ की जय!

डा. अशोक गौतम

मो.-9418070089

जैसे ही सरकारी विभागों को पता चला कि नेताजी उनके मंडल में पड़ने वाले बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का औचक दौरा करने आने वाले हैं तो उनके हाथ-पांव फूल गए। यार! ये नेता भी न! जब देखो! हमारी भली-चंगी नींद खराब कर देता है। उस मंडल के सरकारी विभागों के हर अफसर को यह भी पता था कि नेताजी को सबसे अधिक कुछ पसंद है तो बस भाषण सुनने के लिए श्रोता। वे चाहे जिंदे हो, चाहे मरे हुए। पिछली दफा उन्होंने वहां के श्मशानघाट के जीर्णोद्धार के मौके पर क्या गजब का भाषण दिया था कि वहां जले वाह! वाह! कर उठे थे। जहां पर उन्हें उनके नंबरमाफिक श्रोता उनका भाषण सुनने को न मिलें, वे वहां के सरकारी विभागों के अफसरों की ऐसी क्लास लगा कर रख देते हैं कि पूछो ही मत। भले ही अपने आप वे कभी क्लास में न गए हों। नेताजी का बाढ़ग्रस्तों को सांत्वना देने का कार्यक्रम ज्यों ही फाइनल हुआ तो सब अफसरों को पता होने के बाद भी एहतियातन नेताजी के पीए ने सबको फैक्स कर साफ  कर दिया कि वे अबके बाढ़ के बीच बाढ़ग्रस्तों को बाढ़ में संबोधित कर इतिहास रचना चाहते हैं। भीड़ कम न हो वरना…हालांकि दूसरी ओर अफसरों को पता था कि बाढ़ से डरकर अब वहां बचे ही कितने हैं। जो जैसे-कैसे बाढ़ से बचे थे, वे अपने-अपने रिश्तेदारों के जा चुके थे। सरकारी विभागों के अफसरों ने तब बहुतों से अपने घर छोड़ कर वहां से जा चुकों से निवेदन भी किया कि हे बाढ़ से अपने बूते पर बचे शेष जीवो! नेताजी तुम्हें संबोधित करने आ रहे हैं। आज की ध्याड़ी ले लो, पर अपने प्यारे बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में केवल एक बार आओ तो सही! देखो, तुम्हारे गिरे घर तुम्हें पुकार रहे हैं। देखो! बाढ़ में डूबकर मरे मवेशी तुम्हें पुकार रहे हैं! पर कोई भी वहां आने को तैयार न हुआ। होता भी क्यों, उसी बाढ़ से तो वे जान बचाकर भागे थे जैसे-कैसे। और…सरकारी विभागों की अपील अबके फिर बेकार गई। तब हर विभाग के खाला अफसर ने एक सा ही सोचा कि क्यों न! अपने ही विभाग के कर्मचारियों को उनके परिवार सहित फटे-पुराने कपड़े पहना बाढ़ के पानी में कुछ देर के लिए नेताजी के सामने खड़ा कर दिया जाए! वे सरकारी कर्मचारी हैं, जनता नहीं। किसी और के प्रति ईमानदार होना उनका दायित्व बनता हो या न, पर सरकार के प्रति ईमानदार होना उनका नैतिक दायित्व है। वैसे भी वे साल के बारह महीने हराम की ही तो खाते हैं। नेताजी के लिए एक दिन जो घंटा-दो घंटा बाढ़ के पानी में खड़े हो लेंगे तो कौन से मर जाएंगे…और सब सरकारी अफसरों ने आपस में बात कर तत्काल यह आदेश निकाल डाले-‘विभाग के तीसरी श्रेणी के कर्मचारी से लेकर फर्स्ट क्लास तक सबको सूचित किया जाता है कि कल नेताजी हमारे क्षेत्र के बाढ़ग्रस्त इलाके का दौरा करने वाले हैं। उनकी दिली इच्छा है कि हम सब कल सुबह दस बजे शार्प तय बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के पानी के बीच इकट्ठा हो जाएं। …और हो सके तो जिन-जिन की फाइलें हमारे ऑफिस में फांसी का फंदा लगाने को तैयार हैं, उन्हें भी आदेश दिया जाए कि वे जो कल अपने-अपने परिवारों, रिश्तेदारों के साथ, अपने पड़ोसियों के साथ वहां पहुंचेंगे तो उनकी बरसों से धूल फांकती फाइलों की धूल परसों दस बजे ऑफिस खुलते ही झाड़ दी जाएगी। जो हमारे विभाग का कर्मचारी अपने साथ अपने परिवार के अलावा जितने बंदे और लाएगा उसे उतने दिन का विशेष अवकाश दिया जाएगा। जो इस आदेश में कोताही करेगा, झूठा तो झूठा, सच्चा मेडिकल प्रस्तुत करेगा, उसके खिलाफ  कड़ा अनुशासनात्मक एक्शन लिया जाएगा।’ विभागीय आदेश सुन सारे सन्न! पर हो कुछ नहीं सकता था। अपने-अपने विभाग की इज्जत का सवाल था, सो सब अपने पूरे परिवार को फटे-पुराने कपड़े पहना नौ बजे बाढ़ वाली तय जगह पर अपने-अपने हाथों में ऑल आउट ले बाढ़ के पानी में खड़े हो गए। रेस्ट हाउस में जीभर भक्षण करने के बाद नेताजी के स्वागत के लिए आए अफसरों से पूछा, ‘तो कितने लोग हैं बाढ़ के पानी में हिम्मत से खड़े बाढ़ के पानी के बीच मेरा क्रांतिकारी भाषण सुनने को बेताब?’  ‘सर! कम से कम यही कोई दो-तीन हजार तो होंगे ही। सर! वे सब बेसब्री से आपका इंतजार कर रहे हैं सर कि आप कब जैसे वहां पहुंचे और आपके ओजस्वी विचार उनके पानी में डूबे दिमाग में क्रांति ला दें। अब आप जो उन्हें संबोधित करने चलें तो वे पानी से बाहर निकल अपने-अपने नजदीक के हॉस्पिटल को जाएं।’ ‘गुड! इतने बच गए इस बाढ़ में अबके भी? हमने तो सुना था कि… मतलब मीडिया सनसनी फैला रहा था।’ ‘सर! मीडिया का काम तो है ही सनसनी फैलाना! जो तिल का ताड़ न बनाए वह मीडिया ही काहे का! सर! बच तो और भी जाते, पर क्या है न कि हमारी सरकारी मोटर वोटों का डीजल खत्म हो गया था।’ डीसी साहब ने सिर नीचा किए कहा तो नेताजी मुस्कुराते बोले, ‘होना भी चाहिए। ऐसा होने से ही तो जनसंख्या नियंत्रण में होती है डियर!  तो अब चलें…।’ ‘जी सर!’ डीसी साहब के कहते ही उन्होंने अपना पायजामा खोलकर उनको थमाया तो डीसी साहब ने पूछा, ‘सर ये क्या? बिन पायजामे के?’ ‘नेता बिन पायजामे के ही अच्छा लगता है। नंगी जनता के बीच पायजामा पहन कर जाओ तो उसे बहुत बुरा लगता है भाई! हम इतने इमोशनलेस भी नहीं कि…’ नेताजी ने मुस्कुराते हुए कहा और नंगी टांगों के रेस्ट हाउस से बाहर निकल गए। अफसरों में नेताजी को अपने-अपने कंधे पर एक-दूसरे से बढ़कर उठाने की होड़ लगी और घंटे भर में नेताजी को कभी इस कंधे तो कभी उस कंधे उठाता सरकारी अफसरों का काफिला बाढ़ग्रस्तों के बीच पहुंच गया। उन्होंने बाढ़ के पानी में कमर-कमर तक खड़े हुए विभागीय कम अभागीय बाढ़ग्रस्त कम विवशताग्रस्त असहाय देखे तो उनका मन भर आया। तब उन्होंने अपने कुरते के किनारे से अपने मन को पोंछने के बाद कहा, ‘अरे! हमें तो पता ही नहीं था कि हमारे घर के इतने लोग बाढ़ का शिकार हुए हैं?

मतलब, अबके हथिया से मिलकर इंद्र ने बदतमीजी की सारी सीमाएं पार कर दीं, कोई बात नहीं, हम उसे भी देख लेंगे। बस, एक बार मौसम ठीक हो जाए।’ उसके बाद उन्होंने एकाएक एक अफसर के कंधे पर चढ़ बाढग्रस्तों को संबोधित करना शुरू किया…‘हे मेरे क्षेत्र के बाढ़ का अपने दम पर मुकाबला करने वाले घुटने-घुटने पानी के बीच गले तक डूबे प्रिय बाढ़ग्रस्तो! तुम्हारे जज्बे को मेरा सलाम! मुझे यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि बाढ़ के पानी के बीच तुम अभी भी सही सलामत हो। असल में क्या है न कि ये प्राकृतिक आपदाएं ही हैं जो हमें अपनी प्रिय जनता से मिलने का सुनहरी मौका देती हैं। वैसे तो हम और जगह इतने व्यस्त रहते हैं कि…किस सरकारी राशन की दुकान का आटा खाते हो यार तुम लोग? तुम्हें सलामत होना भी चाहिए। अभावों से भरे देश को ऐसे ही साहसी नागरिकों की जरूरत है। ये तो कोई बात नहीं होती कि जरा सी धूप लगी तो चीखते हुए सरकारी सहायता! सहायता! गाने लगे। साहस हो तो ऐसा! बाढ़ में फंसी हे साहसी आत्माओ! देश को आगे ले जाने को आतुर नेताजी का एकबार फिर सलाम स्वीकार करो। हमें ऐसे ही नागरिकों की जरूरत है। वाह! बाढ़ में सगर्व खड़े होने पर भी चेहरे पर कितनी प्रसन्नता! इसे कहते हैं विशुद्ध राष्ट्रवादी भावना! देश को ऐसे ही वफादार नागरिकों की जरूरत है जो बेरोजगार हों, पर रोएं नहीं। आकंठ बेरोजगारी में डूबने पर भी चेहरे पर अक्षुण्ण प्रसन्नता बनाए रखें। देश को ऐसे ही नागरिकों की जरूरत है जो महंगाई में रोएं नहीं। आकंठ महंगाई में डूबे होने के बाद भी चेहरे पर प्रसन्नता बरकरार रखें। भूख की कोई सीमा नहीं। देश का श्रेष्ठ नागरिक वही जो पेट पर नियंत्रण रखे। देश को आज तुम जैसे आदर्श नागरिकों की सख्त जरूरत है। लोकतंत्र तुम्हारे इस जज्बे को हमेशा याद रखेगा। मित्रो! ये जो बाढ़ है, हम इससे पूछना चाहेंगे कि ये बिना बताए कैसे आई? लगता है इसके पीछे नापाक पाक का हाथ है। वह नहीं चाहता कि हमारे देश का विकास हो! कोई बात नहीं! हे बाढ़ में सदा प्रसन्न रहने वालो! हम इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाएंगे। तुम हिम्मत बनाए रखो! हम तुम्हें न्याय दिलाएंगे। चाहे मरने के बाद ही सही! हम राजनीति में आए ही हरेक को न्याय दिलाने के लिए हैं…।’ वे बोले जा रहे थे और सरकारी लोक संपर्क  विभाग वाले उनके विभिन्न कोणों से अखबारों के लिए बढि़या-बढि़या फोटो खींचे जा रहे थे। अचानक उन्हें सामने से एक भैंगा मच्छर उड़ता हुआ अपनी ओर आता दिखाई दिया तो उन्होंने अपने भाषण को लगाम देते कहा, ‘तो हे मेरे क्षेत्र के बाढ़ में जैसे-कैसे बने रहने वाले साहसी नागरिको! तुमसे मिलकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। इतनी कि जितनी मुझे अपनी बीवी से मिलकर भी नहीं होती। भगवान तुम्हारे बाढ़ में खड़े रहने के हौसलों को युगों-युगों यों ही बनाए रखें। हर बाढ़ और सूखे में तुम यों ही सीना तान कर खड़े रहो, मेरी तुम सबके लिए भगवान से यही कामना! जय बाढ़ ! जय भारत! बाढ़ की जय!’ उन्होंने पूरे जोर से कहा तो बाढ़ के पानी में अपने-अपने परिवारों के साथ खड़े उस इलाके के हर सरकारी विभाग के परिवार वालों ने भी जोर से अपनी-अपनी नाक साफ  करते कहा, ‘बाढ़ की जय!’ तभी साथ आए सरकारी अफसर नींद से जागे। उन्हें लग गया कि अब नेताजी का क्रांतिकारी भाषण समाप्त होने वाला है। इसलिए उन्होंने भी पूरे जोर से नारा लगाया, ‘बाढ़ की जय! बाढ़ की जय!!’

अपने-अपने विभाग के अफसर को नेताजी के बाद बाढ़ की जय का नारा लगाने के बाद बाढ़ के पानी में खड़े हर विभाग के कर्मचारी ने अपने परिवार के साथ गीदड़ों की तरह हू में हू मिलाते नारा लगाया, ‘बाढ़ की जय! बाढ़ की परम जय!!’…और वे बाढ़ की जय के नारों के बीच मुस्कुराते हुए अपने सबसे उम्दा चमचे अफसर की पीठ पर से भाषण देने के बाद उतरे और नंगी टांगों में ही रेस्ट हाउस में रेस्ट करने निकले तो बाढ़ के घुटने-घुटने पानी में गले-गले तक गंदे पानी में जैसे-कैसे डूबे हर विभाग के कर्मचारी ने अपने-अपने परिवार के साथ राहत की सांस ली।

किताब मिली

विश्वविख्यात अटल बिहारी वाजपेयी :  जीवन गाथा

सुदर्शन भाटिया ने अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन गाथा को बड़े मनोयोग से, श्रमपूर्वक अध्ययन करके मनोरंजक शैली में प्रस्तुत किया है। 208 पृष्ठों की इस पुस्तक में कुल 38 अध्याय हैं। बाल्य काल से लेकर राजनीतिक जीवन और साहित्यिक जीवन की घटनाओं को इसमें क्रमबद्ध ढंग से पिरोया गया है। धरा पर आगमन तथा कार्य क्षेत्र में अटल जी के परिवार की गाथा दी गई है। इस अध्याय में अटल जी की साफगोई भी झलकती है। कविताएं लिखने का शौक अटल जी को बचपन में ही लग गया था। अटल जी की राजनीतिक यात्रा में उनके छात्र जीवन से लेकर राजनीतिक जीवन की अनेक घटनाओं को समायोजित किया गया है। पूरी किताब में अटल जी की विविध गाथाएं हैं। किताब सरल भाषा में लिखी गई है।

* विश्वविख्यात अटल बिहारी वाजपेयी-जीवन गाथा : सुदर्शन भाटिया, आरके पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स दिल्ली, 495 रुपए

 

जीवन में हास्य भोजन में नमक जैसा

वीना ठाकुर

मो.-7018714515

अगर हम हंसना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने से एक प्रश्न पूछा जाए कि हम हंसना क्यों चाहते हैं? हंसने की आखिर हमारे जीवन में जरूरत क्या है? इस हंसने के लिए हम क्या क्या नहीं करते? कहां कहां नहीं जाते? क्या क्या नहीं मनाते? क्या क्या नहीं पढ़ते?  किसी से भी पूछ लीजिए कि हम क्यों पैदा हुए हैं? कम से कम वह यह तो कहेगा ही कि आनंद के लिए, मौज के लिए। जब वह यह कहे तो मान लीजिए बिल्कुल सही है। असल में हम आनंद की अनुभूति के लिए पैदा हुए हैं। यह जीवन आनंद से अधिक और कुछ नहीं। यह बात दीगर है कि हम इस परेशानियों में ही सुलझाए रखते हैं। रोने-धोने, निषेधात्मक, चिंताओं में हर पल बेचैन रह जिंदगी गुजारना किसी के जीवन का कतई मकसद नहीं, पर हम बना लेते हैं। माना, हमारे आसपास विषमताएं हैं, द्वंद्व है, दुरूहता है, पर इन सबके बावजूद हर हाल में हंसते रहना और चुनौतियों का डट कर मुकाबला करना भी तो एक तरह का जीवन है, अगर देखा-समझा जाए तो। सच पूछो तो साहित्य ने चाहे वह लोक साहित्य हो या परिमार्जित साहित्य, हर युग में मानवीय मन और मस्तिष्क पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। कारण, हर काल में साहित्य अपने शिल्प, भाव की खासियतों के  चलते  जीवन के आसपास रहता आया है। साहित्य के नौ रस माने गए हैं। लेकिन जो मजा हास में है वह अन्य रसों में कहां! हास्य रस इसलिए सबसे ऊपर है क्योंकि इसके चलते हर अपने समय में चाहे वह रूप गद्य हो या पद्य, दूसरों में सबसे प्रासंगिक हो जाते हैं। जीवन और साहित्य में हास्य रस एक ऐसी पूंजी है जो हंसने वाले को तो स्वस्थ बनाती ही है, उसके आस-पास वालों को भी मानसिक स्तर पर शांति प्रदान करती है। भले ही हम सबके देश और क्षेत्र की भाषा और भाषा की समझ अलग-अलग हो लेकिन मेरे, आपके जीवन से जुड़े हर हास्य की भाषा और उसकी अनुभूति एक सी ही होगी। विश्वास नहीं तो जांच-परख कर देख लीजिएगा। हम एक दूसरे को भले ही ऐसे न समझ पाएं, परंतु हास्य हमें एक दूसरे से पल भर में परिचित करवा देता है। साहित्य और जीवन में हर चीज की सीमा रेखा हो सकती है, पर हास्य की कोई सीमा रेखा नहीं होती। वह सीमाओं से परे होता है। वैसे तो हर काल के साहित्य और जीवन में हास्य का महत्त्व निर्विवाद रहा है परंतु आज के तनावपूर्ण जीवन में हास्य का विशेष महत्त्व है। तभी तो हमें हंसने के लिए भी आज क्लब ज्वाइन करने पड़ रहे हैं। हास्य रस का आनंद लेने के लिए आवश्यक है कि अपने भीतर तो सकारात्मक ऊर्जा हो ही किंतु इसके साथ ही साथ हमारे आसपास भी  सकारात्मक ऊर्जा वाले लोग हों जो सर्वदा माहौल को खुशनुमा बनाए रखें, विषम परिस्थितियों से जूझते हुए भी। यदि हास्य के स्तर पर हम भीतर से खाली हैं तो कोई भी साहित्य की विधा हमें हंसा नहीं सकती। हसंने के लिए पहले अपने भीतर हंसी होना जरूरी है। उसके बाद ही बाह्य साहित्यिक वातावरण हमें हंसने के बहाने देगा। कथन असत्य हो तो भीतर हंसी न होने पर किसी भी हास्य रस से ओतप्रोत किसी भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रचना के भीतर से गुजरते हुए हंसने की कोशिश करके देख लीजिएगा, उसी क्षण उत्तर मिल जाएगा। तय मानिए, कि आपाधापी के युग में हमें बिन ढूंढे ही सब कुछ मिल सकता है। पर नहीं मिलता तो बस उन्मुक्त हास। अगर यह उन्मुक्त हास हमें चाहिए तो उसका सबसे उम्दा स्रोत वह व्यंग्य है जो कई स्तरों पर हमें आनंदित करता  करने का धर्म रखता है। अपने भीतर हरा भरा रखने के लिए चाहे हंसने का माध्यम कोई भी क्यों न हो, हमें हर स्थिति में अपने भीतर से हंसने को प्राथमिकता देनी ही होगी जो हम तनाव मुक्त जीने की काशिश करना चाहें तो। और भीतर से हंसने के ऐसे सबसे अधिक अवसर हमें आज की तारीख में व्यंग्य प्रदान करता है। बस, जरूरत इस बात की है कि हम उन अवसरों को दिमाग से जाने न दें। सच पूछो तो आज हमें और तो सब कुछ आता है पर हंसना बिलकुल भी नहीं आता। हंसने के नाम पर भी आज हम दंभ करने लगे हैं। या कि हम जैसे हंसना भूल गए हों। कारण, आज का जीवन बहुत जटिल, कठिन और तनावपूर्ण हो गया है। हम चाह कर भी इस तनाव से मुक्ति नहीं पा सकते। इस तनाव से मुक्ति दिलाने वाला ऐसे में कोई तो ऐसा होना चाहिए जो हमें हंसाए। इक्कीसवीं सदी का साहित्य जिसमें मुख्य रूप से व्यंग्य अग्रणी है, हास्य और विचार की नई दिशा की ओर संकेत कर रहा है। इस दौर में जन्मा व्यंग्य के माध्यम का हास्य समाज की विसंगतियों से उपजा क्रूर हास्य है। व्यंग्य भरी विसंगतियों के बीच से उपजा हास्य हमारी भावनाओं को नापने के लिए थर्मामीटर सा है। आज हमारे लोकतंत्र में जितने पाखंड हैं, चोंचले हैं, विद्रूपताएं हैं, विसंगतियां हैं, सियासत में छल-प्रपंच  की चौसरें बिछी हुई हैं, वे सब मन को बहुत आहत करती हैं। आज के दम घोंटू वातावरण में इसी व्यंग्य के बीच से उपजा हास्य समाज को ऑक्सीजन का काम करता है। इस बहाने और कुछ कम हो या न, पर समाज का तनाव कम होता है और तनिक फौरी ही सही, राहत मिलती है। साहित्य में व्यंग्यात्मक हास्य पैदा करने के लिए साहित्यकार अपने शब्दों द्वारा किसी पात्र विशेष या घटना का समयानुरूप चित्रण करते हुए पाठक के मन में हास्य भाव उत्पन्न करने की सफल कोशिश करता है। कभी-कभी साहित्यकार अपने शब्दों को बेढंग रूप से प्रयोग करते हुए भी हास्य भाव की उत्पत्ति देता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आज के जीवन के लिए भले ही आज कुछ प्रासंगिक हो या न पर व्यंग्य और व्यंग्य से जन्मा हास्य सबसे अधिक प्रासंगिक है और हर काल में प्रासंगिक रहेगा, क्योंकि हर काल के जीवन में व्यंग्यात्मक हास्य का वही महत्त्व रहा है जो भोजन में नमक का रहा है। और जब तक हम हैं, तब तक रहेगा भी।

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