आरे से मकलोडगंज तक

By: Oct 9th, 2019 12:03 am

उपचुनाव उवाच-18

मुंबई में मैट्रो लाइन-3 के बीच आरे के पेड़ क्या खड़े हुए समाजसेवियों के कान खड़े हो गए और बेगैरत पच्चीस सौ पेड़ों की कटाई ने हो हल्ला मचा दिया। इस मुकाबले में मेरा मकलोडगंज शांत है और नागरिक चूडि़यां पहनकर विधानसभा उपचुनाव के मुद्दों को तसदीक करते हैं। मुझे यानी धर्मशाला को पेड़, खेत, खड्डें और कूहलों से प्रेम रहा है, लेकिन भागसूनाग से चड़ी या चरान से कोतवाली और जेल तक आती कूहलों को खोजकर बताओ। खनियारा और दाड़ी की कूहलों का पता मिले तो बताना। मेरी खड्डों से निकलती कूहलों ने जमानाबाद-अबदुल्लापुर तक राज किया, लेकिन अब तमाम जल स्रोत फकीर हैं। +वाटर फॉल को कैंटोनमेंट एरिया पी गया और बाकी मुहानों पर माइक्रो हाइडल प्रोजेक्ट्स छा गए। जंगल के बीच धर्मशाला का अस्तित्व आज भी कुछ क्षेत्रों को आरक्षित या  जमीन की रक्षा में ग्रीन बेल्ट करार देता है, लेकिन इन्हीं पेड़ों को काटकर माया नगरी बनते मकलोडगंज की सूरत पर तरस आता है। मुख्य चौक  से सबसे पहले देवदार के पेड़ गायब करने वाले व्यवसायी आज वहां होटलों के स्वामी हैं। समाज के प्रतिष्ठित लोगों ने ही मकलोडगंज, नड्डी, तलणू,  भागसूनाथ और धर्मकोट के हजारों पेड़ों को जहर दिया। हर होटल की नींव में दबे पेड़ बताते हैं कि आरे से बहुत पहले मेरे वजूद में पलते लोगों ने आरियों से मेरा कत्ल  किया है, क्या आपने कभी सुना कि वन विभाग ने ऊपरी धर्मशाला में पौधारोपण किया और नए पेड़ कहां उगे। बेशक जंगलात से विकास को कुछ हद तक अनुमति चाहिए ताकि सार्वजनिक जरूरतें और भविष्य की अधोसंरचना मुकम्मल हो, लेकिन मुझे बिल्डरों से डर लगता है। मुंबई के नागरिक ऊंची इमारतों से डरते हैं, लेकिन मेरी आंखें बंद करके मकलोडगंज पर चढ़ती इमारतों को खामोशी से देखते हैं। मैं शिमला की नकल नहीं कर सकता, इसलिए ऊंचे वजूद में जंगल नहीं खोना चाहता। आरे में मैट्रो के हवाले से पेड़ कटे मेरे लिए बस स्टैंड के दायरे में पेड़ कटे। मकलोडगंज के माथे पर बस स्टैंड टिका दिया, लेकिन बिल्डर ने व्यापारिक कारोबार का उद्देश्य पूरा किया। कार पार्किंग की जगह होटल और बस स्टैंड के नाम पर व्यावसायिक परिसर ने मुझे सत्ता से सताया। मकलोडगंज का बीओटी अदालत तक गया और सुप्रीम कोर्ट के दखल से अपराधी बन कर खड़ा है। मेरे शहर का एक वकील ऐसे मुद्दों की जिरह बनता जा रहा, वरना लूट कर परिवहन का एक पूर्व मंत्री चलता बना था। अतुल भारद्वाज ने मुंबई और दिल्ली के एनजीओ के साथ मिलकर मेरी दुखती रग पर हाथ रखा, वरना विकास  के नाम पर जंगल को भी निजी व्यवसाय में साधने की होड़ लगी है। अतुल है तो भाजपाई, लेकिन पार्टी से अछूत है। क्या भाजपा ऐसे युवाओं को फिरकापरस्त समझती है या समाज इन्हें सिरफिरा करार देता रहेगा। आरे का विरोध युवा कर रहे हैं, लेकिन धर्मशाला में पर्यावरण के प्रति सकारात्मक सोच को सिरफिरा बना दिया जाता है तो एनजीटी दृश्य में आता है और होटलों की चाबियां ले जाता है। आज दर्जनों होटल बंद हैं, तो मुझे यकीन है जीतनेवाला प्रत्याशी शिद्दत से इन्हें खुलवाने तथा मकलोडगंज को यथास्थिति में जीने की छूट दिलाने की कोशिश करेगा। आरे से कहीं भिन्न मुझे आरियों के साथ अभी न जाने कितने पेड़ चोरी छिपे कटवाने हैं।

गायब होते पेड़ों के ठूंठ पर,

कलम तोड़ 

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