आस्ट्रेलिया खाएगा हिमाचल का देसी आम

सैंसोवाल सहकारी सभा से एमओयू साइन

हिमाचल में मुख्यतः चौसा, लंगड़ा, दशहरी व पुराना देसी आम पाया जाता है। आम की सालाना 23 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा पैदावार होती है। कुल 38 हजार हेक्टेयर पर मैंगों प्रोडक्शन होती है…

भले ही हिमाचल में देसी आम की कद्र न हो, लेकिन आस्ट्रेलिया को यह भा गया है। कुछ समय पहले दिल्ली में हुए इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में हिमाचल से पहुंचे आमों पर आस्ट्रेलिया के नुमाइंदों पर नजर पड़ी थी। सैंसोवाली सहकारी सभा के स्टाल पर सजाया गया। देसी कच्चा आम उन्हें बहुत पसंद आया। इसके बाद अब बात एमओयू साइन होने के बाद सप्लाई पर जा पहुंची है। अगले जून माह में हिमाचली आमों की पहली खेप आस्ट्रेलिया जाने वाली है।  करार के तहत अनलिमिटेड देसी व कच्चे आम एक्सपोर्ट किए जाएंगे। सैंसोवाल सभा प्रदेश भर के बागबानों से आम लेगी। सभा का लक्ष्य है कि जल्द ही प्रदेश सरकार के सहयोग से बागबानों से संपर्क किया जाए। ग्रेडिंग के बाद माल सप्लाई होगा, जिससे बागबानों को ठीकठाक कीमत मिलेगी। गौर रहे कि हिमाचल में अकसर सरकारी मैनेजमेंट सही न होने के चलते आम की फसल का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है।  उधर सेंसोवाल कृषि सहकारी सभा के चेयरमैन शिव शशि कंवर ने बताया कि सभा अपनी स्थापना के 100 साल पूरा कर रही है। ऐसे में यह करार ऊना के लिए मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

जानिए, रूट स्टॉक के बारे में एमएम 106

यह रूट स्टॉक सेब की किस्म नॉर्दर्न स्पाई और एम 9 के मेल से विकसित किया गया है और सैमी विगोरस वर्ग का रूट स्टॉक है। इस बार ग्राफ्ट किए गए पेड़ 3.4 से 4.5 मीटर ऊंचे हो जाते हैं और 3-5 साल में फल देने लगते हैं। जड़ों की जमीन की पकड़ काफी अच्छी होती है इसलिए इसे किसी भी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं है। इस रूट स्टॉक पर ग्राफ्ट किए गए पेड़ों के पत्ते बाकी पेड़ों के मुकाबले थोड़े बाद में झड़ते हैं और इनमें डौर्मेन्सी भी देर से आती है। इस कारण इनमें अकसर सर्दी से नुकसान होने की संभावना रहती है।

जहां पानी, , वहां मिलेंगे सेब के बूटे

प्रदेश के जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पूरी व्यवस्था है, वहां के बागबानों को सेब के पौधे दिए जाएंगे। पूर्व की वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में 1134 करोड़ के बागबानी विकास प्रोजेक्ट में कंसल्टेंट पर ही करोड़ों रुपए फूंक दिए। पूर्व की खामियों को देखते हुए वर्तमान जयराम सरकार 1688 करोड़ के बागबानी प्रोजेक्ट के लिए कोई भी विदेश कंसल्टेंट तैनात नहीं करेगी। प्रदेश के किसी भी क्षेत्र में सिंचाई का साधन है और जिनके पास अपनी जमीन है, उसे सरकार सेबे के पौधे देगी। पूर्व सरकार के कार्यकाल में विदेशों से बड़े पैमाने पर रूट स्टॉक मंगवाए गए, जिनमें से लगभग 50 प्रतिशत पहुंचते ही सूख गए। हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थितियां व जलवायु उन देशों से भिन्न हैं, जहां से इस प्रकार के रूट स्टॉक मंगवाए जाते रहे हैं। बागबानी विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2023 तक 13 लाख रूट स्टॉक मौजूदा अधोसंरचना के अनुरूप तैयार होंगे। वित्त वर्ष 2019-20 के लिए इस परियोजना के तहत लगभग 150 करोड़ रुपए की वार्षिक कार्य योजना को भी स्वीकृति प्रदान की। कुल मिला कर प्रदेश में बागबानी विकास के तहत 1688 और मशरूम की खेती के लिए 423 करोड़ का प्रोजेक्ट है। वहीं दूसरी तरफ 1134 करोड़ के बागबानी विकास प्रोजेक्ट में पाई गई अनियमित्ताओं की जांच चली हुई है।

वरिष्ठ संवाददाता, शिमला

सिरमौरी अदरक के क्या कहने बिक रहा 40 रुपए किलो

हिमाचल में एक सीजन में करीब 22 हजार टन अदरक की पैदावार होती है। प्रदेश में अदरक की प्रोडक्शन  का 70 फीसदी हिस्सा सिरमौर से आता है। यानी अदरक उगाने में सिरमौर का कोई मुकाबला नहीं है। सिरमौरी  अपने अनूठे स्वाद और रंग व साइज के चलते दुनिया भर में पहचान  बना चुका है। इन दिनों अदरक की खुदाई शुरू हो गई है। पच्छाद समेत जिला के कई इलाकोें में अदरक की खुदाई चल रही है। किसानों ने बताया कि इस बार उन्होंने पांच हजार रुपए प्रति मन बीज खरीदा था। या नी 40 रुपए में एक किलो। अब फसल तैयार है, तो उन्हें अदरक के दाम 2200 से 2300 रुपए मन मिल रहे हैं। यानी किलो अदरक 40 रुपए में बिक रहा है, जो कि संतोषजनक है। फसल ठीक है, उम्मीद है, दूसरी फसलों में चल रहे घाटे को अदरक दूर कर देगा। तो ये हैं सिरमौरी अदरक के हाल।

रिपोर्ट संजय राजन, सराहां

हिमाचल में देसी गाय खरीदने पर 25 प्रतिशत सबसिडी

जीरो बजट खेती को बुलंद करने के लिए हिमाचल में नए नए प्रयास हो रहे हैं। इसी कड़ी में अब कृषि विभाग पशुपालकों को देसी गाय खरीदने पर 25 फीसदी सबसिडी दे रहा है। तर्क है कि देसी गाय प्राकृतिक खेती का मुख्य साधन है। अकेले कांगड़ा जिला में देसी गाय पर सबसिडी के लिए 35 लाख रुपए का बजट चुका है। विभाग ने देसी गाय की श्रेणी में  गिर, थार, रेड सिंधी, पारकर आदि नस्लों को रखा है। नियम के अनुसार पशुपालक को गाय खरीदने के बाद विभाग से निरीक्षण करवाना होगा।   वेटरिनरी विभाग के अनुदेशन पर ही  कृषि विभाग पशुपालकों को सबसिडी देगा। गौर रहे कि आतमा प्रोजेक्ट कांगड़ा जिला में 2700 किसानों को जीरो बजट खेती का प्रशिक्षण दे चुका है। वहीं 1500 किसानों ने जिला में शून्य बजट खेती अपना भी ली है। पूरे प्रदेश में यह आंकड़ा काफी ज्यादा है।  आत्मा परियोजना  के निदेशक डा डीके अवस्थी ने कहा कि उन्हीं  किसानों को योजनाओं और देसी गाय खरीद में सबसिडी दी जाएगी, जो पूरी तरह जीरो बजट खेती अपनाएंगे। विभाग के अधिकारियों और  कर्मचारियों से फ ील्ड रिपोर्ट  ली जा रही है।

सोलन मंडी समिति का आनलाइन कारोबार  में नया रिकार्ड, महीने में साढ़े आठ करोड़ का बिजनेस

सोलन मंडी समिति ने आनलाइन बिजनेस में नई क्रांति ला दी है। किसान और बागबान धड़धड़ ई-नाम ऐप से कारोबार कर रहे हैं। आलम यह है कि सितंबर माह में ही किसान-बागबानों ने यहां साढ़े आठ करोड़ रुपए का आनलाइन बिजनेस किया है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह ट्रेंड और बढ़ेगा।  ई-नाम यानी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़कर किसान-बागबान घर बैठे अपने माल को बेच सकते हैं। इससे जहां पेमेंट की टेंशन नहीं रहती, वहीं उनका बेशकीमती समय भी बच जाता है। पिछले साल की बात करें, तो तब मंडी समिति से पूरे साल ई-नाम के तहत 9 करोड़ रुपए का कारोबार किया था, लेकिन इस वर्ष एक ही माह में साढ़े आठ करोड़ रुपए का कारोबार कर किसानों के बढ़ते भरोसे की कहानी बयां कर रहा है।  महज  24 घंटे के भीतर पेमेंट सीधे खाते में आ जाती है। बहरहाल मंडी समिति द्वारा बनाई गई टास्क फोर्स के प्रयास रंग ला रहे हैं।

 रिपोर्ट सुरेंद्र मामटा,सोलन

‘प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान’ की राज्य इकाई ने सराहे ‘अपनी माटी’ के प्रयास

‘प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान’ योजना के कार्यकारी निदेशक डा राजेश्वर सिंह चंदेल ने अपनी माटी मैगजीन में प्रकाशित विभिन्न रिपोर्ट्स को किसानों के लिए लाभदायक बताया है। उन्होंने किसानों के लिए दी जा रही सूचनाओं को बहूपयोगी बताया है। इससे किसानों को सुभाष पालेकर खेती या प्राकृतिक खेती से जुड़ने में लगातार मदद मिल रही है। वहीं उन्हें खेती की अन्य विधियों मसलन जैविक और जीरो बजट खेती को समझने में भी मदद मिल रही है।

केंद्रों में पहुंचा मटर,जौ का बीज, किसान जुटे बिजाई में

उपमंडल चौपाल के किसानों को अब मटर का बीज बाजार से महंगे दामों पर नहीं खरीदना पड़ेगा। कृषि विभाग ने उप मंडल चौपाल के नेरवा, चौपाल व कुपवी स्थित विभाग के तीनों विक्रय केंद्रों पर मटर एवं जई का बीज उपलब्ध करवा दिया है। विभाग ने किसानों को सरकारी रेट पर बीज उपलब्ध करवा कर बड़ी राहत बख्शी है। धान, मक्की व उड़द आदि फसलें निकालने के उपरांत क्षेत्र के किसान इन दिनों मटर की बुआई की तैयारियों में जुटे हुए हैं। बाजार में मटर के बीज की विभिन्न किस्मों के दाम अढ़ाई सौ रुपए प्रति किलो तक हैं वहीं सरकारी विक्रय केंद्रों में उपलब्ध पीबी 89 किस्म के बीज के दाम मात्र 70 रुपए प्रति किलो हैं। इस 70 रुपए प्रति किलो दाम पर भी विभाग किसानों को 20 रुपए प्रति किलो अनुदान प्रदान कर रहा है। कई किसान तो 40-50 किलो तक मटर का बीज लगाते हैं। किसान आम तौर पर नवंबर माह में मटर की बुआई कर देते हैं एवं इसकी फसल मार्च-अप्रैल तक तैयार हो जाती है। कृषि विभाग ने उक्त विक्रय केंद्रों में चारे के लिए प्रयोग की जाने वाली जई का बीज भी उपलब्ध करवाया है जिन लोगों ने घरों में पशु पाले हुए हैं उनमें से अधिकांश लोग इन पशुओं के चारे के लिए जई लगाते हैं। पालतू पशुओं के लिए जई का यह चारा दो अढ़ाई महीने में तैयार हो जाता है। यानी सर्दियों में बर्फबारी के बीच जब पशुओं के लिए कुदरती तौर पर उगने वाला चारा नहीं मिल पाता उस समय जई का यही चारा पशुओं के आहार के काम आता है। मटर और जई का बीज उपलब्ध करवा कर कृषि विभाग ने इन लोगों को दोहरी राहत बक्शी है। कृषि प्रसार अधिकारी चौपाल डीआर लिपटा ने बताया कि उपमंडल के उक्त तीनों विक्रय केंद्रों में 60 क्विंटल मटर व 30 क्विंटल जई का बीज उपलब्ध है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया है कि अपनी जरूरत के अनुसार मटर व जई का बीज विभाग के विक्रय केंद्रों से प्राप्त कर लें।

सिमटते तालाबों का दर्द समझे हिमाचल

जल भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत इसलिए ही सरकारें जल सरंक्षण पर अत्यधिक फोकस बनाए हुए हैं। हैरानी इस बात की तालाबों की जमीनों पर किए जा रहे अतिक्रमण को छुड़ाने के लिए पंचायतें फिलहाल नाकाम चल रही हैं। एक समय ऐसा था कि तालाबो के पानी से लोग अपनी प्यास बुझाया करते थे। तालाबों के पानी की एहमियत हर इनसान के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण थी। तालाबों में तैयार होने बाले पत्तों पर लोग विवाह, भंडारों ओर अन्य समारोहों की धाम खाते रहे हैं। तालाब के भीतर एक पेय नामक जड़ का लोग आचार डालकर भी मजा लेते थे। यही नहीं तालाबों के किनारों पर पीपल का पेड़ भी अवश्य ही हुआ करता था। गांवों के लोग पीपल के पेड़ को कच्चा धागा बांधकर सूर्यदेव को रोजाना नमसकार करना नहीं भूलते थे। ऐतिहासिक तालाबों की हालत आजकल इतनी दयनीय बन चुकी की लोग उन्हें कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करते हुए उन पर अतिक्रमण लगातार किए जा रहे हैं। नतीजन तालाबों का आकार सिकुड़ता ही का रहा और उनका अस्तित्व बरकार बनाए रखना मुश्किल काम बन गया है। जल सरंक्षण पर लाखों रुपयों का बजट बर्बाद करने की बजाए आज जरूरत तालाबों पर किए जा रहे नजायज कब्जों को हटाने की।

 रिपोर्ट सुखदेव सिंह, नूरपुर

सीधे खेत से

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