आस्था की आड़ में तिजारत

Oct 23rd, 2019 12:05 am

डा. वरिंदर भाटिया

पूर्व कालेज प्रिंसीपल 

पाकिस्तान गुरुद्वारा के दर्शनार्थ जाने वाले भारतीय श्रद्धालुओं से सेवा शुल्क के रूप में 20 डालर वसूल करने पर अड़ा है। एक केंद्रीय मंत्री ने भी कहा है कि पड़ोसी देश आस्था के नाम पर कारोबार कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा करतारपुर साहिब के दर्शन के लिए 20 डालर प्रति व्यक्ति शुल्क लगाया जाना घटियापन है। गरीब श्रद्धालु कैसे यह रकम देगा? पाकिस्तान का यह बयान बेहद शर्मनाक है कि यह शुल्क पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा और इससे विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी। इससे पहले, पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी 20 डालर सेवा शुल्क मांगने पर पाकिस्तान की निंदा करते हुए कहा था कि यह ऐतिहासिक गुरुद्वारे के दर्शन के लिए टिकट लगाने के समान है…

गुरु नानक देव के 550वें प्रकाश पर्व के पावन मौके पर 9 नवंबर को दुनिया के सबसे बड़े गुरुद्वारे के दर्शन हेतु भारत-पाक सीमा पर करतारपुर साहिब गलियारा खोल दिया जाएगा और गुरु नानक देव जी के श्रद्धालू पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर सकेंगे। पाक ने वहां जाने के लिए प्रति तीर्थयात्री 20 डालर का सेवा शुल्क लिए जाने का निर्णय किया है। भारत सरकार ने पाकिस्तान से लगातार अनुरोध किया है कि तीर्थयात्रियों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उसे इस तरह का शुल्क नहीं लेना चाहिए। गौरतलब है कि पाकिस्तान गुरुद्वारा के दर्शनार्थ जाने वाले भारतीय श्रद्धालुओं से सेवा शुल्क के रूप में 20 डालर वसूल करने पर अड़ा है। एक केंद्रीय मंत्री ने भी कहा है कि पड़ोसी देश आस्था के नाम पर कारोबार कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा करतारपुर साहिब के दर्शन के लिए 20 डालर प्रति व्यक्ति शुल्क लगाया जाना घटियापन है। गरीब श्रद्धालु कैसे यह रकम देगा? पाकिस्तान का यह बयान बेहद शर्मनाक है कि यह शुल्क पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा और इससे विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी। इससे पहले, पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी 20 डालर सेवा शुल्क मांगने पर पाकिस्तान की निंदा करते हुए कहां था कि यह ऐतिहासिक गुरुद्वारे के दर्शन के लिए टिकट लगाने के समान है। दोनों देशों के बीच पिछले महीने बैठक के तीसरे दौर में भारत ने 20 डालर सेवा शुल्क के मामले पर पाकिस्तान के लगातार अड़े रहने पर निराशा जताई थी और उससे इस पर पुनर्विचार करने का कहा था। करतारपुर गलियारा पाकिस्तान में करतारपुर स्थित दरबार साहिब को पंजाब के गुरदासपुर जिले के डेरा बाबा नानक धर्मस्थल से जोड़ेगा।

पाकिस्तान भारतीय सीमा से करतारपुर स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब तक गलियारे का निर्माण कर रहा है, जबकि पंजाब में गुरदासपुर जिले के डेरा बाबा नानक से सीमा तक गलियारे का दूसरा हिस्सा भारत बना रहा है। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान के हुक्मरान गुरु नानक देव जी के गैर व्यापारिक फलसफे को समझ नहीं सके और इसके ठीक उल्ट चल रहे हैं। उन्होंने विश्व गुरु,  गुरु नानक देव जी के नाम पर तिजारत शुरू की है। आम आदमी के लिए भी उनके दर्शन को एक बार फिर आत्मसात करना जरूरी है। गुरु नानक देव जी सिखों के पहले गुरु थे। अंधविश्वास और आडंबरों के कट्टर विरोधी गुरु नानक का प्रकाश उत्सव ‘जन्मदिन’ कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है, हालांकि उनका जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ था। गुरु नानक जी पंजाब के तलवंडी नामक स्थान पर एक किसान के घर जन्मे थे। उनके मस्तक पर शुरू से ही तेज आभा थी। वह बचपन से ही गंभीर प्रवृत्ति के थे। बाल्यकाल में जब उनके अन्य साथी खेल कूद में व्यस्त होते थे तो वह अपने नेत्र बंद कर चिंतन मनन में खो जाते थे। यह देख उनके पिता कालू एवं माता तृप्ता चिंतित रहते थे। उनके पिता ने पंडित हरदयाल के पास उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा, लेकिन पंडित जी बालक नानक के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाते थे और उनके ज्ञान को देखकर समझ गए कि नानक को स्वयं ईश्वर ने पढ़ाकर संसार में भेजा है। गुरु नानक जी का विवाह सन् 1485 में बटाला निवासी कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके दो पुत्र श्रीचंद और लक्ष्मीचंद थे। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किंतु यह सारे प्रयास नाकाम साबित हुए। उनके पिता ने उन्हें घोड़ों का व्यापार करने के लिए जो राशि दी, नानक जी ने उसे साधु सेवा में लगा दिया। कुछ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गुरु नानक देव जी नित्य बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। एक दिन वह स्नान करने के पश्चात वन में अंतर्ध्यान हो गए। उस समय उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा- मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं, जो तुम्हारे संपर्क में आएंगे वे भी आनंदित होंगे। जाओ दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओ। इस घटना के पश्चात वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ही विदेशों की भी यात्राएं कीं और जन सेवा का उपदेश दिया। बाद में वह करतारपुर में बस गए और 1521 ई. से 1539 ई. तक वहीं रहे। गुरु नानक देवजी ने जात-पांत को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने की दिशा में कदम उठाते हुए ‘लंगर’ की प्रथा शुरू की थी। लंगर में सब छोटे-बड़े, अमीर-गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। गुरु नानक जी ने अपने अनुयायियों को जो उपदेश दिए जो कि सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। गुरु नानक जी की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनंत सर्वशक्तिमान और सत्य है। वह सर्वत्र व्याप्त है। नाम-स्मरण सर्वोपरि तत्त्व है और नाम गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत-प्रोत है। गुरु जी की शिक्षाओं में कहीं भी धन का लालच नहीं है। पाक का गुरु नानक देव जी के प्रति पवित्र आस्था के नाम पर तिजारत करना प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता और उसे इस फैसले पर पुनर तार्किक विचार करना चाहिए। 

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