इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में कुल्लू की देवधुनें

अंतरराष्ट्रीय दशहरा महोत्सव के छठे दिन 2200 से ज्यादा बजंतरियों की एक साथ मिलाई ताल ने रचा गौरवमयी इतिहास

कुल्लू – अनूठी परंपरा से देश-दुनिया में विख्यात अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के गौरवपूर्ण इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। उत्सव के छठे दिन रविवार को यहां देवधुन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के साक्षी जहां यहां पहुंचे देश-दुनिया के लोग बने, वहीं सोशल मीडिया के माध्यम से भी ये देवधुनें विश्व के कोने में पहुंचीं। विश्व शांति के लिए ढोल, नगाड़े, करनाल, नरसिंगे, शंख और शहनाइयों से बजंतरियों ने कुछ ऐसा समां बांधा कि लोग तो मंत्रमुग्ध हुए ही, इस देवधुन कार्यक्रम को इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी स्थान मिल गया है। बता दें कि कुल्लू घाटी में पूरे माहौल को धार्मिक उत्साह और दिव्यता से भर दिया गया था, जब 2200 से अधिक बजंतरी अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के अवसर पर देवधुनें बजाने के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की उपस्थिति में अटल सदन स्थित रथ मैदान में एकत्रित हुए। मुख्यमंत्री ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का आागज किया। देवधुन वह ध्वनि है, जो विभिन्न पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने के बाद गूंजती है, जब देवता अपने मंदिरों से निकलकर स्थानीय उत्सवों में शामिल होते हैं। इन देवधुनों को इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में स्थान मिला है। मुख्यमंत्री को इंडिया बुक ऑफ  रिकार्ड्स के प्रतिनिधियों द्वारा एक पदक और प्रमाण पत्र मौके पर ही प्रदान किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर  ने कहा कि यह सामान्य रूप से राज्य के लोगों और विशेष रूप से कुल्लू जिला के लोगों के लिए एक बड़ा सम्मान है कि देवधुन के एक आयोजन को इंडिया बुक ऑफ  रिकार्ड्स में प्रवेश किया। इसमें 2200 से अधिक बजंतरियों ने पूरे वातावरण को देवत्व और पारंपरिक उत्साह के साथ भरने के लिए एक स्थान पर पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाया। उन्होंने कहा कि संगीतकारों के प्रयास वास्तव में प्रशंसनीय थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि यह आयोजन न केवल एक नियमित कार्यक्रम बन जाए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय  कुल्लू दशहरा का एक अतिरिक्त आकर्षण भी बने। उन्होंने कहा कि गला काट प्रतियोगिता के वर्तमान युग में हमारी सदियों पुरानी संस्कृति और परंपराएं धीर-धीरे लुप्त हो रही हैं और सभी को इनके संरक्षण के लिए आगे आना चाहिए। मुख्यमंत्री ने आयोजन के दौरान बेहतरीन प्रदर्शन करने  के लिए बजंतरियों को अपनी ऐच्छिक निधि से पांच लाख रुपए देने की घोषणा की। बता दें कि कुल्लू को परंपरा कायम रखने के लिए यह तीसरा तमगा मिला है। पहले कुल्लवी नाटी    लिम्का बुक में शामिल हुई। इसके बाद कुल्लवी नाटी को गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में स्थान मिला है। अब वर्ष 2019 के अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में पहली बार आयोजित देवधुन कार्यक्रम इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में शामिल हुआ है। लिहाजा, यह देवभूमि कुल्लू ही नहीं पूरे हिमाचल के लिए गौरव की बात है।

क्या है देवधुन

जब देवता अपने मंदिरों से निकल कर स्थानीय उत्सवों में शामिल होते हैं, तो इस दौरान बजाए जाने वाले पारंपरिक वाद्ययंत्रों से जो ध्वनि गूंजती है, उसे ही देवधुन कहा जाता है।

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