कलह से मजबूर उपचुनाव

हिमाचल के उपचुनावों के परिणाम जो भी हो, इनके सबक गहरे तथा स्पष्ट होंगे। यह राजनीतिक शक्ल का बदलता परिदृश्य और हिमाचली संदर्भों की ऐसी पैरवी है, जिनका ताल्लुक जमीन के सच को करीब से देखना भी रहा। यह उन पुतलों को जलते देखते रहे, जो कसौली लिटफेस्ट के बारूद से बने या पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार की साफगोई से पैदा हुए। जाहिर है अब हिमाचल में बड़े नेताओं के न कद और न ही काठी का कोई हिसाब हो रहा है। पार्टियों के भीतर अनुशासन की कमी तथा आतंरिक लोकतंत्र की कमी का मूल्यांकन इस तरह देखना होगा कि निर्दलीय उम्मीदवार बहुत कुछ छीन रहे हैं। सामाजिक मूल्यों की सेंधमारी में बिखरते समाज का विध्वंस करती राजनीति को गौर से देखेंगे, तो चुनाव परिणाम एक तरह की सीनाजोरी रहे। छावनी में सरकार, बचाव में कांग्रेस और दो राहे पर निर्दलीयों ने पच्छाद से धर्मशाला तक नींद हराम की तो इसलिए कि पार्टियों के भीतर नारदमुनि बढ़ गए। चुनाव परिणाम कौन सा विकल्प परोसेंगे, इससे न अभिमान की नुमाइश पूरी होगी और न ही प्रतिभा कौशल में कोई चेहरा सभी को मात देगा। यानी चुनाव अपने भीतर जख्म छुपाकर अब बताएगा कि परिणाम क्यों लहूलुहान हुए। उपचुनावों के संबोधन कतई हिमाचली समाज की अभिव्यक्ति रहे या किसी भी पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो राजनीतिक वचनबद्धता की पूर्णता में दर्ज हो। अंततः दो पूर्व मुख्यमंत्रियों शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के प्रचार से निकली सुर्खियों ने कम से बहस तो चुनी। बहस यह कि कांगड़ा किसी की बपौती बना रहेगा या अब तक हुए प्रयोग फिर झगड़ पड़े। पच्छाद की शिमला से नजदीकी और धर्मशाला की सत्ता की नजदीकी का जिक्र न केवल धूमल-शांता के बयानों के आलोक में पढ़े गए विषय बने, बल्कि जिक्र वाईएस परमार के गृहजिला सिरमौर के बदलते रंग और नूर का भी रहा। प्रदेश के हित में शांता कुमार ने दूसरी राजधानी के औचित्य को सूली पर टांग कर चुनावी माहौल को बेपर्दा जरूर किया, तो धूमल ने अपने कार्यकाल के लांछित अध्यायों में कांगड़ा के प्रति ईमानदारी का जिक्र किया। धर्मशाला उपचुनाव ने यह बता दिया कि यहां प्रश्न एक विधानसभा से कही अधिक और क्षेत्र से ऊपर हैं, तो जाहिर तौर पर चित्र में एक और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी आते हैं। वीरभद्र सिंह द्वारा खड़ी की गई परंपराएं उपचुनाव की हाजिरी में राजनीति को स्पष्टीकरण देने पर विवश करती रहीं। आज अगर दूसरी राजधानी पर राजनीतिक मुगालते हैं, तो वीरभद्र सिंह की कार्यशैली की भरपाई भाजपा नेताओं को करनी पड़ रही है। कांग्रेस अपनी परंपराओं के भीतर चुनावी मुद्दा ढूंढ पाई, तो शांता-धूमल के बयानों का वजन देखा जाएगा। शांता जो सीधे कह गए, धूमल ने अपने खातों की ईमानदारी से जोड़ लिया, लेकिन वर्तमान सत्ता को भी अपनी स्वतंत्र राय से इस उपचुनाव की सहमति चाहिए। ऐसे में प्रदेश के दो उपचुनाव पिछले यानी लोकसभा के चुनावों पर भारी पड़ेंगे या जनता आज भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अक्स में भाजपा के लिए बटन दवाएगी, कहा नहीं जा सकता कि सत्ता के बाकी तीन सालों पर भरोसा करते हुए जनता अपना मत देगी या क्षेत्रीय मुद्दों की रगड़ में, तिकोने मुकाबलों की मिट्टी फिसल जाएगी। जो भी हो उपचुनाव इतने आसान साबित नहीं होंगे और न ही जीत के पराक्रम में कोई एक पक्ष अव्वल साबित होगा। कम से कम उपचुनावों ने राजनीति के वर्तमान दौर को अपनी आशंकाएं तो पहले से ही बता दी हैं।

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