कालिख की चेतावनी

पाकिस्तान का चेहरा अभी ग्रे है, जिसका काला होना शेष है। ग्रे और काले रंग में बुनियादी फर्क हल्की और गहरी छाया का है। पाकिस्तान ने राहत की सांस ली होगी कि वह फाट्फ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की काली सूची में जाने से बाल-बाल बच गया। उसे फरवरी, 2020 तक की मोहलत मिल गई कि फाट्फ  ने आतंकी वित्त-पोषण और धनशोधन के जो 27 बिंदु तय किए थे, पाकिस्तान एक बार उन पर खरा उतरने की कार्य-योजना पर अमल करे। पाकिस्तान उन में से 22 बिंदुओं पर खरा नहीं उतर पाया है। मोहलत के साथ-साथ फटकार भी सहनी पड़ी, लेकिन ये चार महीने, दरअसल पाकिस्तान के चेहरे पर पुतने वाली कालिख की चेतावनी है। इमरान खान के पाकिस्तान का भ्रम भी अब टूटना चाहिए कि चीन उसकी पैरोकारी करता रहेगा और वह कालिख से बचता रहेगा। फाट्फ  की अध्यक्षता फिलहाल चीन के हाथ में है, लेकिन संगठन की पेरिस में हुई बैठक का जो यथार्थ सामने आया है, उससे स्पष्ट है कि चीन फाट्फ  में पाकिस्तान को हमेशा की तरह बचा नहीं सका है या उसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन में ऐसा करना संभव नहीं था। हालांकि वजीर-ए-आजम इमरान खान ने चीन के राष्ट्रपति के अलावा, अमरीका के राष्ट्रपति, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, तुर्की के राष्ट्रपति, मलेशिया के प्रधानमंत्री, सऊदी अरब के ‘युवराज’ और बहरीन के शाह आदि से गुहार लगाई थी कि पाकिस्तान को काली सूची में जाने से बचाया जाए, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर किसी ने भी साथ नहीं दिया। फाट्फ  आतंकवाद, आतंकियों की फंडिंग, मनी लांडिं्रग आदि से जुड़े मुद्दों की निगरानी करती है। उसी ने पाकिस्तान को जून, 2018 से ग्रे सूची में डाल रखा है। यह काली सूची में जाने से पहले की स्थिति है और संबद्ध देश को सुधरने की चेतावनी भी देती है, लेकिन पाकिस्तान है कि आतंकवाद से मानने को तैयार नहीं। इन्हीं दिनों कई वीडियो सार्वजनिक हुए हैं कि किस तरह बालाकोट में आतंकियों की ट्रेनिंग जारी है, किस तरह लांच पैड बनाए जा रहे हैं, किस तरह भारत के कश्मीर में आतंकी हमलों की रणनीति तय की जा रही है? कुछ साक्ष्य तो भारत ने फाट्फ  को मुहैया कराए हैं। यदि पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया जाता है, तो आईएमएफ, विश्व बैंक, आसियान विकास बैंक, यूरोपीय संघ के देशों से उसे कर्ज मिलना बंद हो सकता है। दुनिया की आर्थिक एजेंसियां भी पाकिस्तान को कर्ज देने में संकोच करेंगी और बड़ी कंपनियां निवेश करने से कतराएंगी। उन हालात में पाकिस्तान का बिल्कुल ही दिवालिया पिट सकता है। उसकी अर्थव्यवस्था फिलहाल ही छिन्न-भिन्न है। पाकिस्तान पर 4.7 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इन चार महीनों में 50,815 करोड़ रुपए के नुकसान की संभावना है। चीन पाकिस्तान को कभी भी पूरी तरह बिखरने नहीं देगा, क्योंकि उसका वहां 434 अरब डालर का निवेश है। उन हालात में चीन-पाकिस्तान आर्थिक कारिडोर और वन बेल्ट, वन रोड सरीखी परियोजनाओं का क्या होगा? पाकिस्तान में अभी से हालात और अवाम प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ  हैं। जमीयत उलेमा-ए इस्लाम के मजहबी नेता और सांसद फजलुर्रहमान ने तो इमरान के खिलाफ  इंकलाब छेड़ने का एलान कर दिया। विपक्ष की दोनों प्रमुख पार्टियां-पीपीपी और पीएमएल-नवाज इमरान के खिलाफ इंकलाब से जुड़ गई हैं। पाकिस्तान की सियासी नियति क्या होगी, बड़ी स्पष्ट लग रही है। अवाम का इमरान की 13 माह पुरानी हुकूमत से मोह भंग हो गया है। एक तरफ  कुआं तो दूसरी तरफ  खाई है। चीन द्वारा पाकिस्तान की कुछ हद तक मदद करने के अलावा कोई और देश ऐसा नहीं है, जो हर सूरत में पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा हो। यहां तक कि मुस्लिम देश भी छिटके हुए लग रहे हैं। सवाल यह है कि पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था कैसे दुरुस्त करेगा और घोषित आतंकियों के खिलाफ  कार्रवाई भी कैसे कर पाएगा? कमोबेश हाफिज सईद और मसूद अजहर सरीखे आतंकी तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित और ऐलानिया ‘वैश्विक आतंकी’ हैं। भारत ने फाट्फ में ऐसे आतंकियों को पाकिस्तान सरकार द्वारा पेंशन दिए जाने का मुद्दा भी उठाया था। पाकिस्तान ऐसे मामलों पर ढक्कन कैसे लगा सकता है? लिहाजा फरवरी, 2020 तक ‘करो या मरो’ की स्थिति है। संभव है कि पाकिस्तान में हुकूमत ही बदल जाए! यही उसकी नियति रही है।

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