कुल्लू दशहरा…मुंह मोड़ने लगे कारोबारी

अंतरराष्ट्रीयय उत्सव में उम्मीद के मुताबिक कारोबार न होने से मायूसी संग लौटने को मजबूर

पतलीकूहल –कुल्लू का दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक, व्यापारिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के कारण सर्वप्रतिष्ठित है, इसमें कोई संशय नहीं है। इस उत्सव के इंद्रधनुषी रंगीनियों में मंनोरंजन के सभी खेल तमाशे सुलभ होते हैं, जिनका प्रचलन प्रायः सभी बड़े मेलों में पाया जाता है। यदि व्यापारिक दृष्टि से देखें तो सभी मेलों में छोटा बड़ा कारोबार भी चलता ही है, परंतु कुल्लू दशहरे के  तीनों पक्ष व्यापारिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हंै। इसके व्यापारिक पक्ष की धमाल अब धीरे-धीरे धीमी होने लगी है। दशहरा मेला कमेटी द्वारा ऐतिहासिक मैदान में लगने वाली अस्थायी दुकानों के लिए प्लाटों की आंबटन की प्रक्रिया में महंगे प्लाटों की वजह से जहां व्यापारी आने से कतराने लगे हैं। यही कारण है कि हर वर्ष व्यापारियों को मंहगें प्लॉट मिल रहे हैं,  जिससे वस्तुओं के दाम भी मेले में उसी के सदृश कहीं अधिक हो गए हैं। इसलिए लोग कबाड़ी मार्केट से ही वस्त्रों की खरीद कर रहें हैं, जो उन्हें भा रही हैं।  आज अंतरराष्ट्रीय दशहरे की गरिमा मात्र धार्मिक पक्ष की परिपाटी तक ही सीमित रह गई है, क्योंकि दशहरे के आगाज व समापन्न पर देवी-देवीताओं की रघुनाथ रथ यात्रा में शिरकत होने का नजारा ही यहां आने वालों के लिए ऐतिहासिक व पारंपारिक रीत से बंधा हुआ दिखता है, जिसका वह आंनद उठाते हैं।  जबकि दशहरे के दूसरे  पक्ष व्यापार की धार खोने लगी है। क्योंकि दशहरे में प्लॉटो की निलामी इतनी मंहगी हो गई है कि कई ब्यापारी प्लॉट का भाड़ा भी नहीं निकाल पाते हैं। ब्यापारियों का कहना है कि यदि दशहरे में व्यापार को बढ़ाना है तो यहां लगने वाले स्टालों का किराया कम होना चाहिए ताकि यहां आने वाले व्यापारियों को उचित दामों पर स्टाल उपलब्ध हों जिससे व्यापार को गति मिलें। वहीं पर दशहरे के तीसरे पक्ष सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का दर्जा पाए दशहरे की सांस्कृतिक संध्या में स्थानीय लोक कलाकारों को उनकी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिलता हैं। वहीं पर बाहर से आने वाले कलाकारों पर लाखों खर्च कर लेते हैं, लेकिन स्थानीय कलाकार नदारद रहते हैं। देश के कई प्रांतों से आने वाले लोक नर्तक अपने आकर्षक व पारंपारिक लिबास में थिरकती धुनों से लोगों मोह लेते हैं। दशहरा मेले केा लेकर जहां पूर्व में राजाओं के कार्यकाल में व्यापार को बढ़ाने के लिए चीन व तिब्बत से व्यापारियों को बुलाया जाता था, अब वह बात बिलकुल विपरीत दिशा में जा रही है।। मसलन ब्यापारी स्वयं ही मंहगे प्लाटों के  आंबटन से दशहरे में शिरकत करने से हिचक रहा है। हांलाकि इस बार पूरे प्रदेश में जहां सेब का उत्पादन बढि़या रहा है और अब दशहरा के समाप्ति के बाद कबाड़ी मार्किट में लोगों की चहल पहल अधिक हो गई है।  वैसे भी कुल्लू दशहरे में घाटी का हर वह व्यक्ति चाहे व गरीब हो या अमीर मेले से अपने साल भर के लिए छोटी से बड़ी वस्तु की खरीद कर साल भर के लिए चिंता से मुक्त हो जाता है यानी के वह फिर अगले दशहरे तक किसी प्रकार की खरीद फरोख्त नहीं करता और एक साल का इंतजार करता है। जहां तक मेले का संबध है, तो दशहरे में अस्थाई दुकानों के भाव अधिक होने से व्यापारी वर्ग भी उसी के सदृश वस्तुओं के दामों में बढ़ोतरी करने लगा है जिससे इसका असर गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों पर पड़ने लगा हैं। कुल्लू के दशहरे का सेब उत्पादन के साथ गहरा संबंध हैं, यदि घाटी में सेब की फसल अधिक होती है तो लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, जिससे लोग हर प्रकार की खरीददारी को तरजीह देते हैं। इस बार प्रदेश में सेब का उत्पादन गत वर्ष से कही ंअधिक रहा है जिससे लोगांे की आर्थिकी सुदृढ़ हुई है।

 

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