गरीबी की कब्र पर अमीरी

नवेंदु उन्मेष

स्वतंत्र लेखक

गरीबी की कब्र पर ही अमीरी की मीनार खड़ी होती है। अगर दुनिया से गरीबी खत्म हो जाए तो अमीरी की मीनार भी ढह जाएगी। फिर न गरीबों के लिए कोई सरकारी योजना होगी और न अमीरी की मीनार खड़ी होगी। न तो किसी को गरीबों के नाम पर नोबेल पुरस्कार मिलेगा और न कोई धरना होगा और न कोई प्रदर्शन होगा। यहां तक कि मुआवजा के लिए सड़क जाम करने वालों से भी लोगों को निजात मिल जाएगी। मेरी पत्नी कल मुझसे कह रहीं थी कि तुम बिना वजह लोगों के मनोरंजन के लिए व्यंग्य लिखते हो। अगर लिखना है तो गरीबों पर व्यंग्य लिखो, क्योंकि गरीबों पर लिखने का रास्ता नोबेल पुरस्कार की ओर ले जाता है। इस पथ पर चलते हुए तुम नोबेल पुरस्कार के हकदार हो जाओगे। मैंने कहा मुझे गरीबों की कब्र पर नोबेल पुरस्कार नहीं चाहिए। मैं तो चाहता हूं कि सिर्फ  गरीबों का कल्याण हो और उन्हें इससे मुक्ति मिले। वह बोली कि गरीबी भी अच्छी चीज है। देश गरीबों का होता है। देश में बाढ़ आए, सूखा आए या भूकंप आए इस सबका पहले और सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है। इसके बाद सरकारी योजनाएं आती हैं। इन योजनाओं को चलाने वाले लोग तत्काल अमीरी की मीनार खड़ी कर लेते हैं। इस मीनार का दूसरा नाम भ्रष्टाचार है। बहस चल ही रही थी कि मैंने कहा गरीब अगर नहीं हों तो नेताओं के वोट बैंक की दुकान भी नहीं सज सकती है। आश्वासन का झुनझुना भी नहीं बज सकता है। गरीबी है तो नेताओं की सफेद पोशाक है। अफसरों के पास एयरकंडीशन कार है। आलीशान बंगला है। अकूत बैंक बैलेंस है। यहां तक कि अफसरों की बीवियों के चेहरे पर जो चमक नजर आती है उसकी वजह भी गरीबों के चेहरे की मलिन झुर्रियां हैं। अगर दुनिया में गरीबी नहीं होती तो नार्वे की नोबेल कमेटी किसे यह पुरस्कार देती। मेरा मानना है कि कोई भी देश गरीबों का होता है। अमीरों का कोई देश नहीं होता है। अगर किसी देश पर दुश्मन देश का आक्रमण होता है तो सबसे ज्यादा गरीब मरते हैं। अमीर तो अपना बोरिया बिस्तर समेट कर सुरक्षित देश का रुख कर लेते हैं। यहां तक कि बैंकों में जमा गरीबों का पैसा लेकर अमीर भाग जाते हैं। देश की सीमा पर भी गरीब ही लड़ते और मरते हैं। किसी अमीर को सीमा पर लड़ते और मरते हुए किसी ने नहीं देखा। नेता देश के अंदर सिर्फ  एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हैं, अगर उन्हें सीमा पर भेज दिया जाए तो उनकी हेकड़ी क्षण भर में निकल जाएगी। उनकी सफेद पोशाक का दिवाला निकल जाएगा। कई राज्यों में खाद्य सुरक्षा के नाम पर राशन डीलर गरीबों को कम अनाज दे रहे हैं। अपना हक मांगने के लिए गरीब सड़कों पर उतर रहे हैं। सड़क जाम कर रहे हैं तो अधिकारियों का घेराव कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला अधिकारी कान बंद कर मौन बैठा है। राशन डीलर मालामाल हो रहा है। उसका कहना है कि गोदाम से प्रति बोरे में माल कम आता है। जाहिर है गोदाम में भी गरीबों के नाम पर घपले-घोटाले हो रहे हैं। इसी तरह गरीबी की कब्र पर अमीरी की मीनार खड़ी करने की परंपरा देश में कायम है।

 

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