घुमारवीं के खेतों में ‘ उगे’ भवन… खेती को जमीन नहीं

15 साल में आधी रह गई कृषि योग्य उपजाऊ भूमि, खेतों में जहां लहलहाती थीं फसलें वहां जगह-जगह बन गईं बिल्डिंग

घुमारवीं -व्यापारिक दृष्टि से तेजी से उभरे हिमाचल प्रदेश का केंद्र बिंदु घुमारवीं कस्बा तेजी से शहरीकरण में तबदील हो गया है। लगातार बढ़ रहे शहरीकरण के कारण किसानों की कृषि योग्य भूमि घट रही है। बुद्धिजीवी वर्ग की मानें तो पिछले 15 सालों से शहर का दायरा तेजी से बढ़ा है। जिससे घुमारवीं शहर में कृषि योग्य उपजाऊ भूमि घटकर 50 फीसदी से अधिक कम हो गई है। उपजाऊ भूमि के लगातार कम होने से शहर के मूल निवासी एवं वरिष्ठ नागरिक भी चिंतित हंै। वरिष्ठ नागरिकों का मानना है कि शहरीकरण के कारण कृषक, खेतीहीन, बागबान, गैर बागबान व भूमि मालिक भूमिहीन होते जा रहे हैं। खेतों में अब फसलें नहीं लहलहाती, बल्कि वहां पर बड़ी-बड़ी बिल्डिंगे बन गई हैं। शहर का दायरा बढ़ने व बड़े-बड़े भवनों के निर्माण होने से खेती योग्य उपजाऊ भूमि बिलकुल कम हो गई है। वरिष्ठ नागरिकों की माने तो घुमारवीं कस्बे में पिछले 10 से 15 सालों के बीच शहरीकरण का दायरा बढ़ा है। शहर का दायरा बढ़ने से यहां पर कृषि योग्य भूमि बहुत कम रह गई है। नई कालोनियों के बसने से कृषि योग्य उपजाऊ भूमि आधी रह गई। लगातार बढ़ रहे शहर के कारण मूल निवासियों को दिक्कतें भी झेलनी पड़ रही हंै। बढ़ते शहर में बनी नई बस्तियों के लिए सड़क, पैदल रास्ते, सीवरेज, पानी, बिजली, केबल, टेलिफोन की तारों के लिए खंभे भी मूल निवासियों की जमीन में ही खड़े हो रहे हैं। इससे कुछ कृषकों की भूमि बीघों में घिर गई है। जिससे उनकी खेती करने के स्रोत कम हुए तथा उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। वरिष्ठ नागरिकों का मानना है कि आवारा पशुओं की समस्या भी शहरीकरण के कारण ही हुई है। ये लावारिस पशु फसलों को उजाड़ रहे हैं। आवारा पशुओं  से परेशान शहर के मूल निवासियों ने कृषि योग्य उपजाऊ भूमि को बेच दिया है। जिससे वहां पर अब बड़े-बड़े मकान बन गए हैं। वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि शहरीकरण के कारण कृषक, खेतीहीन, बागबान, गैर बागबान, भूमि मालिक भूमिहीन होते जा रहे हैं। उन्हें चिंता सता रही है कि यदि सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो सभी कृषक भूमिहीन हो जाएंगे।

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