नई औद्योगिक नीति की जरूरत

Oct 14th, 2019 12:05 am

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

इस समय दुनिया के साथ-साथ देश का भी औद्योगिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। ऐसे बदलते परिदृश्य में औद्योगिक विकास की जरूरतें भी बदल रही हैं। इस समय उद्योग-कारोबार में रोबोट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता और 3डी प्रिंटिंग सहित नई-नई तकनीकों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। ऐसे में देश में तैयार होने वाली तीसरी औद्योगिक नीति का मकसद उभरते क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना, नियामकीय अड़चनों को कम करना और देश को विनिर्माण हब के रूप में विकसित करना होना चाहिए…

इन दिनों सरकार नई औद्योगिक नीति तैयार करने की डगर पर आगे बढ़ रही है। सरकार के निर्देशानुसार उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग ‘डीपीआईआईटी’ ने नई औद्योगिक नीति का खाका तैयार कर केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास मंजूरी के लिए भेजा है। अब इस नीति को अंतिम रूप देने का कार्य एक कार्य समूह करेगा। इस समूह में केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के अलावा भारतीय उद्योग परिसंघ ‘सीआईआई’ तथा अन्य उद्योग मंडलों के प्रतिनिधि शामिल रहेंगे। यह नई औद्योगिक नीति देश की तीसरी औद्योगिक नीति होगी। पहली औद्योगिक नीति 1956 में तथा दूसरी औद्योगिक नीति 1991 में लागू हुई थी। यकीनन इस समय दुनिया के साथ-साथ देश का भी औद्योगिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। ऐसे बदलते परिदृश्य में औद्योगिक विकास की जरूरतें भी बदल रही हैं। इस समय उद्योग-कारोबार में रोबोट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता और 3डी प्रिंटिंग सहित नई-नई तकनीकों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। ऐसे में देश में तैयार होने वाली तीसरी औद्योगिक नीति का मकसद उभरते क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना, नियामकीय अड़चनों को कम करना और देश को विनिर्माण हब के रूप में विकसित करना होना चाहिए। निःसंदेह इस समय यदि नई औद्योगिक नीति नई वैश्विक विनिर्माण आवश्यकताओं के मद्देनजर तैयार होती है तो इससे भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की संभावना बढ़ेगी। ज्ञातव्य है कि चीन में घटती विकास दर, मंदी का परिदृश्य, बढ़ती श्रम लागत और उद्योगों में प्रदूषण घटाने की नीति से बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां बंद हो रही हैं। विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की करीब 23 फीसदी मैन्युफेक्चरिंग कंपनियों ने चीन को अपना उत्पादन केंद्र बना रखा है, लेकिन  चीन में पिछले  5 वर्षों में श्रम लागत में करीब 187 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत चीन और पश्चिमी देशों को पछाड़कर दुनिया का नया कारखाना बन सकता है। चीन में आई आर्थिक सस्ती एवं युवा कार्यशील आबादी की कमी के कारण बढ़ती श्रम लागत के कारण चीन में निवेश घट रहे हैं और औद्योगिक उत्पादन में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

हाल ही में चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ‘एनबीएस’ ने कहा है कि चीन में सकल घरेलू उत्पाद ‘जीडीपी’ की वृद्धि दर वर्ष 2018 में घटकर 6.6 फीसदी पर आ गई है। यह दर सन 1990 से यानी पिछले 28 वर्षों में अब तक की सबसे धीमी जीडीपी वृद्घि दर है। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन की अर्थव्यवस्था में धीमापन आ रहा है। यकीनन एक ओर अमरीका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के तेजी से बढ़ने के कारण तथा दूसरी ओर चीन में तेजी से बढ़ती मंदी के कारण भारत विनिर्माण का नया केंद्र बन सकता है। विगत 23 अगस्त को चीन के द्वारा अमरीका के 75 बिलियन डालर (5.4 लाख करोड़ रुपए) के उत्पाद पर आयात शुल्क लगाने की घोषणा के बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फौरन पलटवार करते हुए अमरीकी कंपनियों को चीन से अपना कारोबार समेटने का आदेश दे दिया।  ट्रंप ने कहा कि मैं महान अमरीकी कंपनियों को आदेश देता हूं कि वे तत्काल प्रभाव से दूसरे देशों में जाकर चीन का विकल्प ढूंढे। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा 24 सितंबर को दिए गए भाषण में कहा गया कि 2001 में चीन के विश्व व्यापार संगठन में दाखिल होने के बाद अमरीका के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भारी हानि उठानी पड़ी है और चीन ने अमरीका की 60 हजार फैक्टरियों को नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में अब अमरीका वैश्वीकरण के बजाय अमरीका के घरेलू उद्योगों को ही संरक्षण देगा तथा चीन से कारोबार में कमी लाएगा। ऐसे में यदि ट्रंप के कहने पर अमरीकी कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेटेंगी तो निःसंदेह भारत को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। स्थिति यह है कि भारत में कारपोरेट टैक्स में भारी कमी के बाद  बड़ी संख्या में दुनिया के उद्यमी व कारोबारी अपने उद्योग-कारोबार के मद्देनजर चीनी बाजारों के बजाय नकदी का प्रवाह भारत की ओर प्रवाहित करने की रणनीति बनाते हुए दिखाई दे सकेंगे। एक बात जो इस दौर में भारत को आकर्षक बनाए हुए है वह है उभरते बाजारों में बड़े  निवेश योग्य विकल्पों की कमी के बीच भारत की अधिक आर्थिक व औद्योगिक अनुकूलता। चूंकि कई अमरीकी कंपनियां लगातार चीन में उद्योग कारोबार करने में बढ़ती दिक्कतों की शिकायत कर रही हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन में चीन से अच्छी स्थिति रखने वाला भारत अमरीकी अर्थव्यवस्था में चीन की जगह ले सकता है। वैश्विक शोध संगठन स्टैटिस्टा और डालिया रिसर्च के द्वारा मेड इन कंट्री इंडेक्स 2018 में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा गया है कि गुणवत्ता के मामले में मेड इन इंडिया मेड इन चायना से आगे है। यदि हम चाहते हैं कि भारत दुनिया का नया कारखाना बनने की संभावनाओं को अपनी मुट्ठियों में ले तो हमें नई औद्योगिक नीति के तहत कई बातों पर ध्यान देना होगा। हमें औद्योगिक और श्रम सुधारों के कार्यान्वयन को गतिशील करना होगा। देश में जीएसटी एवं प्रत्यक्ष कर सरलीकरण के प्रयासों को गति देनी होगी। अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की रफ्तार तेज करनी होगी। हम आशा करें कि नई तीसरी औद्योगिक नीति के आधार पर भारत वैश्विक विनिर्माण का नया केंद्र और दुनिया का नया कारखाना बनने के उभरे हुए चमकीले मौके को अपनी मुट्ठियों में करते हुए दिखाई दे सकेगा। हम आशा करें कि नई औद्योगिक संभावनाओं को कारगर बनाने वाली नई औद्योगिक नीति, भारत सरकार के द्वारा वर्ष 2024-25 तक 350 लाख करोड़ रुपए की अर्थव्यवस्था बनाने का जो लक्ष्य रखा गया है उसे साकार करने में अहम भूमिका निभाएगी।

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