निवेश में भारत के मौके

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

पिछले दिनों 12 अक्तूबर को चीन के प्रमुख अखबार ग्लोबल टाइम्स ने विशेष आलेख में कहा है कि इस समय जब चीन से कंपनियों के पलायन करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, तब भारत मेक इन इंडिया को हकीकत बना सकता है। साथ ही भारत दुनिया में मैन्युफेक्चरिंग हब बन सकता है। इस आलेख में यह भी कहा गया है कि मामल्लपुरम में 12 अक्तूबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच आयोजित दूसरी अनौपचारिक शिखर वार्ता के बाद भारत के लिए मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र में नई कामयाबी हासिल करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है…

इन दिनों पूरी दुनिया के अर्थविशेषज्ञ यह टिप्पणी करते हुए दिखाई दे रहे हैं कि चीन से बड़े पैमाने पर जो कारोबार दूसरे देशों में स्थानांतरित हो रहा है, उसका बड़ा हिस्सा भारत अपनी मुट्ठियों में ले सकता है। ऐसी कामयाबी के लिए जरूरी होगा कि भारत लाजिस्टिक्स की सुविधाएं मानवीय कौशल शक्ति और अन्य पूरक बुनियादी ढांचे की क्षमता अपेक्षा के अनुरूप बढ़ाए। पिछले दिनों 12 अक्तूबर को चीन के प्रमुख अखबार ग्लोबल टाइम्स ने विशेष आलेख में कहा है कि इस समय जब चीन से कंपनियों के पलायन करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, तब भारत मेक इन इंडिया को हकीकत बना सकता है। साथ ही भारत दुनिया में मैन्युफेक्चरिंग हब बन सकता है।

इस आलेख में यह भी कहा गया है कि मामल्लपुरम में 12 अक्तूबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच आयोजित दूसरी अनौपचारिक शिखर वार्ता के बाद भारत के लिए मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र में नई कामयाबी हासिल करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यकीनन इस समय भारत में कारोबार, उत्पादन और निवेश बढ़ने की नई वैश्विक संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं। इन संभावनाओं को मुट्ठियों में लेने की नई रणनीति जरूरी है। पिछले दिनों 3 अक्तूबर को नई दिल्ली में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ‘डब्ल्यूईएफ’ और भारतीय उद्योग परिसंघ सीआईआई’ द्वारा आयोजित इंडिया इकोनॉमिक समिट में अमरीका के वाणिज्य मंत्री विल्वर रॉस ने कहा कि अमरीका और चीन के बीच बढ़ते ट्रेडवॉर का भारत भरपूर फायदा ले सकता है।

उन्होंने कहा कि अब अमरीका भारत को वह मौका देगा जो अब तक वह चीन को देते आया है। इसके पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा विगत 24 सितंबर को दिए गए भाषण में कहा गया कि 2001 में चीन के विश्व व्यापार संगठन में दाखिल होने के बाद अमरीका के मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर को भारी हानि उठानी पड़ी है और चीन ने अमरीका की 60 हजार फैक्ट्रियों को नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में अब अमरीका चीन से कारोबार में कमी लाएगा और अमरीक निवेश के लिए भारत चीन की जगह ले सकता है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जापान की विश्वविख्यात ब्रोकरेज कंपनी नोमूरा ने चीन से पलायन कर रही कंपनियों से संबंधित अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि अप्रैल 2018 से अगस्त 2019 के दौरान चीन से 56 बड़ी कंपनियों का पलायन हुआ।

इनमें से सिर्फ  तीन भारत आई, जबकि सबसे ज्यादा 26 कंपनियों ने वियतनाम में अपना कारोबार शुरू किया। विगत 6 अक्तूबर को अमेरिका के विख्यात संगठन एडवोकेसी ग्रुप के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार करीब 200 अमरीकन कंपनियां चीन से अपना निवेश समेट कर और उत्पादन बंद कर भारत की ओर कदम बढ़ा सकती हैं। एक अक्तूबर से सैमसंग ने चीन में अपना कारोबार समेट लिया है और भारत में अपने मैन्युफेक्चरिंग प्लांट का विस्तार किया है। सोनी कंपनी ने चीन में स्थित अपने स्मार्टफोन प्लांट को बंद करने की घोषणा कर दी है। एप्पल ने भी बंगलुरू में अपनी उत्पादन इकाई खोल दी है। इसी परिप्रेक्ष्य में विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत चीन और पश्चिमी देशों को पछाड़कर दुनिया का नया कारखाना बन सकता है। हाल ही में चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ‘एनबीएस’ ने कहा है कि चीन में सकल घरेलू उत्पाद ‘जीडीपी’ की वृद्धि दर वर्ष 2018 में घटकर 6.6 फीसदी पर आ गई है। यह दर सन् 1990 से यानी पिछले 28 वर्षों में अब तक की सबसे धीमी जीडीपी वृद्घि दर है। वैश्विक शोध संगठन स्टैटिस्टा और डालिया रिसर्च के द्वारा मेड इन कंट्री इंडेक्स 2018 में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा गया है कि गुणवत्ता के मामले में मेड इन इंडिया मेड इन चायना से आगे है।

निश्चित रूप से चीन की आर्थिक और औद्योगिक मुश्किलों के बीच जहां चीन से मुंह मोड़ने वाली कंपनियां बड़ी संख्या में भारत की ओर कदम बढ़ा सकती हैं, वहीं भारत के विनिर्माण के क्षेत्र में आगे बढ़ने की संभावना के कई बुनियादी कारण भी तेजी से चमकते हुए दिखाई दे रहे हैं। कई आर्थिक मापदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में भारत ने विश्व की एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के तौर पर पहचान बनाई है। वैश्विक आर्थिक अध्ययन बता रहे हैं कि भारत आने वाले वर्षों में दवा निर्माण, रसायन निर्माण और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में सबसे तेजी से उभरने वाला देश बनेगा। भारत की श्रम शक्ति का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इस समय भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत की पहचान प्रतिभाओं के गढ़ के रूप में है।

निःसंदेह मेक इन इंडिया की डगर चुनौतियों से भरी हुई है, लेकिन यदि हम चाहते हैं कि मेक इन इंडिया सफल हो और भारत दुनिया का नया कारखाना बनने की संभावनाओं को अपनी मुठ्ठियों में ले तो हमें कई बातों पर ध्यान देना होगा। जिस तरह बांग्लादेश, वियतनाम, फिलीपींस जैसे देशों के द्वारा चीन से कारोबार समेट रही कंपनियों को अपने देश में आकर्षित करने के सफल प्रयास किए जा रहे हैं। हमें औद्योगिक और श्रम सुधारों के कार्यान्वयन को गतिशील करना होगा। देश में जीएसटी एवं प्रत्यक्ष कर सरलीकरण के प्रयासों को गति देनी होगी। अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की रफ्तार तेज करनी होगी। मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर की अहम भूमिका बनाई जानी होगी। उन ढांचागत सुधारों पर भी जोर दिया जाना होगा, जिसमें निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके।

हमें अपनी बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपने प्राडक्ट की उत्पादन लागत कम करनी होगी। देश के उद्योग-व्यवसाय में कौशल प्रशिक्षित युवाओं की मांग और आपूर्ति में लगातार बढ़ता अंतर दूर किया जाना होगा। हम आशा करें कि अब नए रणनीतिक प्रयासों से भारत वैश्विक विनिर्माण का नया केंद्र और दुनिया का नया कारखाना बनने के उभरे हुए चमकीले मौके को अपनी मुट्ठियों में करते हुए दिखाई दे सकेगा।

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