पंडित चले खड्ड नहान

Oct 22nd, 2019 12:05 am

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

पंडित जॉन अली बापू के ऐसे अनुयायी हैं, जिन्हें उनके नाम पर कोई भी बरगला सकता है। बापू का नाम सुनते ही इमोशनल हो जाते हैं। खुद भले ही जींस में घूमते हों, लेकिन गांधी जयंती पर सूत कातना नहीं भूलते। उनका चरखा गांधी जयंती से दो दिन पहले स्टोर से निकलता है और दो अक्तूबर को मोहल्ले में रस्मी कताई के बाद अंधेरे में खो जाता है। सत्य के ऐसे पुजारी हैं कि अपने फायदे के अलावा कभी झूठ नहीं बोलते, लेकिन समाज से सख्त नाराजगी है कि लोग स्वच्छता का बिलकुल ध्यान नहीं रखते। जो बातें संस्कारों में शामिल होनी चाहिए, वे बाहर से थोपी जा रही हैं। भला यह भी कोई बात हुई कि कुछ खास मौकों पर सामूहिक साफ-सफाई की रस्म निभा दी जाए और अगले दिन अखबारों में फुल पेज खबर और फोटो छपने के बाद सब भुला दिया जाए। वह इस बात पर भी खीजते हैं कि आधुनिक विश्व के सबसे बड़े कर्मयोगी के जन्मदिन पर राजपत्रित अवकाश क्यों रहता है। हालांकि मोहल्ले में आयोजित गांधी जयंती समारोह की तमाम औपचारिकताएं निभाने के बाद शाम को अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक्शन मूवी देखने के बाद डिनर भी बाहर करना ही पसंद करते हैं। वजह उस दिन उनकी मैरिज एनीवसअरि होती है। बापू की अहिंसा तो उनकी नस-नस में समाई हुई है। बस घर में हफ्ते में एक-दो बार मटन-चिकन ही बनता है। कभी-कभार गुस्से में बीवी से मारपीट हो जाती है या फिर बच्चों पर हाथ उठ जाता है। गांधी जयंती को जब देश के खुले में शौच मुक्त होने की घोषणा हुई तो उनका मन इतना मुदित हुआ कि उन्होंने किसी छुट्टी वाले दिन खड्ड में स्नान करने की योजना बना डाली। उन्हें लगा कि जब देश खुले में शौच मुक्त हो गया है तो खड्ड में नहा कर बचपन की यादें ताजा की जानी चाहिए। रविवार को नाश्ता करने के बाद जब वह खड्ड में स्नान के लिए निकलने लगे तो बीवी ने टोका भी, लेकिन उसे अनसुना कर, हाथ में टॉवेल, साबुन-तेल लेकर निकल पड़े, लेकिन खड्ड की ओर जाने वाली पगडंडी पर पांव धरते ही उनकी छठी हिस ने चेताया। पर देश के खुले में शौच मुक्त होने की घोषणा से इतने मुदित थे कि नीचे उतरने लगे। नहर से नीचे उतरते ही मल की बदबू से उनके  नथुने भर उठे। पत्थरों की ओट लिए कई सज्जन प्रकृति के सवाल का जवाब देते दिखे। लोगों ने खड्ड के साथ बने शनि मंदिर के आस-पास का स्पेस भी नहीं छोड़ा था। पानी में जली हुई जोत, धूप के टुकड़े, सड़े फूल, खंडित मूर्तियां वगैरह देखकर उनका दिमाग भन्ना गया। किसी नटनी की तरह बचते-बचाते आगे बढ़े तो देखा कि सरकारी पेयजल योजना के लिए उसी खड्ड से पानी लिया गया था। किसी तरह बाहर निकले और ऊंचे पत्थर पर बैठ कर सोचने लगे कि क्या यह राष्ट्रपिता के लिए उसी राष्ट्र की श्रद्धांजलि है, जो उनके बताए गए सत्य, अहिंसा और प्रेम के रास्ते पर चलने का दम भरता है? जिस शख्स ने उम्र भर सत्य के प्रयोग करते हुए सत्य की राह नहीं छोड़ी, उसी की जयंती पर इससे बड़ा झूठ क्या होगा कि देश खुले में शौच मुक्त हो गया है?

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