पर्यटन एवं आस्था का अनूठा संगम श्री रेणुका जी मेला

जिला सिरमौर के श्रीरेनुका जी धार्मिक स्थल में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले मां पुत्र के  पावन मिलन का प्रतिक अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है, जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उतरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थल श्रीरेणुका में मनाया जाता है। इस बार यह मेला 8-12 नवंबर तक आयोजित किया जा रहा है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी मां रेणुका से मिलने आते हैं। यह मेला श्रीरेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है, जोकि असंख्य लोगों  की अटूट श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष यह मेला श्री रेणुकाजी तीर्थाटन पर 8 से 12 नवंबर तक परंपरागत एवं बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। बदलते परिवेश के बावजूद भी यह मेला असंख्य श्रद्धालुओं की अगाध आस्था व श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। मध्य हिमालय की पहाडि़यों के आंचल में सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र का पहला पड़ाव है श्रीरेणुकाजी। यह स्थान नाहन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर भारत का प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है, जहां नारी देह के आकार की प्राकृतिक झील, जिसे मां रेणुकाजी की प्रतिछाया भी माना जाता है, स्थित है। इसी झील के किनारे मां श्रीरेणुकाजी व भगवान परशुराम जी के भव्य मंदिर स्थित हैं। कथानक अनुसार प्राचीन काल में आर्यवर्त में हैहयवंशी क्षत्रिय राज करते थे तथा भृगुवंशी ब्राह्मण उनके राज पुरोहित थे। इसी भृगुवंश के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ। महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र में तपस्या में मग्न रहने लगे। जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की वह ‘तपे का टीला’ कहलाता है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को मां रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम ने जन्म लिया। इन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। अश्वत्थामा, ब्यास, बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य व मारकंडेय के साथ अष्ठ चिरंजीवियों के साथ भगवान परशुराम भी चिरंजीवी हैं। बताया जाता है कि महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी, जिसे पाने के लिए सभी तत्कालीन राजा ऋषि लालायित थे। राजा अर्जुन ने वरदान में भगवान दतात्रेय से एक हजार भुजाएं पाई थी, जिसके कारण वह सहस्रार्जुन कहलाए जाने लगा। एक दिन वह महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंच गया। महर्षि जमदग्नि ने सहस्रबाहु एवं उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया तथा उसे समझाया कि कामधेनु गाय उसके पास कुबेर जी की अमानत थी, जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर गुस्साए सहस्रबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। यह सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर में कूद गई। राम सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढकने का प्रयास किया जिससे इसका आकार स्त्री देह समान हो गया। उधर भगवान परशुराम महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन थे, लेकिन योगशक्ति से उन्हें अपनी जननी एवं जनक के साथ हुए घटनाक्रम का एहसास हुआ और उनकी तपस्या टूट गई। परशुराम अति क्रोधित होकर सहस्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े तथा उसे आमने-सामने के युद्ध के लिए ललकारा। भगवान परशुराम ने सेना सहित सहस्रबाहु का वध कर दिया। तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रतिवर्ष इस दिन कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपने पुत्र भगवान परशुराम को मिलने आया करेगी। एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि जमदग्नि तपस्या में लीन रहते थे। ऋषि पत्नी रेणुका पतिव्रता रहते हुए धर्म कर्म में लीन रहती थी। वे प्रतिदिन गिरि गंगा का जल पीते थे तथा उससे ही स्नान करते थे। उनकी पतिव्रता पत्नी रेणुका कच्चे घड़े में नदी से पानी लाती थी। सतीत्व के कारण वह कच्चा घड़ा कभी नहीं गलता था। एक दिन जब वह पानी लेकर सरोवर से आ रही थी तो दूर एक गंर्धव जोड़े को कामक्रीड़ा में व्यस्त देखकर वह भी क्षण भर के लिए विचलित हो गई तथा आश्रम देरी से पहुंची। ऋषि जमदग्नि ने अंतर्ज्ञान से जब विलंब का कारण जाना, तो वह रेणुका के सतीत्व के प्रति आशंकित हो गए और उन्होंने एक-एक करके अपने 100 पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया, परंतु उनमें से केवल पुत्र परशुराम ने ही पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता का वध कर दिया। इस कृत्य से प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने पुत्र से वर मांगने को कहा,तो भगवान परशुराम ने अपने पिता से माता को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रतिवर्ष इस दिन डेढ़ घड़ी के लिए अपने पुत्र भगवान परशुराम से मिला करेंगी। तब से हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को भगवान परशुराम अपनी माता रेणुका से मिलने आते हैं। मां-बेटे के इस पावन मिलन के अवसर से रेणुका मेला आरंभ होता है। तब की डेढ़ घड़ी आज के डेढ़ दिन के बराबर है तथा पहले यह मेला डेढ़ दिन का हुआ करता था, जो वर्तमान में लोगों की श्रद्धा व जनसैलाब को देखते हुए यह कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक आयोजित किया जाता है। मेला श्रीरेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा आयोजन है।

छह दिन तक चलने वाले इस मेले में आसपास के सभी ग्राम देवता अपनी-अपनी पालकी में सुसज्जित होकर मां-पुत्र के इस दिव्य मिलन में शामिल होते हैं। परंपरा के अनुसार 7 नवंबर को ददाहू से भगवान परशुराम की शोभा यात्रा निकाली जाएगी, जिसमें भगवान परशुराम की जामूकोटी से आई मुख्य पालकी के अतिरिक्त कटाह शीतला, देव शिरगुल मंडलाह इत्यादि देवी-देवताओं की पालकियां भाग लेगी । 8 नवंबर को प्रबोधनी एकादशी और 12 नवंबर को पूर्णमासी के पावन अवसर पर प्रातः रेणुका झील में स्नान करने का विशेष पर्व होगा।

– सूरत पुंडीर, नाहन

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