बच्चों को सिखाएं शालीन भाषा

Oct 9th, 2019 12:05 am

जगदीश बाली

स्वतंत्र लेखक

कुछ रोज पहले एक शाम रोजाना की तरह टहलते-टहलते मैंने देखा एक छोटा सा बच्चा अपनी बहन के साथ झगड़ रहा है। बच्चे की उम्र कोई छह साल और उसकी बहन की उम्र तकरीबन आठ साल प्रतीत हो रही थी। झगड़ते-झगड़ते अचानक बच्चे ने अपनी बहन को धक्का दिया और बोला, ‘साली मा…’। बच्ची तो गिरते-गिरते बची और मम्मी-मम्मी चिल्लाती हुई निकल गई। मैं उस नन्हें से बालक के मुंह से इन शब्दों को सुन कर हक्का-बक्का रह गया। मैंने बच्चे को डांटते हुए कहा कि ऐसी गंदी बात नहीं कहते। बच्चा वहां से भागता हुआ बोला, ‘जब पापा-मम्मी लड़ते हैं, तो वो भी ऐसा ही बोलते हैं’।

किसी के लफ्ज व लहजे से काफी हद तक उसके व्यक्तित्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। बातचीत का अंदाज किसी की शख्सियत के राज, दाग व सीरत खोल देता है। ठीक वैसे ही जैसे डकार से किसी के पेट व सेहत का अंदाजा हो जाता है। हर एक का अंदाज-ए-बयां अपना-अपना होता है। ये व्यक्ति को एक पहचान देता है। शायरों में गालिब एक अलग स्थान रखते हैं क्योंकि उनकी शायरी का अलग अंदाज था। वे खुद कहते हैं, ‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे-बयां और।’ बातचीत में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा किसी के सभ्य या असभ्य होने की बानगी भी है। किसी खास जगह पर कभी खास समूहों में भाषा की इस अभद्रता को स्वीकार किया जा सकता है, परंतु हर जगह, हर समूह में हमेशा नहीं। लेखक जेम्ज रोजोफ  का कहना है, ‘भाषा की फूहड़ता उस मदिरा की तरह होता है, जिसका इस्तेमाल एक खास समूह में खास समय पर ही किया जा सकता है’। परंतु खेदजनक है कि आधुनिक समाज में आम बातचीत में फूहड़ता, भद्दापन व अभद्रता बढ़ती जा रही है। बच्चे भी बड़ों की ऐसी भाषा सुन कर इसे अपना रहे हैं। कुछ रोज पहले एक शाम रोजाना की तरह टहलते-टहलते मैंने देखा एक छोटा सा बच्चा अपनी बहन के साथ झगड़ रहा है। बच्चे की उम्र कोई छह साल और उसकी बहन की उम्र तकरीबन आठ साल प्रतीत हो रही थी। झगड़ते-झगड़ते अचानक बच्चे ने अपनी बहन को धक्का दिया और बोला, ‘साली मा…’। बच्ची तो गिरते-गिरते बची और मम्मी-मम्मी चिल्लाती हुई निकल गई। मैं उस नन्हे से बालक के मुंह से इन शब्दों को सुन कर हक्का-बक्का रह गया। मैंने बच्चे को डांटते हुए कहा कि ऐसी गंदी बात नहीं कहते। बच्चा वहां से भागता हुआ बोला, ‘जब पापा-मम्मी से लड़ते हैं, तो वह भी ऐसा ही बोलते हैं’।

जाहिर है बच्चे ने ये भाषा अपने घर में ही सीखी होगी। इसमें बच्चे का दोष नहीं क्योंकि  उसे तो ये मालूम भी नहीं होगा कि जो उसने कहा उसके मायने क्या थे। बच्चे अकसर बड़ों के द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा को बड़ी जल्दी अपना लेते हैं। पैंट-कोट, टाई पहने हुए जेंटलमैन दिखने वाले भी कई बार जब मिलते हैं, तो उनकी बातचीत में भी भाषा का यह बिगड़ा हुआ मिजाज झलकता है। बात करते हुए कई बार वे भूल जाते हैं कि उनके आसपास भी दुनिया बसती है। अगर निकट कोई बच्चा हो तो बात दूर तलक पहुंच जाती है। बच्चे को लगता है कि शायद अपनेपन में ऐसा ही कहा जाता है। हिंदी फिल्मों के टपोरी संवादों व गानों में तो अब इस तरह की अलंकृत भाषा का इस्तेमाल आम होता जा रहा है। वैसे बातचीत के बिगड़े हुए बोलों से आप विद्यालयों में भी रू-ब-रू हो सकते हैं। मजे की बात यह है कि छात्र ताबड़तोड़ इन एक्सपलेटिवज का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें एहसास तक नहीं होता कि वे क्या बोल रहे हैं। कई बार तो भाषाई तहजीब सिखाने वाले गुरु जी भी ऐसी अलंकृत भाषा का इस्तेमाल करने में मजबूर दिखते हैं। वे बेचारे भी क्या करें, जुबान पर जो चढ़ गए हैं ये शब्द। किसी आम शौचालय की दीवारों पर जो कुछ लिखा मिलता है, वे लिखने वालों के अंदर छुपे मैल को दर्शाती है। कुछ महाशय अपने अंदर छिपी हुई शैतानी को शे‘र लिख कर भी दर्शाते हैं। कहते हैं महिलाओं के शौचालयों में भी इस सृजनात्मकता के उदाहरण मिल जाते हैं। ये देख कर छोटे बच्चे भी ऐसी भाषा सीख जाते हैं और छोटे मियां तो कई बार दो कदम आगे निकल जाते हैं और उन्हें ऐसा करते देख कहावत याद आती है, बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे सुभान अल्लाह।

गौरतलब है कि बच्चे छोटे जरूर होते हैं, पर उनके कान लंबे होते हैं अर्थात बच्चे इस बात के प्रति सचेत होते हैं कि मां-बाप या बड़ों के बीच में क्या बातें चल रही हैं। अगर माता-पिता अपने बच्चे को किताबों को सही क्रम में अल्मारी में रखने के लिए कहता है, तो वह इस बात को नजर अंदाज कर सकता है, मगर माता-पिता के बीच होने वाले संवाद के प्रति वे बड़े सचेत होते हैं। दोनों के बीच चल रहे वाद-विवाद, आक्रामक बहस व कहा-सुनी को वे बड़े गौर से सुनते हैं। अगर दोनों के बीच यह अकसर होता रहे, तो बच्चे की वाक्शैली पर इसका प्रभाव अवश्य नजर आता है। जिस भाषा में बड़े बात करते हैं, जिस लहजे और अंदाज में बड़े बोलते हैं, वही भाषा और अंदाज बच्चों का भी हो जाता है। बच्चे को किसी भी भाषा वाले माहौल में डाल दिया जाए, वह उस भाषा को बिना किसी औपचारिक पढ़ाई के ही सीख जाता है। वे अकसर वही भाषा बोलते हैं, जो वे बड़ों को कहते हुए सुनते हैं। यदि वे बड़ों को गाली-गलौज करते हुए सुनते हैं, तो वे भी गाली देना सीख जाते हैं। यदि बड़े गुस्से में चिल्लाते हैं, वे भी चिल्ला कर बोलना सीख जाते हैं। उन्हें कई शब्दों के मायने भी पता नहीं होते, परंतु वे उनका प्रयोग कर लेते हैं। वे ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं, जिन्हें सुन कर घर के बड़े सन्न रह जाते हैं। कई बार तो वे टायलट में लिखी अश्लील भाषा के बारे में भी पूछ लेते हैं। दरअसल बड़ों के द्वारा प्रयोग की गई आक्रामक, गंदी व अश्लील भाषा जुकाम की तरह फैलती है। यह बड़े से बच्चे को, बच्चे से बच्चे को और फिर सारे बच्चों में फैल जाती है। भाषा का ज्ञान न होना कमजोरी या कमी माना जा सकता है, परंतु फूहड़ और अभद्र भाषा का नियमित तौर पर इस्तेमाल समाज में बढ़ रहे छिछोरेपन व विकृत मानसिकता को दर्शाता है। भाषाविदों, माता-पिता व शिक्षकों को भाषा के बिगड़ते मिजाज पर भी ध्यान देना चाहिए। बच्चों से शालीन भाषा में बात करें और उनके सामने शालीन भाषा में बात करें। याद रखें कौन सी बात किससे कैसे कहनी है, यह सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है। तभी हमारे बच्चे शालीन भाषा सीखेंगे।

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