बिखरे नेशनल हाई-वे के सपने

प्रस्तावित से स्वीकृत, योजनाओं-परियोजनाओं पर राजनीति का एक विस्तृत लेखा-जोखा हिमाचल में मिल सकता है, लेकिन इन कोरे पन्नों पर प्रदेश की वास्तविकताएं जटिल हो रही हैं। जनता को याद होगा कि एनडीए के पिछले दौर में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने एक साथ हिमाचल की काया और छाया बदलते हुए दर्जनों नेशनल हाई वे चित्रित कर दिए थे। इस दांव में सियासी शहादत तय थी, लिहाजा तत्कालीन वीरभद्र सिंह सरकार भाजपा के आरोपों से बदनाम हुई कि उसने डीपीआर न बनाने में ही प्रदेश को फिसड्डी बना दिया। बेशक अब भी प्रस्तावना से स्वीकृति तक बिखरे नेशनल हाई वे के सपने, पूरे प्रदेश की जनता को सब्जबाग दिखा रहे हैं, लेकिन हकीकत में ऐसी परियोजनाओं को अब मरे हुए सांप की तरह गले में लटकाने की नौबत आ गई है। अब नई नीति के हवाले से अगर हिमाचल में पूर्व घोषित या स्वीकृत (?) नेशनल हाई वे पर प्रमाणिकता के साथ मुहर लगनी है, तो फिजिबिलिटी का आधार पहले मापा जाएगा। करीब सत्तर महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं हिमाचल में कनेक्टिविटी का एक व्यापक आधार चुन सकती थीं, लेकिन छह वर्ष गुजर जाने के बाद भी न सड़कों की निशानदेही और न ही बजट की राह मुकम्मल हुई। बल्कि अब ठीकरे फूटेंगे। नेशनल हाई वे प्राधिकरण की शर्तें पर्वतीय राज्यों के लिए इसलिए भी घातक हैं, क्योंकि इनकी मरम्मत के खर्चे अब राज्य सरकारों को ही वहन करने पड़ेंगे। यह दीगर है कि शिमला-धर्मशाला व पठानकोट-मंडी की प्रस्तावित फोरलेन सड़क परियोजनाएं अनिश्चय की स्थिति में पहुंच गई हैं। पर्वतीय मार्गों की चौड़ाई का कसूरवार चेहरा कालका-शिमला मार्ग के नए अनुभव को जोड़ना है और जहां इंजीनियरिंग के दावे औंधे मुंह गिर रहे हैं। ऐसे में हिमाचल में एनएच या फोरलेन की परिपाटी को पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है। हर साल मौसम के हिसाब से सड़कों की काबिलियत इसलिए धोखा दे रही हैं, क्योंकि पहाड़ के हिसाब से इंजीनियरिंग के प्रयोग व नवाचार यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे कि निर्माण को किस तरह गुणवत्तापूर्ण साबित किया जाए। ऐसे में अगर पर्वतीय राज्यों के लिए अलग से मानक व बजटीय रियायतें नहीं मिलेगी तो विकास की मूल भावना ही परास्त होगी। केंद्र की मौजूदा सरकार ने पर्वतीय राज्यों को मिले वित्तीय अधिकारों को नजरअंदाज करते हुए कड़े पैमानों से मापना शुरू किया है, जिससे विकास के अगले चरण कठिन हो रहे हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में 50ः50 के अनुपात में हिमाचल जैसा पहाड़ी राज्य शायद ही इन्हें अमल में ला सकेगा। इसी तरह सड़क यातायात की नब्बे फीसदी जरूरतों पर केंद्र की शर्तें नागवार गुजरेंगी। पहले ही फिजिबिलिटी के पैमानों पर न रेल विस्तार संभव हो पा रहा है और न ही आवश्यक सड़क व हवाई अड्डों का विस्तार दिखाई दे रहा है। प्रदेश की यातायात व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि कुछ सड़कों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पैमानों के तहत बनाया जाए। इन्हीं संदर्भों को इन्वेटर मीट में देखें, तो हिमाचल में कारोबार करने के लिए कनेक्टिविटी की परेशानियां दूर करनी होंगी। रेल, सड़क और विमान सेवाओं के हिसाब से यह प्रदेश देश की निचली पायदान में संघर्षरत है। आश्चर्य यह कि अपने प्रस्तावों पर लट्टू होती रही सरकारों ने कभी भी अधोसंरचना के खाके में अपनी जिद और जिरह को पूर्ण होते नहीं देखा, लिहाजा प्रस्तावना से स्वीकृति तक के मजाक में सुबह होने का इंतजार है। प्रदेश को अपनी अधोसंरचना के खाके में मात्र इजाफा भर नहीं करना, बल्कि इसे स्तरोन्नत इन्वेस्टर मीट के हवाले से अगर सफल होना है, तो कनेक्टिविटी का लॉजिस्टिक सामर्थ्य भी पेश करना पडेंगा तथा गुणवत्ता आधारित मानदंडों पर खरा साबित करते हुए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में खड़ा होना होगा। निवेश के तराजू पर आशाओं के पलड़े तभी इनसाफ करेंगे, अगर भविष्य की डगर मजबूत होगी। हिमाचल का आज और कल सबसे अधिक सड़कों पर निर्भर करता है, तो इस यथार्थ को हम प्रस्ताव से स्वीकृति के मौन मंचन से मुकम्मल नहीं कर पाएंगे। केंद्र ने पिछले पांच साल के दौरान आशाएं दीं, लेकिन वादों की बुनियाद पर आज भी खामोशी है।

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