भाई साहब। ऐसे भी होता है क्या?

अशोक गौतम

साहित्यकार

इससे पहले कि मैं उनके भन्नाने का कारण पूछता वे ही बोले, ‘यार! हद हो गई! कैसे लोग हैं ये? पहनते सफेद झक कुर्त्ता- पाजामा हैं और….’ ‘ये कौन? ‘जिन्होंने मुझे खरीदा था। पेमेंट के वक्त वो मेरे साथ धोखा कर गए।’ ‘मतलब, आप भी बिके थे,’ पहली बार किसी नेता के मुंह से उसके बिकने की बात सुनी तो मैं पतंग हो गया। ‘बिके थे नहीं यार! हम तो इनकी उनकी सरकार बनाने को यदा कदा बिकते ही रहते हैं कभी बाजार के पीछे तो कभी बाजार के आगे। ये राजनीति बहुत बड़ी मंडी है दोस्त! यहां रेता से लेकर नेता तक सब बिकता है। दूसरे जनता के प्रिय नेता होने के चलते अब हमारे पास अपने को बेचने के सिवाय और है भी क्या? बस ये पांच फुट की काया! जो इसे बेच मिल गया सब इसकी माया! जब तक कोई इसे खरीदता रहेगा दोस्त! आंखें मूंद बेच लेंगेए, जिस दिन हममें बिकने की ताकत नहीं रहेगी, उस दिन की उस दिन देखी जाएगी। पर…. पर जब बिके थे तो तय हुआ था कि उन्होंने हमें दो करोड़ में खरीदा जाएगा। ‘यह रेट किसने तय किया था? सेल में तो नहीं? ‘मैंने यों ही पूछ लिया क्योंकि अपने व्यंग्य का रेट तो अखबार, मैगजीन ही तय करते हैं। ‘नहीं! सेल के बाहर। कुछ हमने तो कुछ उन्होंने, ‘कह उन्होंने ठंडी सांस अपने सिकुड़ते फेफड़ों में भरी। ‘दो करोड़ में? मेरा मुंह खुला का खुला। अपने व्यंग्यों को सौ दो सौ बिकने वाला क्या जाने करो? दो करो? ‘हां यार! वह संसद है संसद! तेरी व्यंग्यों की मंडी तो है नहीं कि सौ रूपए टोकरे के हिसाब से भी किसी ने ने छाप दिए तो भी लाखों पाठक पाए। ‘सो तो है। तो?’ ‘तो क्या! जब पेमेंट की बारी आई तो हाथ में पाचास हजार का चेक थमा दिया, ‘कह वे जेब से मुचड़ा पचास हजार का चेक मेरे आगे लहराते बोले तो मेरी अंदर की सांस अंदर, तो बाहर की सांस बाहर। पहली बार पचास हजार लिखा चेक जो देखा था। ‘मतलब डेढ़ करोड़ डकार गए?’ ‘हां यार! पहली बार किसी ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा किया है। वरना, पहले जब बिकते थे तो रेट के साथ बीस पचास हजार एक्स्ट्रा देते थे’। ‘मंदी भी चली है इन दिनों। कहीं इसी की वजह से…. पर उस सौदे में बिचौलिए का भी तो होगा? ‘क्योंकि मुझे पता है कि भगवान से लेकर फोका धान तक बिन बिचौलिए के नहीं उठता। ‘हां यार! उसका पांच परसेंट तय था। इस ओर से भी और उस ओर से भी।’ ‘तो उससे बात कर लेते? ‘देखो ए अनाज मंडी में तय रेट से रेट कम मिलने पर बात की जा सकती है पर राजनीति की मंडी में बिलकुल नहीं।’ ‘तो अब? प्रश्न यक्ष प्रश्न से भी गंभीर। ‘अब क्या! न्यूट्रल हो जाऊंगा। उनको कदम-कदम पर अपने से हुए धोखे की यार दिलाऊंगा।‘ राजनीति में भी धोखा? यार! सबसे अधिक धोखा आज कहीं है तो बस राजनीति में ही तो है। हर कदम इतना फूंक- फूंक कर खाना पड़ता है  मगर फिर भी….’ कह वे पता नहीं अब कहां बिकने को रवाना हो गए। राजनीति में नेता बिकता और ग्राहक के बिना भी ग्राहक के इंतजार में सिकता भुट्टा सबको अच्छा लगता है।  

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