यह कैसा बदलाव है, जनाब

सुरेश सेठ, साहित्यकार

हमें आजकल देश के भाग्य विधाता हर समय उस कोशिश में लगे नजर आते हैं, हमें आश्वस्त करते हुए कि उनके भगीरथ प्रयास से यह देश बदल गया है। थोड़ा बदला है, थोड़ा और बदलने की जरूरत है। इसलिए इस देश के हर आम और खास आदमी को यह बताया जा रहा है कि अपने मतों का सही इस्तेमाल कीजिए। हमें फिर गद्दी संभालने की जिम्मेदारी प्रदान करें, इससे आपके कायाकल्प में जो कसर रह गई है उसे पूरी कर देंगे। बेशक बहुत कसर रह गई। सस्ती आटा-दाल योजना के अधीन देश के हर बशर को दो रुपए किलो आटा और बीस रुपए किलो दाल देनी थी। कहीं-कहीं तो मुफ्त चाय की पत्ती और कौडि़यों के दाम फल और फूल देने का वायदा भी था। अब सस्ते अनाज की दुकानें नहीं खुल सकीं, क्योंकि विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी। खाद्य सुरक्षा अधिनियम भी बीच में लटक गया। अमरीका के ट्रंपवादी और उनके चेले-चांटे कृषि प्रधान देश तकलीफ  में थे, कि अगर इस देश की आधी-पौनी भूख से मरती आबादी को इतना सस्ता आटा-दाल मिल गया, तो हमारे तीसरे दर्जे को समुद्र में डुबो देने लायक अनाज यहां  कैसे खपेगा। इसलिए वे समवेत स्वर में चिल्लाते रहे कि भारत की खेती से सबसिडी की बैसाखियां हटाओ। उधर देश की कृषि केंद्रित पंचवर्षीय योजनाओं और किसान हितैषी बजटों की कृपा से सूदखोर महाजन, कच्चे और पक्के आढ़तिए ही खुशहाली से फूल कर कुप्पा हो गए और इधर भुखमरी के सूचकांक में हमारा देश और रसातल में चला गया। राजधानी में केवल एक काला हांडी ही नहीं घटा, केवल तीन बच्चियां ही भूख से तड़प-तड़प कर नहीं मरी, देश के हर कोने में बच्चों की एक लंबी कतार सहक-सहक कर मरती नजर आई। आंकड़ा शास्त्री इन्हें कुपोषण से मरता हुआ बताता रहे, जिसका आधार अन्न-जल न मिलने की समस्या नहीं थी। कुपथ्य से पैदा होता अपच, अफारा और बदहजमी थी। ये नौनिहाल तो भारत मां की जय बोलने से पहले चल बसे। जो देश के लिए मरे वो शहीद कहलाता है, परंतु भूख की वजह से मरों को तो शहीद का दर्जा नहीं दे सकते। परंतु इस देश ने तो अपने अमर क्रांतिकारियों को भी अभी शहीद कहने का ढंग नहीं सीखा, वह कर्ज के बोझ तले दब कर आत्महत्या करते किसानों की गिनती कैसे इनमें कर लेता? बल्कि हमारे मुंह जोर नेताओं ने तो कह दिया कि ‘साहब यह तो बढ़ा मुआवजा हथियाने के लोभ में मरे भद्रजन हैं’। ऐसी मौतें न हमारी हरित क्रांति की असफलता का पैमाना है और न ही भूख से तड़प-तड़प कर मरते बच्चों की बचाव मुद्रा वाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट हमारी अमानवीयता की पराकाष्ठा। देश तो बदल गया, आपको नजर नहीं आया। साहब! आप चूहे हैं जो बिल्ली सामने देख कर भी अपनी आंखें बंद कर के उसके न होने की कल्पना करते हैं, तब तक करते हैं जब तक वह उसे झपट कर न ले भागे, लेकिन आपको यह बदलता हुआ देश क्यों नजर नहीं आता? क्यों भूख से दम तोड़ते बच्चे और बूढ़े आपको याद दिलाते हैं कि आज भी देश में उतने ही गरीब लोग अपने भूखे पेट पर तबला बजा रहे हैं, जितने आज से दस साल पहले या उससे दस साल पहले बजाते थे।

 

 

 

You might also like