संकट में हिमाचल कांग्रेस

हिमाचल के उप चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए कड़ा संदेश लेकर आए हैं और ये संगठन से नेताओं तक की मिट्टी सरका गए हैं। चुनावी हाजिरी में जो नेता अग्रिम पंक्ति ढूंढ रहे थे, उनसे हिसाब लिया जाए या जो किसी कारणवश अनुपस्थित रहे उन पर दोष मढ़ा जाए। जाहिर है चुनावी जंग में वीरभद्र सिंह, जीएस बाली और सुधीर शर्मा की बीमारी स्पष्ट झलकती है, तो यह उपस्थित दो नेताओं के केंद्र में कांग्रेस की रणनीति ढूंढती है। नेता विपक्ष के रूप में विधायक मुकेश अग्निहोत्री के लिए धर्मशाला से पच्छाद तक की दौड़ का लक्ष्य पूरा करना आसान नहीं रहा, तो मनोनीत कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर के लिए क्षमता की विफलता को छुपाना मुश्किल होगा। वे तमाम बयानबाजियां जो चुनावी सुर्खियों में आनंदित रहीं, परिणामों की कब्र में शायद आत्ममंथन कर लें तो बेहतर होगा। हिमाचल में कांग्रेस को भयंकर संकट से उबारने के बजाय उपचुनाव में कुछ नेता अपना-अपना बदन नापते रहे। परिणामों से एक दिन पहले कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार का धर्मशाला में खुलकर पूर्व मंत्री पर आरोप लगाना या हार के बिंदुओं पर पार्टी के नेताओं का खोखलापन अगर बोल रहा है, तो कांग्रेस सदमे में है। पार्टी खुद से पूछे कि उसके पास ऐसा क्या था कि उप चुनावों में जीत सुनिश्चित हो जाती या जिन्होंने कमान थामी वे अपनी रगों से पूछें कि भाजपा के सामने उनकी औकात क्यों ठहर जाती। धर्मशाला में सीधा विरोध झेल रही भाजपा अगर सम्मान व साहसपूर्वक जीती, तो यह फील्ड प्रबंधन ही माना जाएगा। क्या कांग्रेस सुखविंदर सिंह सुक्खू को हटाकर सही विकल्प चुन पाई या संगठन की पैरवी में नए अवतार को लाना होगा। जो भी हो कांग्रेस न अपने सिद्धांतों पर जिंदा रहने की जरूरत समझ रही है और न ही आत्ममंथन की दिशा में चल रही है। अपनी हार के बीच बचाव के तर्क देख रही पार्टी को आसमान पर उठाने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि कोई एक दिन में वीरभद्र सिंह सरीखा नहीं बन सकता। नेतृत्व का संकट कांग्रेस के वर्तमान ढांचे को फिर लज्जित कर गया, तो उस समर्थक को कौन रोकेगा जो पच्छाद में गंगूराम मुसाफिर को आगे बढ़ाता रहा। कांग्रेस का वजूद इतना कमजोर हो गया कि धर्मशाला के उप चुनाव में निर्दलीय के आगे भी पार्टी गौण हो गई। सत्ता के बाहर संघर्ष की राह पर कांग्रेस का साहस देखा जाएगा, तो आपस में उलझे नेताओं का भ्रम कौन मिटाएगा। राजनीतिक प्रतिभा में नई कांग्रेस का आगाज वक्त की मांग है, तो वीरभद्र से अलहदा आजमाने की भीड़ में कोई चिराग चाहिए। प्रश्न वीरभद्र के बाद कौन तक सिमटा रहेगा, तो पार्टी इसी तरह कुंठित तथा स्वार्थ से भरी रहेगी, जबकि संगठन की ताकत में अब युवा ऊर्जा झोंकने की जरूरत है। पार्टी काडर की सीढि़यां फिर विद्रूप तथा आहत हैं, फिर हर कोई हार के ठीकरे फोड़ने के लिए गर्दनें ढूंढ रहा है। क्या सुधीर का दृश्य से हटना अपने गुनाह पेश करता रहा है या परिस्थितियों के चक्रव्यूह में एक पूर्व मंत्री के खिलाफ कोई षड्यंत्र अपना घेरा कसता रहा। जो भी हो उप चुनावों की परिणति में कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि इसकी आंच को समझना पड़ेगा। भाजपा ने कांग्रेस को राजनीतिक युद्ध में ललकार कर पस्त किया, तो यह चुनौती अब पार्टी को समझ लेनी होगी। जुंडली बनाकर या कुंडली मारकर कांग्रे्रस का कोई एक धड़ा सफल नहीं होगा। धर्मशाला के परिदृश्य से निकले बुनियादी प्रश्न सीधे पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष से भी मुखातिब हैं, तो बतौर नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री को अपनी मान्यता का प्रसार संतोषगढ़ से बाहर भी करना होगा। चंद्र कुमार जैसे ओबीसी नेता को खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि निर्दलीय उम्मीदवार ने ऐसे जातिगत समीकरण में उनसे जमीन खींच ली है। चुनाव से पहले कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर ने जिस फेहरिस्त पर काम किया, उसी आधार पर धर्मशाला हार में बचाव पक्ष ढूंढ रहे हैं। आत्ममंथन से पहले उनकी संगठनात्मक क्षमता की कमजोरियां पुनः जाहिर हुई हैं। यह दीगर है कि पार्टी खोये हुए को पाने की बजाए कुछ और खोने के लिए हाथ पांव मार रही है। धर्मशाला हार के सबक शिमला बैठकर समझ नहीं आएंगे, क्योंकि कांगड़ा में पार्टी नेतृत्व आपसी मार काट में लगा है।

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