हिमाचल का निवेश टेस्ट

Oct 31st, 2019 12:05 am

ग्लोबल इन्वेस्टर मीट के बहाने हिमाचल का रियल टेस्ट भी होने जा रहा है और हकीकत के कई दर्पण सामने आएंगे। आवाजें सरकारी परियोजनाओं के तिलिस्म से बाहर यथार्थ की निगरानी में मुखर होंगी या निवेश की अवधारणा में बुनते नए सपनों को आंखों  में भर लेंगी, देखना अभी बाकी है। नूरपुर में फोरलेन को लेकर शुरू हुए आमरण अनशन में क्या पढ़ा जाए। आक्रोशित जनसमुदाय के विरोध में आशा की पताका को ऊपर उठाना हो तो सरकार क्या करेगी। या तो शीघ्रातिशीघ्र फोरलेन की स्थिति व लक्ष्य की स्पष्टता जाहिर होनी चाहिए या परियोजना के संदर्भों को विराम देना पड़ेगा। कमोबेश ऐसी स्थिति में प्रदेश भर के अरमान झूल रहे हैं या जनता अपने अनिश्चिय को मिटाने के लिए सरकार से स्पष्टीकरण मांग रही है। भैया दूज पर्व पर निकली भाई-बहनों की सवारी अगर प्रदेश भर के यातायात को जाम कर दे, तो सड़क पर परिवहन की आरजू यकीनन फोरलेन की मांग करेगी। फिर कहीं होली-उतराला सड़क परियोजना चंबा से कांगड़ा की दूरी कम करने की रिवायत में सरकारी निवेश की कवायद चाहती है, तो तफसील से मुख्यमंत्री आश्वासन दे देते हैं। इस बीच भरमौर की आबोहवा में सियासी निवेश की पलकें बिछाई जाती हैं। कुछ सरकारी कार्यालयों की फेहरिस्त में हिमाचल की नाप नपाई शुरू हो जाती है। जनता विकास के अंजाम तक खड़ी राजनीतिक विरासत है, लिहाजा हिमाचल दो नावों पर सवार होने की कोशिश कर रहा है। पहला सरकारी आवरण में चप्पू चलाने की कोशिश तो दूसरी तरफ पहली बार निजी निवेश के तंबू में सरकार की मंत्रणा। होली-भरमौर के रिश्तों में  सरकार को अपना आवरण दिखाना है, लिहाजा कई तरह की घोषणाओं का जाम पीकर जनता विश्लेषण करेगी। ऐसे में क्या इन्वेस्टर मीट का ताल्लुक भी इसी जनता से होगा या यहां एक अलग हिमाचल खड़ा हो रहा है। कहना न होगा कि सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के बीच जनता को भागीदार कैसे बनाएं। या तो वह  उपभोक्ता बनती रही है या बतौर मतदाता सत्ता से हासिल अपने अधिकार तौलती रही है। दोनों ही परिस्थितियों में उत्तरदायित्व की पहचान होगी। उदाहरण के लिए अगर सरकारी कार्यालय दायित्व की पहचान में पिछड़ते रहेंगे, तो निजी क्षेत्र की जरूरत ही उसकी प्रासंगिता बन जाएगी। यह बड़ी तीव्रता से हिमाचल में हो रहा है। खासतौर पर शिक्षा व चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी क्षेत्र की असफलता, निजी निवेश को पारंगत करने की वजह बन चुका है। ऐसे में ग्लोबल इन्वेस्टर मीट अगर शिक्षा-चिकित्सा में ढांचागत सुधार , गुणवत्ता में प्रसार तथा सार्वजनिक संस्थानों का विकल्प ढूंढ लेती है, तो सफलता के पैमाने लबालब होंगे। धर्मशाला में ही ग्लोबल  इन्वेस्टर  मीट के पहले जोनल अस्पताल से एक साथ छह डाक्टरों की अन्यत्र प्रस्थान करने की प्रक्रिया से, पहले से चल रहे रिक्त पदों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि इसका स्तर डिस्पेंसरी तक मापा जाएगा। ऐसे में सार्वजनिक व निजी निवेश की जरूरतों को खंगालते हुए क्यों न यह मंजूर किया जाए कि ऐसे संस्थानों का विनिवेश कर दिया जाए। असफल सरकारी ढांचा अगर नए निवेश से अपनी हालत सुधार ले, तो इस पर फैसले लेने होंगे। निजी निवेश के रास्ते साफ करने के लिए हिमाचल को सर्वप्रथम अपने रास्तों को इस काबिल बनाना पड़ेगा ताकि कदम उठें, तो मंजिल तक ले जाएं। नूरपुर  में आंदोलन को फोरलेन के पक्ष में देखने के लिए सरकारी तंत्र को अपने प्रति विश्वास का इजाफा करना होगा। यह मामूली संघर्ष नहीं, लेकिन इन्वेस्टर मीट के लिए स्पष्ट संदेश है। कुछ इसी तरह पौंग बांध विस्थापितों ने भी मोर्चा खोल कर इन्वेस्टर मीट के सामने अपने प्रश्न चुन लिए हैं, लिहाजा आयोजन के विषयों को मानवीय सामर्थ्य और समर्थन के समीप खड़ा करना होगा।

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