हिमाचल की तस्वीर बदल देगा यह फल

शरद गुप्ता

लेखक, शिमला से हैं

बागबानी क्षेत्र में विविधताओं की अपार संभावनाओं को देखते हुए, आज आपका ध्यान एक ऐसे फल की ओर आकर्षित करना चाहूंगा जो बागबानों की आय को कई गुना तक बढ़ा सकता है। वर्तमान में इस फल को विदेशों से आयातित किया जा रहा है, जिसकी कीमत भारतीय बाजारों में 2000 से 2500 रुपए प्रति किलो तक है। जी हां, बात कर रहा हूं ‘ब्लू बैरी’ की । पोषक तत्त्वों से भरपूर ब्लू बैरी को यूरोपियन देशों में काफी पसंद किया जाता रहा है। इसे प्रति उपचायकों का राजा भी कहा गया है…

जलवायु विविधता की दृष्टि से हिमाचल देशभर में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। लाहुल घाटी जैसे शीत मरुस्थल से लेकर ऊना जैसे गर्म क्षेत्रों में यहां 33 प्रकार के फलों का उत्पादन किया जाता है। वर्तमान में हिमाचल को सेब राज्य के रूप में जाना जाता है। लगभग 4000 करोड़ रुपए के सेब के उद्योग को प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ माना जाता है। बागबानी क्षेत्र में विविधताओं की अपार संभावनाओं को देखते हुए, आज आपका ध्यान एक ऐसे फल की ओर आकर्षित करना चाहूंगा जो बागबानों की आय को कई गुना तक बढ़ा सकता है। वर्तमान में इस फल को विदेशों से आयातित किया जा रहा है, जिसकी कीमत भारतीय बाजारों में 2000 से 2500 रुपए प्रति किलो तक है। जी हां, बात कर रहा हूं ‘ब्लू बैरी’ की । पोषक तत्त्वों से भरपूर ब्लू बैरी को यूरोपियन देशों में काफी पसंद किया जाता रहा है। इसे प्रति उपचायकों का राजा भी कहा गया है।

विटामिन-बी और आहरीय रेशे से परिपूर्ण ब्लू  बैरी के अनेकों फायदे हैं। यह उच्च रक्त चाप और दिल की बीमारियों को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, भारत में भी लोगों का रुझान ब्लू बैरी की तरफ  बढ़ रहा है, जिसके चलते इसका आयात विदेशों से करना पड़ रहा है। विश्व में ब्लू बैरी के उत्पादक देशों में अमरीका और कनाडा का अग्रणी स्थान है, जो लगभग 269.26 और 178.75 हजार मीट्रिक टन तक का उत्पादन प्रति वर्ष करते हैं । चिली जैसे छोटे से देश ने वर्ष 2018 में लगभग 5694 करोड़ रुपए की ब्लू बैरी का निर्यात विभिन्न देशों को किया। शायद आपको जानकार हैरानी होगी कि वहां पर मात्र 15600 हेक्टेयर भूमि पर ही ब्लू बैरी की खेती की जा रही है अर्थात वहां का बागबान प्रति हेक्टेयर क्षेत्र से 37.96 लाख रुपए की ब्लू बैरी का निर्यात कर रहा है।

इसकी तुलना यदि हिमाचल के सेब से की जाए, तो औसतन उत्पादन 6 से 7 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर हो रहा है, जिसका अधिकतम मूल्य यदि 80 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मान कर भी चलें तो कुल राशि 5.6 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर ही बन पाती है, जो ब्लू बैरी की तुलना में बहुत कम है। हिमाचल में यदि ब्लू बैरी को उत्पादन की दृष्टि से देखा जाए तो इसकी अपार संभावनाएं नज़र आती हैं। एक आकलन के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में औसतन 15 टन ब्लू बैरी का उत्पादन किया जा सकता है। दो-तीन वर्षों में यह पौधा फसल देना शुरू कर देता है और लगभग 20 से 25 वर्षों तक इससे फल लिए जा सकते हैं। रेबीट आई ब्लू बैरी की बहुत सी किस्में हैं जिनकी शीत घंटों की आवश्यकता 350 से 700 घंटे तक रहती है। एक तरफ  जहां हम संभावनाओं की बात कर रहे हैं वहीं इसके उत्पादन में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ब्लू बैरी के पौधे के लिए मिट्टी का पीएच मान 4.0 से 5.5 के मध्य होना आवश्यक है। ऐसे क्षेत्र जिनकी मिट्टी और जलवायु इसकी पैदावार के अनुकूल हों, को चिहिन्त करके इस फल का सफल उत्पादन किया जा सकता है। क्षारीय मिट्टी को यह पौधा बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। हालांकि कुल्लू घाटी में एक निजी संस्था द्वारा इसका सफल उत्पादन किया जा रहा है, लेकिन कृत्रिम रूप से मिट्टी को अम्लीय बनाए रखना और इसमें होने वाली लागत और तकनीक पर शोध करने की आवश्यकता है। कृषि-औद्यानिकी विश्वविद्यालयों द्वारा जब तक इसकी उत्पादन तकनीक को प्रमाणित नहीं किया जाता, तब तक इसकी खेती को व्यावसायिक स्तर पर अपनाना बागवानों के लिए जोखिम भरा रहेगा।

दूसरी तरफ, खेती के लिए पौधों की उपलब्धता भी एक चुनौती है। शुरुआती दौर में इसके पौधों को विदेश से आयात करना पड़ेगा, उसके बाद ही इन्हें स्थानीय नर्सरियों में विभाजित किया जा सकता है। लगभग एक शताब्दी पूर्व, 1916 में जब सैंयूल इवांस स्टोक्स ‘स्त्यानंद स्टोक्स’ द्वारा सेब को हिमाचल में लाया गया था, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह फल प्रदेश के बागबानों के लिए वरदान साबित होगा। आज जरूरत है एक और कदम उठाने की, सरकार और बागवानों के संयुक्त प्रयासों से ही हिमाचल में ब्लू बैरी की खेती व्यावसायिक स्तर पर आरंभ की जा सकती है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि यह फल प्रदेश के किसानों की तकदीर बदल कर रख देगा।

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