अंततः महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन

Nov 13th, 2019 12:05 am

आसमान से गिरी, खजूर में अटकी। कमोबेश यही स्थिति है शिवसेना की। उसने सिर्फ  ‘कुर्सी’ की छटपटाहट और महत्त्वाकांक्षा के मद्देनजर भाजपा के साथ तीन दशक पुराना गठबंधन भी तोड़ लिया, उसके बावजूद सरकार बनाने का वक्त उसकी मुट्ठी से लगभग फिसलता जा रहा है। राज्यपाल ने शिवसेना को अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया था और मंगलवार को वह एनसीपी नेताओं से मिले हैं। शिवसेना को एनसीपी-कांग्रेस का समर्थन जितना आसान लगता था, उतना ही पेंचदार हो गया है। सत्ता की भूख इतनी प्रबल थी कि शिवसेना ने केंद्र सरकार से भी खुद को अलग कर लिया और उसके कोटे के भारी उद्योग मंत्री अरविंद सावंत से भी इस्तीफा दिलवा दिया गया। राष्ट्रपति ने इस्तीफा मंजूर भी कर लिया है। अब एनडीए में से 18 लोकसभा और तीन राज्यसभा सांसद बाहर आ चुके हैं। बहरहाल असमंजस और आधी-अधूरी स्थिति यह है कि शिवसेना एनडीए से तो संबंध-विच्छेद कर चुकी है, लेकिन दूसरी तरफ  शरद पवार और सोनिया गांधी के दलों ने शिवसेना का हाथ नहीं थामा है। यह स्थिति मंगलवार बीतने तक है। हालांकि पवार और सोनिया गांधी ने एक और बार बातचीत की है। कांग्रेस और एनसीपी में बैठकों के दौर जारी रहे। पवार और कांग्रेस नेताओं-अहमद पटेल, खड़गे, वेणुगोपाल में मुलाकात और बात भी हुई, लेकिन समर्थन-पत्र जारी करने में क्या दिक्कत है, यह स्पष्ट नहीं हुआ। बताया गया कि कांग्रेस के 44 विधायकों में से 38 शिवसेना के साथ ही सरकार बनाने के पक्ष में हैं। पवार इसलिए ऐसा चाहते हैं, ताकि भाजपा कांग्रेसियों को तोड़-फोड़ न सके, लेकिन यह आलेख पूरा लिखने तक कांग्रेस अपना रुख साफ  नहीं कर पाई थी। गौरतलब यह है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे एक पांच तारा होटल तक जाकर एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार से पहले ही मुलाकात और बात कर चुके हैं। उद्धव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी बात की है। जाहिर है कि कथित गठबंधन के बिंदुओं पर विमर्श हुआ होगा। कांग्रेस की सर्वोच्च कार्य समिति और एनसीपी की कोर कमेटी में भी कई बार मंथन किया जा चुका है। आखिर सहमति और समर्थन के बिंदु तक पहुंचने में दिक्कत क्या हो सकती है? यह किसी विचारधारा के सामंजस्य का मुद्दा नहीं है, क्योंकि कांग्रेस और एनसीपी की कोई निश्चित विचारधारा नहीं है। अलबत्ता वे वैचारिक होने का ढोंग करती रही हैं। फिलहाल मोदी-आरएसएस विरोध की राजनीति ही कथित धर्मनिरपेक्ष दलों की राजनीतिक विचारधारा हो सकती है। बेशक एनसीपी-कांग्रेस दोनों ही घोर हिंदूवादी पार्टी शिवसेना को समर्थन देकर उसकी सरकार बनाने की मुद्रा में लगती हैं, लेकिन ऐसी सरकार बनी, तो वह ‘अल्पजीवी’ ही होगी। सबसे ज्यादा समझौता शिवसेना को ही करना पड़ेगा। सबसे पहले तो उसे अपनी हिंदुत्व वाली सोच छोड़नी पड़ेगी। फिर संस्थापक बाल ठाकरे के तेवर और बयान से भी उसकी किरकिरी होगी। भाजपा-शिवसेना का गठबंधन कोई सामान्य नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी, बाल ठाकरे और लालकृष्ण आडवाणी सरीखे राजनीतिक तपस्वियों ने गठबंधन को गढ़ा था, लेकिन उद्धव की शिवसेना ने एक साथ कइयों को अपमानित किया है। जनादेश को ठेंगा दिखाया है। जनता को धोखा दिया है। महत्त्वाकांक्षा के बावजूद ‘कुर्सी’ नसीब होती मुश्किल लगती है। अब गेंद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पाले में है। अब राज्यपाल के सामने स्थिति साफ  हो चुकी है कि शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस के बीच कुछ भी तय नहीं हो सका है। साझा कार्यक्रम बनाने के नाम पर वे समय खर्च करना चाहती हैं। वक्त पहले ही ज्यादा बीत चुका है, क्योंकि नौ नवंबर तक नई विधानसभा का गठन होना था। लिहाजा इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन अपरिहार्य लगता है। राज्यपाल कोश्यारी किसी भी समय राष्ट्रपति शासन की सिफारिश गृह मंत्रालय को कर सकते हैं। उसके बाद कैबिनेट में विचार होगा और निर्णय लेकर सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्राजील प्रवास पर जाने से पहले कैबिनेट की आकस्मिक बैठक भी बुलाई। यानी महाराष्ट्र के समीकरणों पर कहा जा सकता है-दुविधा में दोनों गए, माया मिली, न राम।

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