अयोध्या में राम मंदिर

Nov 11th, 2019 12:03 am

प्रभु राम का टेंट वाला वनवास भी समाप्त…और अब वह अयोध्या लौटेंगे। भव्य मंदिर में सुशोभित होंगे। अब उनके जन्म पर भी कोई सवाल नहीं होगा। रामभक्त गरिमामय तरीके से पूजा-अर्चना करेंगे। अब अयोध्या में रामलला ही विराजमान होंगे और उनकी सदाशयता के फलस्वरूप ही सुंदर और विशाल मस्जिद भी बन सकेगी। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के सर्वसम्मत फैसले का उपसंहार यही है। न्यायिक पीठ ने अयोध्या की 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने का फैसला सुनाया है। नतीजतन अब भव्य, दैवीय राम मंदिर बनने का रास्ता एक दम साफ हो गया है। यह ऐतिहासिक और कालजयी फैसला है। इसी के साथ मंदिर बनाम मस्जिद का सदियों पुराना विवाद भी समाप्त हुआ। फैसला आस्था और भावनाओं के आधार के बजाय पुरातात्त्विक साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर लिया गया है। संविधान पीठ के पंच परमेश्वरों ने यह भी स्वीकार किया है कि यह  विवादास्पद नहीं है कि राम अयोध्या में पैदा हुए। आस्था और विश्वास पर भी विवाद नहीं हो सकता। यह हिंदुओं की आस्था है कि राम का जन्म हुआ। हिंदुओं की आस्था गलत होने का कोई प्रमाण नहीं है। संविधान पीठ ने सिर्फ  करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक आस्था का ही सम्मान नहीं किया है, बल्कि मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन अयोध्या में ही सुन्नी वक्फ  बोर्ड को देने का आदेश देकर मुसलमानों की भावनाओं को भी संबोधित किया है। यह दीगर है कि कुछ इस्लामी नेता इसे मस्जिद की सौदेबाजी से जोड़ कर देखें या इसे ‘खैरात’ करार दें, लेकिन फैसले के बाद देश के किसी भी हिस्से से नफरत, मजहबी उन्माद या तनाव की खबर तक नहीं आई। बेशक न्यायिक पीठ ने इस फैसले के जरिए विविधता में एकता और धर्मनिरपेक्षता के भाव को जीवंत  करने की कोशिश की है। उस संदर्भ में यह एक बेहद संतुलित फैसला करार दिया जा सकता है। सुन्नी वक्फ  बोर्ड ने भी फैसले को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका दाखिल न करने का इरादा बयां किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी देश को संबोधित करते हुए कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक नया सवेरा लेकर आया है। यह किसी की जीत या हार नहीं है। रामभक्त या रहीमभक्त की जीत-हार नहीं है, बल्कि देशभक्तों की जीत है, हिन्दुस्तान जीता है। अब राम मंदिर निर्माण के जरिए राष्ट्र-निर्माण का संकल्प लेना है। प्रधानमंत्री ने इस फैसले को बर्लिन की दीवार गिराने और करतारपुर गलियारा खोलने से जोड़ा है, क्योंकि उनकी तारीखें भी नौ नवंबर रही हैं। वाकई न्यायाधीश और हमारी न्याय-प्रणाली अभिनंदन के पात्र हैं। राम मन्दिर आंदोलन के शिखर-पुरुष रहे लालकृष्ण आडवाणी ने इसे आजादी के आंदोलन के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंदोलन करार दिया। बहरहाल सुप्रीम अदालत के सर्वसम्मत फैसले ने कुछ ऐतिहासिक सत्य भी सत्यापित किए हैं। मसलन-मस्जिद बाबर के दौर में मीर बाकी ने बनवाई थी। जहां मस्जिद बनाई गई, वहां मंदिर था। मस्जिद किसी खाली जगह पर नहीं बनी थी। खुदाई में जो मिला, वह इस्लामिक ढांचा, यानी ईदगाह, नहीं था। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपनी रपट में 12वीं सदी के मंदिर होने का जिक्र किया है। 12वीं-16वीं सदी में वहां क्या था, इसके सबूत नहीं हैं। अंग्रेजों के समय तक वहां नमाज पढ़ने के सबूत नहीं हैं। 18वीं सदी तक नमाज का भी कोई रिकार्ड नहीं है। एएसआई की रपट में उल्लेख था कि गुंबद के नीचे मंदिर था। हालांकि फैसले में यह भी कहा गया है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात में रामलला की दो मूर्तियां रखी गईं। एएसआई के साक्ष्य इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देखा जाए तो ज्यादातर फैसला एएसआई के साक्ष्यों पर ही आधारित है। न्यायिक पीठ ने छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराने की घटना को कानून-व्यवस्था का उल्लंघन करार दिया है। बहरहाल मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि उसके पास जमीन का विशेष कब्जा था। न्यायिक पीठ ने शिया वक्फ  बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के दावों को तो खारिज कर दिया। अब केंद्र सरकार तीन माह में ट्रस्ट बनाएगी। उसमें निर्मोही अखाड़े का प्रतिनिधि भी रखा जा सकता है। मस्जिद के लिए जमीन भी केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकारें मिलकर तय करेंगी कि कहां जमीन दी जा सकती है। इस फैसले के साथ ही करीब पांच सदी प्राचीन मुद्दे का पटाक्षेप हो गया। इसकी आड़ में की जा रही राजनीति का विश्लेषण फिर कभी करेंगे।

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