आत्म पुराण

वे पंचभूतों के भी दो प्रकार हैं। प्रथम पंचीकृत पंचमहाभूतों का नाम स्थूल है और पंचीकरण से रहित शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पंचतन्मात्राओं का नाम सूक्ष्म है। प्राण, वायु का नाम क्रिया शक्ति है। यह क्रिया शक्ति रूप प्राण उन आकाशादिक पंचभूतों का तो कार्यरूप कारण है और उस पुत्रों सहित तेरह पुत्रों का स्थिति रूप कारण है। हे शिष्य! अहंकार, मन, चित्त, श्रोत्र, त्बक,चक्षु, रसना, ध्राण, वाक, पाणि, पाद, उपस्थ, वायु यह तेरह पुत्र है और बुद्धि रूप पुत्री हैं। यह सब उस नारायणदेव से उत्पन्न हुए हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि पंचतन्मात्रा, पंच महाभूत एक प्राण अहंकारदिक तेरह पुत्र और एक बुद्धि रूप पुत्री सब मिलकर ये 24 तत्त्व होते हैं। इन पच्चीस तत्त्वों के हिरण्यगर्भादिक तो अधिदैव रूप है और यह स्थावर, जंगम शरीर अभिभूत रूप है। हे शिष्य! सर्वभूत प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति लय को करने वाला काल भी नारायणदेव ने ही उत्पन्न किया है।

नारायणदेव ने ही सूत्रात्मा रूप से समस्त देवताओं को भी उत्पन्न किया है। फिर किसी निमित्तवश क्रोधित होकर उन नारायणदेव ने अपने ललाट  देश से रुद्र भगवान को प्रकट किया। वे रुद्र भगवान कैसे हैं कि कंठ, नीला, अंग लोहित है, सूर्य, चंद्रमा तथा अग्नि ये तीन नेत्र हैं, त्रिशूल को धारण किया है। वे रुद्र भगवान नारायणदेव से अभिन्न हैं, इससे वे सब संपूर्ण ऐश्वर्य के आधार हैं। वे संपूर्ण धर्म, संपूर्ण यश, संपूर्ण श्री तथा संपूर्ण ज्ञान वैराग्य, सत्य, ब्रह्मचर्य, इंद्रिय निग्रह और शास्त्र के भी आधी हैं। ऐसे सब गुणों के आधार पर उन रुद्र भगवान से ही इन इंद्र आदि सब देवताओं को ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है। ये रुद्र भगवान ही उन सब देवताओें सब मुनियों, सब मनुष्यों को नाना प्रकार की विद्या प्राप्त कराने वाले गुरु रूप हैं। फिर वे ही प्रलयकाल में अग्नि रूप होकर तीनों लोकों को शीघ्र ही नाश को प्राप्त कराते हैं। फिर नारायण देव के ललाट से ही अंड की उत्पत्ति हुई उससे नाभिकमल द्वारा ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। कैसे हैं वे ब्रह्मा कि सर्वभूत प्राणियों के वे आदि रूप हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर-दक्षिण ये चार उनके मुख हैं, जिनसे क्रमशः गायत्री, त्रिष्टुय, जगती, अनुष्टुप छंद उत्पन्न होते हैं। भूः भुवः, स्वः, महः यह चार व्याहृतियां उत्पन्न होती हैं तथा ऋग, यजुष, सत अथर्वण ये चारों वेद भी उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार ये संपूर्ण विश्व ही ब्रह्मा से उत्पन्न होता है। हे शिष्य! इस प्रकार और अद्वितीय नारायणदेव अपनी माया द्वारा नाना भाव को प्राप्त होता है, पर  वास्त्व में वह नानारूप है नहीं वरन सर्वभेद से रहित एक और  अद्वितीय रूप ही है। पर जब इस प्रकार विचार करके भी यह अधिकारी पुरुष उस नारायण देव को नहीं जान पाता है, तो यह उनका ध्यान करता है।  हे शिष्य! यही महोपनिषद का सार है जिससे अधिकारी पुरुष महान फल को प्राप्त करता है। हे शिष्य! अब आत्म प्रबोध नामक उपनिषद द्वारा किया ब्रह्म विद्या का निरूपण ध्यान देकर सुनो। उसमें आत्म साक्षात्कार के दो उपाय बताए हैं। एक प्रणव मंत्र और दूसरा अष्टाक्षर मंत्र। प्रणव मंत्र का आशय ओंकार के जप से है। हे शिष्य! इन दोनों मंत्रों का उद्देश्य ब्रह्म से ही है, जो वास्तव में निर्गुण है।

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