आशापुरा माता कच्छ

गुजरात की धरती पर मंदिरों और धामों का खासा महत्त्व है। राजस्थान में पोखरण, मादेरा और नाडोल में आशापुरा माता के मंदिर हैं। आइए जानते हैं आशापुरा मंदिर का इतिहास और इसकी महत्ता। आशापुरा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है यहां की देवी। आशापुरा मां को कच्छ की कुलदेवी माना जाता है और बड़ी तादाद में इलाके के लोगों की उनमें आस्था है। आशापुरा माता की मूर्ति की एक खास बात यह है कि उनकी 7 जोड़ी आंखें हैं। आशापुरा माता को कई समुदायों द्वारा कुलदेवी के रूप में माना जाता है। मुख्यतः नवानगर, राजकोट, मोरवी, गोंडल बारिया राज्य के शासक वंश चौहान, जडेजा राजपूत, कच्छ की कुलदेवी है। आशापुरा माता का मुख्य मंदिर कच्छ में भुज से 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 14वीं शताब्दी में निर्मित आशापुरा माता मंदिर जडेजा राजपूतों की कुलदेवी को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण जडेजा साम्राज्य के शासनकाल के दौरान किया गया था। आशापुरा देवी मां को अन्नपूर्णा देवी का अवतार कहा जाता है, इसीलिए आशापुरा देवी मां के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। मान्यता अनुसार आशापुरा देवी मां हर मुराद अवश्य पूरी करती हैं। यही नहीं, गुजरात में कई अन्य समुदाय भी आशापुरा देवी को अपनी कुलदेवी के तौर पर पूजते हैं। मंदिर के भीतर 6 फुट ऊंची लाल रंग की आशापुरा माता की प्रतिमा स्थापित है। साल भर श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए मंदिर में जुटते हैं। आशापुरा देवी मां का उल्लेख पुराणों और रुद्रयमल तंत्र में भी मिलता है।

इस मंदिर में पूजा की शुरुआत कब हुई, इसका कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलता है लेकिन 9वीं शताब्दी ई. में सिंह प्रांत के राजपूत सम्मा वंश के शासनकाल के दौरान आशापुरा देवी की पूजा होती थी। इसके बाद कई और समुदायों ने भी आशापुरा देवी की पूजा करनी शुरू कर दी।

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