इन्वेस्टर मीट के बहाने-1

Nov 2nd, 2019 12:05 am

इन्वेस्टर मीट के बहाने प्रदेश की क्षमता, संभावना और भविष्य की रफ्तार का मूल्यांकन होगा, लेकिन इसके अक्स में विपक्ष की आलोचना का लोकतांत्रिक पैगाम तथा प्रदेश के प्रति सरोकार भी पढ़े जाएंगे। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने जो प्रश्न उठाए हैं, उनमें आयोजन पर खर्च तथा धारा-118 की छूट पर सरकार की नीयत पर शंका है। बेशक प्रदेश की आर्थिक हालत को देखते हुए यह परिस्थिति खड़ी होती है कि आय और व्यय के हिसाब से चादर पसारी जाए, लेकिन किसी भी दलदल से बाहर निकलने की इच्छा शक्ति को कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। निवेश की राह पर तत्कालीन वीरभद्र सरकार निकली थी और रोड शो भी हुए, लिहाजा उस मॉडल पर भी चर्चा होनी चाहिए। नेता प्रतिपक्ष को कांग्रेस की तरफ से इन्वेस्टर मीट के खाके में अपने मॉडल को बेहतर साबित करने के तर्क रखने चाहिएं और यह भी कि पूर्व सरकार के एमओयू क्यों और कहां खारिज हुए। हिमाचल में निजी निवेश के प्रति सरकारों ने पिछले काफी समय से हाथ खोलने और जोड़ने शुरू किए हैं, तो हमें यह भी समझना होगा कि प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों, भौगोलिक विविधता और सामाजिक संरचना में किस हद तक जाना है। हम हर क्षेत्र को निजी निवेश से पारंगत नहीं कर सकते, लेकिन जाया हो रही क्षमता को कब तक नजरअंदाज करेंगे। लक्ष्य ऊंचे करने का एक ही तरीका बचता है कि निजी निवेश के जरिए विकास की आपूर्ति की जाए। इसकी शुरुआत शांता कुमार सरकार ने देश में पहली बार पीपीपी मोड पर पालमपुर में निजी सहयोग से सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल की दिशा में की थी, लेकिन प्रदेश यह समझने में सियासी सहमति नहीं बना पाया। ऐसे में निवेश में सियासी सहमति और सरकारी कामकाज की निरंतरता आवश्यक है। इन्वेस्टर मीट तक पहुंचे काफिले को पूर्व सरकारों के फैसलों तथा दृष्टिकोण में भी देखा जाएगा। दूसरी ओर निवेश जैसे विषय में अगर राजनीतिक सहमति व निरंतरता रहेगी, तो निवेशक का भरोसा तथा निवेश का गुणात्मक प्रभाव बढ़ेगा। कहना न होगा कि पूर्व सरकार के कई एमओयू पर अनिश्चिय की स्थिति बनी हुई है, तो सवाल उठेंगे। उदाहरण के लिए धर्मशाला बस स्टैंड के प्रथम चरण पर करीब 35 करोड़ के एमओयू पर आज तक सरकार निर्णायक गति से काम नहीं कर सकी, तो सवाल खड़े होंगे। दरअसल हिमाचल की निवेश नीतियां पहले से ही अस्पष्ट रही हैं और धारा 118 के मामले में प्रदेश केवल पक्ष-विपक्ष में बंटा रहा। सत्ता के फैसलों का विरोध करते हुए धारा-118 की संवेदना हमेशा काम आई, जबकि इसके परिप्रेक्ष्य में प्रदेश की विविशताओं का समाधान नहीं ढूंढा गया। पूर्ववर्ती धूमल सरकार ने निवेशक के साथ हिमाचली बोनाफाइड का रिश्ता जोड़ने की पहल की, लेकिन ऐसे विषय पर सियासत हुई। ऐसे में हिमाचल के वर्तमान में यह समझना होगा कि निवेश की ख्वाहिश को हम निवेशक की इच्छा से अलग करके नहीं देख सकते। दोनों संदर्भों को नजदीक से देखना होगा। निवेश तभी आएगा, जब निवेशक को सुविधा होगी। दूसरी ओर निजी निवेश की प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा में प्रदेश को खड़ा करने के लिए निवेशक का सम्मान और एहसास जरूरी है। ऐसे में जयराम सरकार पूर्व सरकारों से कहीं आगे निकलकर देश-विदेश के चर्चित निवेशकों को यह समझाने में कामयाब रही है कि हिमाचल में उनके लिए निवेश का अवसर है। इन्वेस्टर मीट के लाल कालीन पर गुजरते निवेशक को यह बताने की कोशिश हो रही है कि हिमाचल में निवेश के मायने चिरस्थायी तथा प्रासंगिक हैं। हिमाचल में यह प्रयास सरकार की हैसियत चमका रहा है या प्रदेश के अस्तित्व में आर्थिकी का नया मोड़ जोड़ रहा है, इसको लेकर विपक्ष का अपना मत हो सकता है। सरकार के हर अच्छे-बुरे फैसलों पर विपक्ष की वाणी अलग हो सकती है, लेकिन हिमाचल को निवेश की उत्तम पायदान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी को अंगीकार करने का वक्त आ गया है। यह केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक प्रश्न भी है और इसीलिए प्रदेश की नीतियों का ऐसा आधार विकसित करना पड़ेगा, जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच रिश्ते और रास्ते स्पष्ट हों। कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना व महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तरह हिमाचल को अगर आगे बढ़ना है, तो निवेशक की पहचान, परिचय और पसंद का डेस्टिनेशन बनना पडे़गा।       

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