इन्वेस्टर मीट के बहाने-2

Nov 4th, 2019 12:06 am

धर्मशाला में इन्वेस्टर मीट के आलोच्य पक्ष को ढूंढकर विपक्ष अपनी हाजिरी लगा सकता है या जनपक्ष में अपने विचारों के हस्ताक्षर कर सकता है, लेकिन इस बहाने ऐसे कई प्रश्न उभरेंगे जो न जाने कितनी सरकारों के दायित्व को निचोड़ देंगे। इन्वेस्टर मीट के प्रबंधन में जुटी जयराम सरकार, बेहतर करने के लक्ष्य पर अपना समर्पण दिखा रही है और यह पहला ऐसा आयोजन होगा, जिसका निर्धारण चुनौतियों से भरा है। सरकार को अपनी प्रशासनिक काबिलीयत का इम्तिहान देना है, तो प्रदेश की प्रस्तुति में कारगर साबित भी होना है। बेशक इसका दायरा एक शहर की समीक्षा में प्रदेश के शहरीकरण की खामियों को कबूल करके प्रश्न उठाएगा, तो नीतियों व कार्यक्रमों में सियासी सोच की कमजोरियां भी जाहिर करेगा। निवेश की महासंगोष्ठी दरअसल अब तक के राजनीतिक विमर्श से हटकर भविष्य की मनोकामना को पूरा करने की दृढ़ प्रतिज्ञा सरीखी है, तो विवेचन के स्तर पर इसके निष्पादन की समीक्षा होगी। ऐसा महाआयोजन अपने आप में हिमाचल के प्रबंधन कौशल, अधोसंरचना विस्तार तथा शहरी व्यवस्था का मुआयना करेगा। भले ही कांग्रेसी नेता इन्वेस्टर मीट के औचित्य पर सवाल करें, लेकिन कुछ प्रश्नों के चपेटे में पूर्ववर्ती सरकारें भी आएंगी। जरा सोचें अगर अब तक कांगड़ा एयरपोर्ट का माकूल विस्तार हो गया होता, तो इन्वेस्टर मीट के प्रारूप-योजना में कितनी सुविधा होती। धर्मशाला-मकलोडगंज का रज्जु मार्ग अपने लक्ष्य के अनुसार अब तक बन गया होता, तो पर्यटन में निवेश की तस्वीर रू-ब-रू होती। फोरलेन परियोजनाओं की फेहरिस्त में अगर जमीनी तौर पर कुछ हुआ होता, तो निवेशक के सामने हिमाचल की तस्वीर कैसी होती। कांग्रेस अपने राजनीतिक कारणों से इन्वेस्टर मीट पर नुक्ताचीनी कर सकती है, लेकिन जब चर्चा अधोसंरचना पर होगी तो उसे भी अपनी सरकारों की जवाबदेही ओढ़नी पड़ेगी। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय निवेश की आशा में बैठी भाजपा सरकार को अपने अतीत के विरोध से कई सबक मिलेंगे। यानी स्की विलेज जैसी परियोजना अगर मनाली से खुर्द-बुर्द हुई, तो उसके पीछे भाजपा का न केवल विरोध रहा, बल्कि देव समाज को भी गलत अभिप्राय के लिए इस्तेमाल किया गया। पीछे मुड़ के देखें तो हिमाचल में ‘वाकनाघाट’ के नाम पर कितनी बार नए निवेश की संज्ञाएं जुड़ीं, लेकिन अब तक वहां हुआ कुछ भी नहीं। वाकनाघाट के निवेश घाट पर कांग्रेस और भाजपा स्वयं फैसला कर लें कि कौन सी सरकार ज्यादा दोषी है। पूरे देश में सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के बावजूद हिमाचल में आज तक अगर एक अदद आईटी पार्क स्थापित नहीं हुआ, तो इसके लिए राजनीतिक श्रेय कौन लेगा। प्रदेश ने बेशक सामाजिक सुरक्षा में झंडे गाड़े और दोनों ही पार्टियों की सरकारों ने अहम भूमिका अदा की। विकास के हर मुहाने पर कांग्रेस-भाजपा के बीच शायद ही कहीं अंतर होगा, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की अति सेवा में प्रादेशिक तरक्की की रिक्तता रह गई। भारतीय संदर्भों में हिमाचली विकास के नए मानक तथा आर्थिक तरक्की में निजी क्षेत्र की भागीदारी का यथार्थ भी अगर धर्मशाला की इन्वेस्टर मीट बता दे, तो प्रदेश नए दौर में रूपांतरित हो पाएगा। इन्वेस्टर मीट के बहाने प्रदेश की मुलाकात, नए दौर की संरचना की काबिलीयत प्रदर्शित कर रही है। निजी निवेशक को अतिथि बनाकर हिमाचल अगर अपने भविष्य का नया भागीदार चुन रहा है, तो इस सफर की कहानी का वर्णन अर्थहीन नहीं हो सकता।                          -क्रमशः

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