इन्वेस्टर मीट के बहाने-5

इसे कांग्रेस बनाम भाजपा के मुकाबले में देखेंगे, तो आलोचना के बीच संदर्भ बदल जाएंगे। भले ही सरकार के आमंत्रण पर विपक्ष की भागीदारी इन्वेस्टर मीट में सुनिश्चित न हो, लेकिन ढर्रा बदलने की आहट जरूर सुनी जाएगी। बात जब एमओयू के पहाड़ से उतर कर जमीनी हकीकत में दर्ज होगी, तो तमाम आपत्तियों की खारिश समाप्त हो जाएगी, फिलहाल निवेश के राजदूत के रूप में मुख्यमंत्री ने एक चुनौतीपूर्ण शुरुआत की है। यह प्रयास जरूरत और मजबूरी के बीच का संतुलन है और अगर सरकार इसे कामयाब करने में कुछ हद तक भी कायम होती है, तो हिमाचली अपेक्षाएं, अपनी संभावनाओं को पूरी तरह तराश पाएंगी। उदाहरण के लिए हिमाचल पिछले दो दशकों से सुरंग परियोजनाओं को लेकर विकास का कारगर मॉडल लिए घूम रहा है, लेकिन ऐसे साहसिक कार्य के लिए प्रदेश का वित्तीय ढांचा तैयार नहीं। हिमाचल में आधा दर्जन ट्रांसपोर्ट नगर चाहिएं, लेकिन निवेश का कोई समाधान नहीं। आश्चर्य यह कि पर्यटक शहरों में व्यापाक आकर्षण के बावजूद विस्तार के लिए निवेश नहीं। पूरे प्रदेश में मनोरंजन के लिए कोई परियोजना नहीं और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि शैक्षणिक गुणवत्ता के लिहाज से पहले से स्थापित संस्थान अप्रांसगिक हो रहे हैं। प्रदेश में पंजीकृत वाहनों की संख्या करीब सत्रह लाख तक पहुंच गई है, जबकि बाहरी प्रदेशों से इतनी ही संख्या में वाहन आ रहे हैं, लेकिन यातायात का एहसास अत्यंत कमजोर है। प्रदेश के हर शहर-कस्बे को बस स्टैंड चाहिए, तो शहरी परिवहन को एलिवेटिड ट्रांसपोर्ट नेटवर्क। हिमाचल को एनजीटी के सख्त निर्देशों के बीच विकास का जो मॉडल या तकनीक चाहिए, उसके लिए भारी निवेश का प्रबंध करना पड़ेगा। बहरहाल इन्वेस्टर मीट के हर आयाम पर बहस की गुंजाइश रहेगी और इस लिहाज से विपक्ष अपनी भवें तरेरनें के साथ-साथ वैकल्पिक समाधानों तथा प्रादेशिक विकास की सहमति में अपना सकारात्मक पक्ष रखे। जिस इन्वेस्टर मीट की आलोचना विपक्ष कर रहा है, उसके आयोजन की परिपाटी कायम करना अपने आप में हिमाचली क्षमता पर जबर्दस्त टिप्पणी है। देश-विदेश के निवेशकों को आमंत्रित करने की कसरतों के बाद इन्वेस्टर मीट जैसा इवेंट प्रदेश की आयोजन क्षमता टटोल रहा है। मात्र एक इवेंट पिछले कई महीनों की कसरतों के बावजूद अंतिम तैयारियों तक हिमाचल की बुनियादी जरूरतें इंगित कर रहा है। वर्षों से कान्वेंशन सेंटर की आवश्यकता के बावजूद आज तक राज्य में एक भी विकसित नहीं हुआ। धर्मशाला में ही इन्वेस्टर मीट के बहाने अगर अपर्याप्त पार्किंग व्यवस्था, माकूल बाइपास तथा वाहन वर्जित क्षेत्रों का अभाव दिखाई दे रहा है, तो ये भविष्य की चुनौतियां हैं। करीब दो हजार मेहमानों के आतिथ्य में अगर सरकारी मशीनरी को शिमला से धर्मशाला के शिविर में आना पड़ता है तथा पुलिस इंतजामों को बेहतर बनाने की कशमकश में हर तपके का अनुशासन बढ़ाया जाता है, तो यह समय की मांग है। यूं तो हिमाचल अपनी आबादी से तीन गुना से भी अधिक पर्यटकों को हर साल बुलाता है, लेकिन न उनकी पहचान और न ही सम्मान देने की कोई परिपाटी बनी। जिस दिन हिमाचल की व्यवस्था इस काबिल होगी कि करीब दो करोड़ पर्यटक हमारे मेहमान के तौर पर सम्मानित होंगे, उस दिन निवेश के लक्ष्य और निवेशक की भागीदारी पुष्ट हो जाएगी। जिस दिन हमारी व्यवस्था दरअसल नागरिक संवेदना हो जाएगी, उस दिन निवेश का माहौल परिपूर्ण होगा। जनता को ऐसे आयोजनों के मार्फत जो नजर आएगा, उससे सरकार की मंशा स्पष्ट होगी। जनता देखना यह भी चाहती है कि प्रदेश अपनी क्षमता के बलबूते सफलता के नित नए आकाश खोले। धर्मशाला के पुलिस मैदान से ऐसे ही आकाश को खोलने का संकल्प करवटें ले रहा है। जनता एक तरफ जनमंचों के मार्फत वर्तमान जयराम सरकार की समीक्षा कर रही है, तो दूसरी ओर इन्वेस्टर मीट के बहाने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिमाचल की बदलती तस्वीर को अंगीकार करना चाहेगी। शुरुआत हमेशा चंद कदमों से होती है, लेकिन कारवां बनाने के लिए कायनात बदलने का सामर्थ्य चाहिए। नतीजों पर विपक्ष की आंख तीखी होनी चाहिए और होगी, लेकिन इन्वेस्टर मीट तक पहुंचे हिमाचल की खिल्ली उड़ाने की सियासत नहीं होनी चाहिए। इन्वेस्टर मीट प्रदेश के आत्मबल और अब तक स्थापित व्यवस्थाओं, आर्थिक सुविधाओं, क्षमताओं तथा संभावनाओं का खुलासा जरूर करेगी।

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