एकलव्य के लिए

शिक्षा में एकलव्य की खोज करती केंद्र सरकार की पद्धति हिमाचल के कबायली इलाकों के लिए वरदान साबित होने की दहलीज पर खड़ी है। किन्नौर के निचार में सफलतापूर्वक चल रहे एकलव्य स्कूल के बाद पांगी, भरमौर और लाहुल-स्पीति में खाका तैयार है और इसके लिए करीब चार सौ करोड़ धनराशि से सुसज्जित शिक्षण संस्थान बन कर जब तैयार होंगे, तो हिमाचल के कुल अठारह सौ बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ पाएंगे। देश में 462 के करीब एकलव्य स्कूलों के माध्यम से केंद्र सरकार कबायली इलाकों में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा शैक्षणिक उत्थान की प्रासंगिकता में शिक्षा का बुनियादी ढांचा सशक्त कर रही है। जाहिर है हिमाचल में एकलव्य स्कूलों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में बेहतर शिक्षा ढांचे के मार्फत समाज का मार्गदर्शन होगा तथा चयनित छात्रों को उचित माहौल तथा स्तरीय शिक्षण संस्थान की सुविधाएं प्रदान होंगी। इससे पूर्व धूमल सरकार ने डा. यशवंत सिंह परमार गुरुकुल योजना के तहत कबायली शिक्षा को नए आयाम दिए थे और बाकायदा स्थानांतरण नियमावली में फेरबदल कर यह सुनिश्चित किया था कि छात्र-शिक्षक दर में भी सुधार हो। हिमाचल की कबायली जीवन पद्धति अब ऐसे मुकाम पर है, जहां ट्राइबल सबप्लान को फिर से परिभाषित तथा परिमार्जित करने की जरूरत है। प्रदेश के पांगी-भरमौर या लाहुल-स्पीति-किन्नौर हों, सामाजिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक परिवर्तन जिस रफ्तार से हो रहे हैं, उन्हें देखते हुए जिंदगी के मायने बदल रहे हैं। इतना ही नहीं किन्नौर से आबादी का स्थानांतरण जिस तेजी से सोलन-चंडीगढ़ की तरफ हुआ है या लाहुल-स्पीति के लोग मनाली से चंडीगढ़ की तरफ प्रस्थान कर रहे हैं, उसे देखते हुए शिक्षा की बुनियादी जरूरतें प्रश्नांकित हैं। कुछ इसी तरह पांगी-भरमौर के छात्रों ने धर्मशाला को अपना ठौर बनाकर भविष्य संवारना शुरू किया है, तो कबायली मंसूबों का महत्त्व रेखांकित होता है। हिमाचल की कबायली यात्रा देश से कहीं भिन्न और उम्मीदों से भरी है। प्रशासनिक सेवाओं के शुरुआती दौर में ही किन्नौर व लाहुल-स्पीति के चेहरे सम्मानित हुए, तो इसकी एक वजह शैक्षणिक उत्थान रहा। किन्नौर अगर आरंभ से ही शिमला पहुंचा, तो लाहुल-स्पीति भी शिक्षा की खोज में धर्मशाला तक पहुंचा जब ये क्षेत्र पंजाब का हिस्सा थे। हिमाचल में कबायली शिक्षा के साथ-साथ युवा महत्त्वाकांक्षा को समझें, तो एकलव्य स्कूलों के साथ-साथ अनेक शैक्षणिक पैटर्न को नए दिशा-निर्देश चाहिए। प्रदेश के कुछ महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में ट्रायबल स्टूडेंट्स की बढ़ती संख्या के हिसाब से विशेष मार्गदर्शन अभिलषित है। शिक्षा के जरिए पनपती महत्त्वाकांक्षा का एक जबर्दस्त मोड आजकल हिमाचल के पुस्तकालयों में प्रतिस्पर्धा के काबिल बनने की दिशा देख रहा है। अतः प्रदेश को उन चुनिंदा शहरों के पुस्तकालयों में संस्थागत परिवर्तन तथा व्यवस्थागत सुविधाएं बढ़ानी होंगी, जहां कबायली छात्रों के समूह बढ़ रहे हैं। पांगी-भरमौर के युवाओं का एक बड़ा वर्ग धर्मशाला जैसे शहर के प्राचीन पुस्तकालय को अध्ययन का कर्मठ कक्ष बना देता है, तो शिक्षा विभाग को लाइब्रेरी के इन संदर्भों में सशक्त होना पड़ेगा। अगर ट्रायबल क्षेत्रों के युवा पुलिस-सेना या पैरा मिलिट्री फोर्सिेज में भर्ती होने के लिए सार्वजनिक मैदानों की मिट्टी से खेल रहे हैं, तो विशेष अकादमियों का संचालन हो सकता है। देशभर की सरकारी सेवाओं में आरक्षित जनजातीय वर्ग के पदों के लिए  हिमाचली युवा भी बेहतर साबित हों, इसके लिए आरंभिक शिक्षा से भविष्य की तैयारी तक की हर पायदान का मुकम्मल प्रशिक्षण हो, तो नजरिया बदलेगा। इस लिहाज से एकलव्य स्कूलों की शुरुआत से जनजातीय क्षेत्र तभी लाभान्वित होंगे, अगर जिंदगी का चयन इनके माध्यम से दिशा और दृष्टि को सशक्त करे। इसके साथ-साथ हिमाचल के कुछ कालेजों और विश्वविद्यालयोें को अपनी क्षमता को रूपांतरित करते हुए उस भीड़ को रोकना होगा, जो धीरे-धीरे सरक कर प्रदेश से बाहर जा रही है।

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