गांव-शहर से नगर निगम तक

शहरीकरण को संबोधित करते मंतव्यों की यह सूचना गौरतलब है कि पालमपुर में एक और नगर निगम का उदय होगा। वर्षों से शहरीकरण को ग्रामीण विकास मंत्रालय में दबोचे हिमाचल, अगर अब भी इन इरादों को पूरी तरह जाहिर कर दे, तो बेतरतीब बस्तियां नागरिक सुविधाओं से जुड़ पाएंगी। यहां शहरीकरण केवल नगर पंचायत से निगम तक का विस्तार नहीं, बल्कि प्रदेश में चार दशक पहले आए ग्राम एवं नगर विकास कानून के अर्थ समझाने का तर्क है। हिमाचल में शहरी विकास से भी कहीं आगे शहरी मानसिकता के विकास को एक विस्तृत आयाम में समझना होगा। यह इसलिए कि गांव का चरित्र पूरी तरह बदल गया है और प्रति व्यक्ति आय के सूचकांक में दर्ज उपलब्धियां हर गांव में दर्ज होती हैं। इस तरह हिमाचल अपनी परंपराओं से बाहर निकलकर जिस जीवन शैली को चूम रहा है, उसकी बदौलत छोटे से प्रदेश में चौदह लाख वाहन पंजीकृत हो जाते हैं, जबकि बाहरी वाहनों का दबाव इसे कई गुना बढ़ा देता है। कमाल यह कि न शहर को सही जगह पर वाहन खड़े करने की सुविधा मिली और न ही गांव ने निजी वाहनों की आमद में कटौती की। किसी गांव से गुजरती सड़क के दोनों किनारों को माप लीजिए, तो मालूम हो जाएगा कि कितने वाहन इसे रोककर खड़े हैं। आश्चर्य यह कि सरकारें सिर्फ आंख मूंद कर सड़कों पर अतिक्रमण के दर्जनों बहाने देखकर भी पूरे प्रदेश का नियोजन नहीं कर पाई। पालमपुर तो सीमित नगर परिषद के दायरे में रहा, लेकिन आसपास के कई गांवों ने अपने यथार्थ को शहरी तर्ज पर विकसित कर लिया, लिहाजा हर तरह का दबाव देखा जा सकता है। देखना यह होगा कि कल जब शहरीकरण की परिक्रमा नगर निगम क्षेत्र के प्रस्तावित 27 गांवों से बाहर निकलती है, तो हम क्या करेंगे। ऐसे में नियोजित विकास के लिए शहरी विकास प्राधिकरण बनाए जाएं। प्रदेश भर में आधा से एक दर्जन शहरी विकास प्राधिकरण अगर विकसित होते हैं तथा पूरे राज्य को ग्राम एवं शहरी योजना कानून के तहत लाया जाए, तो कलस्टर के रूप में कई सुविधाएं उपलब्ध होंगी। पालमपुर-धर्मशाला-कांगड़ा की परिधि में शहरी विकास प्राधिकरण बनता है, तो एक बड़े क्षेत्र के नियोजित विकास की रूपरेखा, कूड़ा कर्कट प्रबंधन, स्थानीय परिवहन नेटवर्क तथा कर्मचारी आवासीय व्यवस्था एक साथ हो सकती है। धर्मशाला-कांगड़ा के बीचों बीच एक अंतरराज्जीय बस स्टैंड, अदालत परिसर तथा सब्जी मंडी विकसित करने का औचित्य बढ़ जाता है, जबकि धर्मशाला-पालमपुर के बीच चामुंडा के आसपास कर्मचारी नगर विकसित करके आसपास के शहरों और कस्बों को व्यवस्थित स्वरूप दिया जा सकता है। इसी तरह भुंतर-कुल्लू-मनाली, नादौन-हमीरपुर-भोटा, परवाणू-सोलन-वाकनाघाट, ऊना-मैहतपुर-संतोषगढ़, मंडी-नेरचौक-सुंदरनगर तथा बिलासपुर-घाघस-बरमाणा के लिए अगर कलस्टर प्लानिंग करनी है, तो इसी आधार पर शहरी विकास प्राधिकरण स्थापित करने होंगे। हिमाचल के सीमांत इलाकों को जोड़ते हुए पांवटा, कालाअंब, बीबीएन, टाहलीवाल से जसूर तक औद्योगिक गलियारा विकसित करना होगा ताकि प्रदेश की आर्थिकी को संबल मिले। प्रदेश की आर्थिक संरचना को समझते हुए कलस्टर प्लानिंग के तहत बस स्टैंड, स्थानीय परिवहन, न्यायिक परिसर, अस्पताल, कूड़ा-कर्कट प्रबंधन, सब्जी मंडियां, आवासीय बस्तियां, पर्यटन मंजिलें, सामुदायिक मैदान, सम्मेलन कक्ष तथा अन्य सुविधाएं जुटानी होंगी। एनजीटी के सुझावों पर गौर करते हुए नए उपग्रह शहरों व निवेश केंद्रों की स्थापना, आधुनिक बाजारों तथा मनोरंजन सुविधाओं का विकास योजनाबद्ध तरीके से तभी संभव होगा यदि हम शहरी विकास प्राधिकरण के तहत लैड बैंक स्थापित करने को अधिमान दें। इसके अलावा हर शहर के वर्गीकरण को अहमियत देते हुए शिक्षा हब, हैल्थ सिटी, खेल नगर, सांस्कृतिक शहर, आर्थिक या औद्योगिक शहरों के विकास खाके मजबूत किए जाएं। कनेक्टिविटी के आधार पर पूरे प्रदेश की योजना को भविष्यगामी बनाते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कहां ट्रांसपोर्ट नगर और कहां धार्मिक नगरों का औचित्य लाजिमी है। शहरी विकास विभाग को पुराने ढर्रे से बाहर लाने के लिए सशक्त करना होगा, जबकि व्यवस्थागत प्रबंधन के लिहाज से कर्मचारी-अधिकारियों की संख्या में विस्तार करना होगा। गांव से शहर तक के बढ़ते यातायात को देखते हुए चौक-चौराहों का विकास, बस स्टॉप व ग्रामीण बस स्टैंड की व्यवस्था सड़क से हटकर करनी होगी। बहरहाल पालमपुर की हैसियत में नगर निगम क्या कर पाता है और इसके साथ मंडी व सोलन जैसे शहरों के लिए सरकार का क्या पैगाम है, आने वाला वक्त ही बताएगा।

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