गीता रहस्य

Nov 2nd, 2019 12:14 am

स्वामी रामस्वरूप

श्रीकृष्ण महाराज जी का भाव है कि गृहस्थादि आश्रम में साधक वेद विद्या को ग्रहण करता हुआ यज्ञ, योगाभ्यास आदि साधना करता है तो वह पृथ्वी पर सुर इंद्र लोकम अर्थात एक सुख ऐश्वर्यपूर्वक गृहस्थादि आश्रम का निर्माण करता है…

अथर्ववेद मंत्र 11/15 में कहा है (अयं यज्ञः वः गातुवित) अर्थात ये यज्ञ कर्म तुम्हारे लिए स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग है। यज्ञ अंतकरणः एवं वातावरण दोनों को शुद्ध करता है। आगे मंत्र 11/1/31 का यही भाव है कि स्वर्ग प्राप्ति के लिए हम मन को शुद्ध बनाएं, साधना द्वारा अंतःकरण में ज्ञान की ज्योति प्रकट करें और शरीर के सब अंग शुद्ध हों एवं वेदों के ज्ञाता विद्वान का संग सदा बने रहे।

मंत्र में (यःस्वर्गः) कहकर समझाया कि अंतःकरण में ज्योति का प्रकट होना और सदा सुखमय जीवन व्यतीत करना, यह पृथ्वी का स्वर्ग है। अतः पृथ्वी पर यहां नारी विदुषी, पुरुष विद्वान है, धन, संपदा और ऐश्वर्य है, गृहस्थ में यज्ञ कर्म होते हैं, हर समय ईश्वर का नाम बोला जाता है, जो गृहस्थ दुःख और बीमारियों से परे है, प्रसन्नता का वातावरण है, जो गृहस्थ, आलसहीन, पुरुषार्थी है, तो वह गृहस्थ पृथ्वी पर स्वर्ग है और ऐसी ऐश्वर्ययुक्त अवस्था जहां बनी रहती है उसे ही सुरेंद्र लोक अथवा स्वर्ग कहते हैं। सुरेंद्रलोक का आश्रय लेकर ही ऋषि-मुनि ब्रह्मलीन होकर दिव्य स्वर्गलोक को प्राप्त करके दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं। सुर का अर्थ भी देव है, देव वह है जो वेद विद्या का आश्रय लेकर यज्ञ एवं अष्टांग योग की कठोर साधना करके विषय विकारों का नाश करता हुआ पृथ्वी पर ही गृहस्थादि आश्रम में रहते हुए ऊपर कहे दिव्य गुणों को प्राप्त करता है। ऐसी अवस्था वाले सुर को ही इंद्र कहते हैं।

ऋगवेद मंत्र 9/12/2 व सामवेद मंत्र 1331 में ऐसे सुखों को भोगने वाले को ( इंद्र सोमस्य पीतयो) कहा है। यहां इंद्र का अर्थ योगाभ्यास आदि द्वारा इंद्रियों को जीतने वाले, साधक को कहा है। ऐसा साधक ही सोमपान अर्थात आनंद का अनुभव करता है। श्रीकृष्ण महाराज जी का भाव है कि गृहस्थादि आश्रम में साधक वेद विद्या को ग्रहण करता हुआ यज्ञ, योगाभ्यास आदि साधना करता है, तो वह पृथ्वी पर सुर इंद्र लोकम अर्थात एक सुख ऐश्वर्यपूर्वक गृहस्थादि आश्रम का निर्माण करता है। एक समय वह अपनी साधना से सोमपान करता है अर्थात  धर्ममेघ समाधि प्राप्त करके स्वयं देव/देवता बनकर दिव्य भोगों को भोगता है। यही सुरेंद्र लोक का आश्रय है। यदि पृथ्वी पर कोई तपस्या द्वारा सुरंेद्रलोक का निर्माण नहीं भोगेगा।                                  – क्रमशः

 

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