गुणों से भरपूर है संगीत

संगीत अर्थात जो सुनने में प्रिय लगे, जिससे आनंद की अनुभूति हो। ऐसा आनंद जिसमें शरीर तो आनंदित हो परंतु आत्मा भी आनंद से झूम उठे, उसे ही संगीत कहते हैं। कहते भी हैं साहित्य, संगीत और कला से रहित मनुष्य साक्षात पशु के समान होता है। संगीत जो कानों को अच्छा लगे। वह नहीं जो आजकल का संगीत, जिस गति से आ रहा है उसी गति से विलुप्त भी हो रहा है। आजकल के संगीत को बार-बार सुनकर एक प्रकार का ऊबाउपन आ जाता है। संगीत तो वह है जब सुनो तभी स्फूर्तिमय बना दे। संगीत एक औषधि भी है जो मानसिक तनाव को दूर करता है। इसके साथ-साथ शरीर में एक नई ऊर्जा भी देता है। संगीत एक ऐसी शक्ति है जिससे प्रभावित होकर बादल स्वयं बरसने लगते हैं, दीप जलने लगते हैं, संगीत शास्त्र में इन्हें राग कहा गया है। वैसे देखा जाए तो समाज में संगीत  की एक अहम भूमिका है, संगीत तो मनुष्य के साथ उसके बाल रूप में ही साथ चला आता है। शिशु के जन्म से लेकर पूरा जीवन उसके साथ रहता है। मनुष्य और संगीत का एक अटूट संबंध है। 

-डा. इंदिरा कुमारी, पुराना मटौर

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