जल्द बताओ, लावारिस पशुओं के लिए क्या किया

हाई कोर्ट के राज्य सरकार को आदेश, गोसदनों-पशु अभ्यारण्य पर मांगा जवाब

शिमला  – प्रदेश  हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए कि वह शपथपत्र के माध्यम से अदालत को बताए कि आवारा पशुओं के  रखरखाव के लिए पशु अभ्यारण्य/गोसदन/ पशुशाला बनाए जाने के बारे में क्या कदम उठाए गए हैं। मुख्य न्यायाधीश एल नारायण स्वामी और न्यायमूर्ति धर्मचंद चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किए। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि राज्य आवारा पशुओं की समस्या से जूझ रहा है, क्योंकि बूढ़े या अनुत्पादक होने पर लोग अपने मवेशियों को छोड़ देते हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि हिमाचल प्रदेश  में लगभग 32000 आवारा मवेशी हैं, जिन्हें  राज्य  की संकीर्ण पहाड़ी सड़कों पर और राष्ट्रीय राजमार्गों पर घूमते हुए देखा जा सकता है, जिससे हर साल सैकड़ों दुर्घटनाएं होती हैैं। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि सर्दियों के मौसम को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार को राजमार्गों से मवेशियों को हटाने के लिए कुछ तत्काल उपाय करने चाहिएं ताकि आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जा सके। गौरतलब है  कि राज्य सरकार द्वारा आवारा पशुओं के रखरखाव के लिए हिमाचल प्रदेश गोवंश संरक्षण और संवर्द्धन अधिनियम-2018 बनाया गया है। इस अधिनियम के तहत प्रदेश के हर जिला में पशु अभ्यारण्य स्थापित किए जाएंगे, जहां पर आवारा पशु, खासतौर पर गाय को सुरक्षित रखा जाएगा। सरकार द्वारा अधिनियम के नियमों के अनुसार सिरमौर,  सोलन, ऊना और हमीरपुर में पशु अभ्यारण्य बनाने के लिए उचित राशि जारी कर दी गई है और प्रदेश के अन्य जिलों में पशु अभ्यारण्य बनाने के लिए भूमि तलाश की जा रही है। हाई कोर्ट ने अपने पिछले आदेशों में राज्य सरकार को आदेश दिए थे कि वह सुनिश्चित करे कि हर पशु अभ्यारण्य में सारी मुलभुत सुविधाए हों।

यहां से शुरू हुआ मामला

वर्ष 2014 में न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर ने प्रार्थी भारतीय गोवंश रक्षण परिषद हिमाचल प्रदेश द्वारा जनहित में दायर याचिका राज्य सरकार को आदेश दिए थे कि प्रदेश की सभी सड़कों को 31 दिसंबर, 2014 तक आवारा पशु मुक्त बनाया जाए। अदालत ने राज्य सरकार, नगर परिषद, नगर पंचायत, नगर पालिका और ग्राम पंचायतों को आवारा पशुओं के लिए गोसदन और गोशालाएं बनाने के भी आदेश दिए थे। अदालत ने पशुपालन विभाग को आदेश दिए थे कि पशुओं को टैग लगाए जाएं। अदालत ने इन आदेशों की अक्षरशः अनुपालना के लिए प्रदेश के मुख्य सचिव को जिम्मेदार ठहराया था। हाई कोर्ट के इस निर्णय को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेशों पर स्थगन आदेश पारित किए थे। प्रार्थी ने  हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेशों की अनुपालना के लिए जनहित में याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2014 में पारित आदेशों की अनुपालना करने में राज्य सरकार नाकाम रही है।

You might also like