झांसी की रानी से कम नहीं थी रानी खैरीगढ़ी

गंगाराम राजी मो.-9418001224

पुरस्कृत साहित्यकारों की रचनाधर्मिता – 1

हाल ही में हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने साहित्यकार गंगाराम राजी, बद्री सिंह भाटिया, प्रो. केशव राम शर्मा, इंद्र सिंह ठाकुर, प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल तथा सरोज परमार को साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित करने की घोषणा की। इन साहित्यकारों की पुरस्कृत रचनाओं के प्रति रचनाधर्मिता क्या रही, संघर्ष का जुनून कैसा रहा, अपने बारे में साहित्यकारों का क्या कहना है तथा अन्य साहित्यकार व समीक्षक इनके बारे में क्या राय रखते हैं, इसी का विश्लेषण हम इस नई सीरीज में कर रहे हैं। पेश है इस विषय में प्रतिबिंब की पहली किस्त:

मोहन राकेश जी ने अपने नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ में एक चरित्र निक्षेप से कहलवाया है – ‘‘ योग्यता एक चौथाई व्यक्तित्व का निर्माण करती है, शेष पूर्ति प्रतिष्ठा द्वारा होती है … ’’ आज मुझे मालूम हुआ कि वास्तव में मनुष्य की प्रतिष्ठा राजकीय या बड़े महत्त्वपूर्ण सम्मानों से होती है। इससे पहले मुझे कोलकाता, जयपुर, गहमर (उत्तर प्रदेश) व मुंबई से भी भव्य सम्मान मिला है, लेकिन जितना संतुष्ट और आनंदित अपने प्रदेश के व्यक्तियों के मध्य में हुआ, उतना दूसरे प्रदेश के व्यक्तियों में नहीं। मैं अकादमी द्वारा पुरस्कृत होने पर प्रसन्नता महसूस कर रहा हूं। ‘एक थी रानी खैरीगढ़ी’ को लिखने के पीछे जो प्रेरणा रही है, वह मैं सबके साथ सांझा करने जा रहा हूं। मेरे मन में बहुत पहले से उन शहीदों के बारे में लिखने की इच्छा जागृत हुई थी जिनका नाम काल की धूल से दब गया है। स्वतंत्रता आंदोलन में एक नारा लगाने वाले का योगदान भी कम नहीं आंका जा सकता। इस महान यज्ञ में जिन तथाकथित छोटे से छोटे कार्यकर्ताओं ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया, वे भी उसी प्रकार गौरव के अधिकारी हैं, वंदनीय हैं जिस प्रकार से दूसरे बड़े नाम वाले। यह सारी बातें मेरे दिमाग में घर कर गई थीं कि हमारी वर्तमान पीढ़ी जो इन बातों से दूर जा रही है, उन्हें अपने इतिहास से रू-ब-रू तो होना चाहिए, यही बात मुझे इस ऐतिहासिक उपन्यास को लिखने के लिए प्रेरित करती रही। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की प्रासंगिकता ब्रिटिश, फ्रांसीसी, रूसी, चीनी, क्यूबाई और वियतनामी क्रांतियों के साथ उल्लेखित होती है। इस आंदोलन के कुशल नेतृत्व के कारण एक बेहद शक्तिशाली औपनिवेशिक साम्राज्य को घुटने टेकने के लिए विवश होना पड़ा था। मंडी जिले का योगदान भी इस आंदोलन में आहुति डालने के लिए कम नहीं रहा था। रानी खैरीगढ़ी का चरित्र एक समाज सेवी, मानव हिताय और अपने देश के प्रति प्रेम का रहा है और इसी परंपरा में रानी ने अपना कर्त्तव्य स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बखूबी निभाया है, जिसके लिए उन्हें अपने पति राजा भवानी सेन से भी दो-दो हाथ करने पड़े थे। यह चरित्र युगों-युगों तक श्रद्धा से याद करने का है जिसे अधिकांश मंडी के लोग ही नहीं जानते हैं। मेरे मन में इन चरित्रों को नई पीढ़ी के आगे लाने की इच्छा थी और मैंने अपने साथियों की मदद से इसे पूरा किया। मुझे खुशी हुई है कि पाठकों ने इसे खूब सराहा ही नहीं, मैंने मंडी की जनता में नाम भी खूब कमाया। मैं जहां भी किसी से मिलता, इस उपन्यास की बात जरूर होती। हिमाचल अकादमी ने भी मेरे उपन्यास और मेरे परिश्रम को पहचाना और मुझे यह सम्मान मिला। हमारे स्वतंत्रता के आंदोलन में कुछ पात्र गौण तो रहे हैं जो आज तक सामने नहीं आए, परंतु उनका काम महत्त्वपूर्ण था। मंडी जिला के सिद्धु खराड़ा, जवाहर सिंह, ज्वाला सिंह, बदरी नाथ, पंडित शारदा राम, लौंगू राम, दलीप सिंह आदि नाम हैं जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते हैं। लोग केवल हरदयाल, हरदेव और रानी खैरीगढ़ी को ही जान पाते हैं। रानी खैरीगढ़ी का चरित्र उसी तरह का है जैसे रानी झांसी का। आप उपन्यास में इन सभी चरित्रों से भली-भांति मिल पाएंगे। ऐसा नहीं है कि राष्ट्र कुछ लोगों के कारण ही स्वतंत्र हुआ हो, इसके पीछे हर उस चरित्र का हाथ रहा है जो अपने सिर पर कफन बांध कर जनसमूह की लड़ाई में कूद पड़ा था। इन सबमें कुछ आगे आए और कुछ अपना कर्त्तव्य बिना किसी लाग-लपेट के निभाते रहे। इस उपन्यास में इन्हीं महान हस्तियों का चित्रण है। इसमें सर्वोपरि रानी खैरीगढ़ी रही है जिसका चरित्र मुझे रानी झांसी से कम नहीं लगता था। रानी झांसी जैसी स्थिति रानी खैरीगढ़ी के सामने भी आई जिसे रानी ने अपने कौशल, हौसले, बुद्धिमत्ता और चातुर्य से सुलझाया। राष्ट्रीय आंदोलन से पहले मंडी में राजा के वजीरों के खिलाफ  एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ था और इस आंदोलन का जन्मदाता एक गांव के साधारण घर में पैदा हुआ शोभा राम था जिसने 20000 आदमियों को लेकर 1909 में मंडी के राजघराने को झकझोर दिया था। मंडी के इतिहास में यह एक महान चरित्र रहा है। यह चरित्र भी मुझे लिखने की लौ को जगाए रखता रहा। वह चाहता तो सत्ता पलट सकता था, परंतु वह अपने उद्देश्य से नहीं भटका। शोभा राम ने राज्य में जो आंदोलन चलाया वह अंग्रेजों के खिलाफ  नहीं था, वह केवल भ्रष्ट वजीर के खिलाफ था। आप इस उपन्यास में इस महान चरित्र से मिलेंगे। इस काम के लिए मेरी मदद कृष्ण चंद्र महादेविया और भाई हंसराज भारती ने की। उसके गांव के लोगों में शोभा राम के लिए मान-सम्मान अभी भी है। पुराने लोग उन्हें थानेदार के नाम से अभी भी याद करते हैं। जब लोगों से पूछा गया तो वे एक ही उत्तर देते, ‘‘ शोभा राम इस इलाके में एक ही था और अब कोई भी शोभा राम आगे पैदा नहीं हो सकता।’’ इस व्यक्ति ने ठीक ही उत्तर दिया होगा क्योंकि लगा कि नई पीढ़ी को शोभा राम की जानकारी नहीं के बराबर ही थी। मैं यह मान कर चल रहा हूं कि मैंने कुछ प्रसंगों को रोचक बनाने के लिए कल्पना का सहारा भी लिया है। परंतु मैंने ऐतिहासिक तथ्यों से कोई छेड़छाड़ नहीं की है। इस उपन्यास की जानकारी के लिए मुरारी शर्मा, धर्म पाल कपूर, कमल प्यासा, दीनू कश्यप, विजय विशाल, हेम राज शर्मा, रवि सिंह राणा शाहीन, कै. सकलानी, नूतन, मंडी जिला पुस्तकालय में कार्यरत सहायक भानु मित्तल आदि मित्रों का सहयोग रहा है और इस उपन्यास को असली रूप दिलाने में मेरी पत्नी तृप्ता राजी, जो हर पुस्तक में हाथ बंटाती रही है, इसमें भी पीछे कैसे रह सकती थी। यह सारा काम बड़ी मेहनत का और रोमांचक रहा। सब उत्साह और जोश से मेरे लिखने की रुचि को बढ़ावा ही देते रहे और मैं सफल रहा। इस खुशी को आप लोगों से सांझा करने के लिए मैं दिव्य हिमाचल का अभारी हूं।

सूचना

‘हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि और संभावना’ की अगली कड़ी को इस बार हम नहीं दे पा रहे हैं। इस बार हम हिमाचल के पुरस्कृत साहित्यकारों को लेकर नई सीरीज कर रहे हैं। रोकी गई शृंखला की अगली कड़ी आगामी अंकों में प्रकाशित की जाएगी।

-पृष्ठ प्रभारी, प्रतिबिंब

 

 

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