डेंजर ज़ोन: मेरी रचनात्मकता

Nov 10th, 2019 12:04 am

बद्री सिंह भाटिया

मो. 9805199422

मेरे द्वारा लिखित उपन्यास ‘डेंजर ज़ोन’ को हि. प्र. कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी, शिमला द्वारा 2015 के लिए कहानी, नाटक व उपन्यास विधा में पुरस्कार की घोषणा हुई है। किसी कृति को पुरस्कार की घोषणा होने से रचनाकार को प्रतीत होता है कि उसकी कृति का संज्ञान लिया गया है और उसे श्रेष्ठता के स्तर पर आंका गया है। इस उपन्यास अथवा कृति की संरचना में आठ वर्ष का समय लगा। कितनी बार लिखा, संशोधित किया, फिर लिखा। बीच में काट-छांट करते भी समय बीता। यहां तक कि अंतिम प्रूफ आने के बाद भी बीच में कुछ न कुछ जमा-घटाव होता रहा। फिर भी ऐसा डर कि क्या पता यह जो लिखा, जिसके बारे में लिखा, वह समाज की आंखों में खटकेगा भी कि नहीं। क्या यह वही यथार्थ है जो मैंने समझा और लिखा कि कहीं कुछ उसमें से छूट गया है। आज यदि कहूं तो बहुत कुछ अभी आगे लिखने को रह गया है। यह तो केवल एक भाग ही हुआ। डेंजर ज़ोन। इस उपन्यास का यह शीर्षक पहले नहीं था। कुछ और था, क्योंकि कहानी तो एक संगीतकार दंपती के घर से आरंभ होती है। उनका मिलना और उनके संबंधों के बीच किसी और का आ जाना। यह सामान्य सी बात। शायद यह भावना भी रही कि संगीतकार और साहित्यकार नौ रसों के ज्ञाता होते हैं।

संगीतकार तो और भी संवेदनशील। वह गायन हो या वादन। वे उन रसों से गुजरते कब निरस हो गए, पता ही नहीं चला। उनकी प्रेम विवाह की वह गांठ कब खुल गई, मालूम ही नहीं पड़ा। जीवन प्रवाह में दायित्व-बोझ को उठाते कब पत्नी धार्मिक बन गई और पति कब विपरीत दिशा में चला गया, मालूम नहीं पड़ा। बस इतना हुआ कि घर के स्वामी बाहर और बाहर के स्वामी (ये तथाकथित पीत अथवा भगवा वस्त्रधारी) भीतर जगह पा गए, यह भी समझ ही नहीं आया। जीवन दायित्व के निर्वाह में मिलने वाले वेतन का तोल भी उच्च-नीच करने लगा। और ऐसा लगा कि प्रेम कहीं खतरे में चला गया है। उपन्यास कथा इसी के साथ खत्म भी होनी चाहिए थी, परंतु कथानक की बांहें मुझे खींचती रही और नए आयाम देती रही। जीवन उस तरफ  भी है। सुप्रसिद्ध चित्रकार, उपन्यासकार राजकमल ने इस उपन्यास का कवर तो शीर्षक के अनुसार बनाया, परंतु उन्होंने कहा कि जब उन्हें उपन्यास की प्रति मिली तो पढ़े बिना नहीं रह सका और जनसत्ता में ‘खतरे में है प्रेम’ शीर्षक से अपना विचार प्रकट भी किया था। अलगाव दांपत्य जीवन का एक भाग भी है। नहीं बनी तो चलो अलग हो जाते हैं। इस उपन्यास में दंपती का अलगाव कानूनी नहीं। बस जीवनयापन और उस रोज-रोज के कटाक्ष या अन्य की उपस्थिति से उपजी चिढ़न का प्रतिफल और फिर पति का अपने बारे में, अपनी कला के बारे में सोच एक ऐसे स्तर पर पहुंचना जहां वह अपने प्रेम के गुंजलक में उलझा नहीं पहुंच पा सकता था। यहीं मिली उसे एक अन्य स्त्री सोनपाखी। खाना बनाने वाली के विकल्प में। गांव से अपने ही गांव-भाई के प्रेमजाल में भागी और महानगर में जीवनयापन को मजबूर। तथाकथित पति नाम का, वह प्राणी उसे महानगर तो ले आया, मगर उसे वह सब कुछ नहीं दे पाया जो उसे मिलना चाहिए था। चुनांचे बीमार और पति की परवरिश करती पत्नी। दो बच्चों की मां भी। यदि आजकल टिप्पणी करूं तो यही खाप पंचायतों की सी स्थिति। गांव लौटने का डर और शहर में खो जाने का भी। और यह भी कि जब एक लड़की एक लड़के से प्रेम करती है तो वह चांद-तारों के सपने संजोती है, मगर जब धरातल पर उतरती है तो जीवन की अगली कड़ी में क्या मिलता है, वह दिल मसोस कर रह जाती है। मणिकांत (उपन्यास का पात्र) के घर उसे सुरक्षा ही नहीं मिली। उसके शील की रक्षा भी और रहने के लिए आश्रय भी। बच्चों के लिए शिक्षा का प्रबंध भी। चूंकि मणिकांत एक संगीतकार था, इसलिए उसके घर पर हो रही साप्ताहिक संगीत सभाओं से उसे अपने भीतर की संगीत कला को भी उभार मिला। ईर्ष्या तुम्हारा दूसरा नाम स्त्री है। यह कहावत मणिकांत के घर पर भी चरितार्थ हुई। शांता (मणिकांत की पत्नी) इस अवस्थिति को परखती है। और समझती है कि उसका प्रेम ही नहीं, घर भी खतरे में है। बीमार पति की अंतिम इच्छा कि वह अपने गांव में जाए। वह सोनपाखी को एक बार फिर वापसी की ओर लौटने को प्रेरित करता है और वह लौटती भी है। जो जैसा उसके साथ होना था, हुआ। और समाज से मुकाबला। उसका संघर्ष काम आया और वह गांव में ही रहने लगी। पहाड़ी गांव और बदलते परिदृश्य में सीमेंट उद्योग के लिए अधिकृत की गई जमीनें एवं लोगों का संघर्ष। घर-परिवार से परित्यक्त वह जीवनयापन के लिए एक छोटी दुकान आरंभ करती है। समाज का विद्रोह और उसके बावजूद उसका पहले महिला शोषण के विरुद्ध खड़े होना और फिर जमीन की उद्योगपतियों की लूट के संघर्ष में एक दिन आंदोलन का नेतृत्व करते जख्मी हो जाना। स्त्री के भीतर की शक्ति, नेतृत्व की भावना और खतरे में जीवन को ऐसे ही प्रकट किया गया है जैसे किसी सीमेंट उद्योग के खनन क्षेत्र में एक परिक्षेत्र होता है जिसे डेंजर ज़ोन कहा जाता है। यह लिखित में तो नहीं परंतु अमूमन घोषित ही होता है कि इस परिक्षेत्र में न जाया जाए। विशेषकर तब जब भू-ब्लास्ट होता है। ब्लास्ट से एक भूकंप सा आता है और उससे उठे पत्थर कहीं भी पड़ सकते हैं, कोई मर भी सकता है। इस ज़ोन में रास्ते हो सकते हैं, खेत हो सकते हैं या घासनी भी। आंदोलन को सदैव दबाया जाता है। इस उपन्यास में भी दबाया गया। सरकारी पक्षधरता का दोगला रूप और उद्योगपतियों के दलालों और भक्तों का रूप सामने आता है। यही वह डेंजर ज़ोन है जहां आदमी की बेचारगी दिखती है। वह मुंह में श्वानअस्थि लिए जुगाली कर रहा होता है। हंस रहा होता है। एक खतरा आदमी के जीवन में और आता है। जब वह गांव छोड़ महानगर या दूरस्थ जगह पर जीवनयापन करने लगता है और लौट नहीं पाता। यदि वह कभी लौटता है तो उसके रिश्तेदार, पटवारी और राजस्व के धनलोलुप लोग यह साबित करवाने को प्रेरित करते हैं कि अमुक स्थल कभी तुम्हारी जन्मभूमि भी रहा। और फिर अंततः रिश्तों के आपसी संकट। अपनों के अलगाव। और समाज का एक और चेहरा। घृणा के स्वर इस उपन्यास के वे सब अंग हैं जो आज भी आपको यत्र-तत्र मिल ही जाएंगे। आपको लगेगा कि यह तो हमारा देखा, सुना है।

यही आदमी का वह परिक्षेत्र है जिसे बचाने की आवश्यकता है। रूप सिंह चंदेल (विपाशा पत्रिका में) और अश्विनी भमौता जैसे समीक्षकों ने अपनी राय देकर इस उपन्यास के भीतर के सच को पाठकों के सामने लाया भी है। कुछ विश्वविद्यालयों के छात्रों ने इसे अपने एमफिल और पीएचडी के शोधों के लिए भी चयन किया है। हेम राज कौशिक जी ने भी इस उपन्यास पर लिखा है। यही मेरा श्रमफल भी है। मैं अपनी कृतियों के बहु प्रचार या समीक्षा के पक्ष में अधिक चिंतित नहीं रहा। आलोचकों के प्रति भी ज्यादा ध्यान नहीं देता। मुझे एक आलोचक ने कहा था कि हमारे अपने समीक्षक और आलोचक होने चाहिए। परंतु मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि किसी आलोचक को कहूं कि आप इसकी आलोचना लिखें। यदि वह सही आलोचक है तो उसे समसामयिक कृतियों से होकर गुजरना होगा। उसे मित्रमंडली में ही गोलाकार घूम कर आलोचक कहलाने का हक कोई देता है तो दे। इस सबके बावजूद मैंने कतिपय आलोचकों (नाम नहीं लेना चाहता) को अपनी कुछ पुस्तकें भेजी भी थीं। परंतु वहां से पावती भी नहीं आई। मेरी कृति को पुरस्कार मिला, इससे खुश होना तो स्वाभाविक है। उम्र के इस पड़ाव पर आकर अति उल्लासित होना जंचता भी नहीं। परंतु इस बात का पक्षधर हूं कि अकादमी और भाषा विभाग द्वारा दिए जा रहे पुरस्कारों की यह परंपरा जारी रहनी चाहिए।

बद्री सिंह भाटिया पर विद्वानों के विचार

‘हिंदी कथा साहित्य का एक सुपरिचित नाम…उनका साहित्य जितना स्पृहणीय है उतना ही उनका व्यक्तित्व भी…कहानी के क्षेत्र में अपनी किस्सागोई शैली, चरित्रों की वास्तविक उपस्थिति और लोक जीवन के आकर्षक चित्रण के कारण वरिष्ठ कथाकार बद्री सिंह भाटिया ने जो स्थापना प्राप्त की है वह अक्षुण्ण है। ‘पड़ाव’ के बाद भाटिया जी का दूसरा उपन्यास ‘डेंजर ज़ोन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। भाषा, शिल्प और कथा-विधान में यह कृति उनके कृतित्व का उत्कृष्ट अवदान है।’

-रूप सिंह चंदेल, समीक्षक

‘दाम्पत्य संबंधों में पूर्ण-अपूर्ण, सम-विषम, सहज-जटिल निहितार्थों की खोज और स्त्री के मानवीय गुण-दोष के साथ उसके चरम विकास की कथा सृजन बद्री सिंह भाटिया ने अपने उपन्यास ‘डेंजर ज़ोन’ में किया है। खोज दोनों स्तरों पर जारी रहती है। मानसिक और दैहिक। शांता, जो पति मणिकांत की स्वाभाविक दैहिक मांग को पाश्विक करार देती है, शरीर और मन की संतुष्टि को भिन्न आयाम देकर विश्लेषित करती है तो दूसरी ओर वही शांता मनोज के साथ एक दिन के परस्पर संसर्ग में चरम आनंद को प्राप्त कर लेती है। मणिकांत को शांता की मात्र देह मिली, मनभेद और वैचारिक विषमताओं के कारण कामक्रीड़ा में परम तुष्टि का बिंदु कभी नहीं हुआ।’

 -राज कमल, समीक्षक

Himachal List

Free Classified Advertisements

Property

Land
Buy Land | Sell Land

House | Apartment
Buy / Rent | Sell / Rent

Shop | Office | Factory
Buy / Rent | Sell / Rent

Vehicles

Car | SUV
Buy | Sell

Truck | Bus
Buy | Sell

Two Wheeler
Buy | Sell

Polls

क्या आपको सरकार की तरफ से मुफ्त मास्क और सेनेटाइजर मिले हैं?

View Results

Loading ... Loading ...


Miss Himachal Himachal ki Awaz Dance Himachal Dance Mr. Himachal Epaper Mrs. Himachal Competition Review Astha Divya Himachal TV Divya Himachal Miss Himachal Himachal Ki Awaz