तिब्बत में छिपा है तंत्र ज्ञान

उसके मर्मभेदी आक्रमण से मैं आहत हो गया। ‘कुछ सिद्ध करने को है। मैं साथ दूंगी।’ वह और समीप आ गई। पथरा-सा गया मैं। चैत्य में गहरा सन्नाटा था। हम दोनों सर्वथा एकांत में थे, पर तंत्र में रुचि रखने के बावजूद परंपरागत संस्कारों के कारण विश्व-मित्र बनने का प्रश्न ही नहीं था। मैं धीरे-से मुस्करा दिया। ‘अच्छा, ठीक है।’ जिसी की सांसें गरम थीं…

-गतांक से आगे…

उसके मर्मभेदी आक्रमण से मैं आहत हो गया। ‘कुछ सिद्ध करने को है। मैं साथ दूंगी।’ वह और समीप आ गई। पथरा-सा गया मैं। चैत्य में गहरा सन्नाटा था। हम दोनों सर्वथा एकांत में थे, पर तंत्र में रुचि रखने के बावजूद परंपरागत संस्कारों के कारण विश्व-मित्र बनने का प्रश्न ही नहीं था। मैं धीरे-से मुस्करा दिया। ‘अच्छा, ठीक है।’ जिसी की सांसें गरम थीं। शायद वह बेतरह झुलस रही थी। ठंडक के लिए व्याकुल थी। ‘रात खूब हो गई है। सब सोया है।’ उसने परोक्ष प्रोत्साहन दिया। ‘हां। तुम भी सो जाओ।’ ‘सो जाऊं, पर नींद नहीं…।’ ‘आ जाएगी। प्रयत्न तो करो। जाओ, सो जाओ।’ जिसी ने पत्थर को भी पानी कर देने वाली मादक दृष्टि से देखा। एक बारगी मैं सिहर गया। फिर पसीना आ गया। मैंने कसकर मुट्ठियां भींच लीं। ‘हां, तुम भी सो जाओ। मुझे भी नींद आ रही है।’ मैं चादर तानकर लेट गया। जिसी ने अंतिम वार किया। जरा-सी चादर खींचकर अपना चेहरा एकदम पास लाकर बोली-‘नींद आ गया।’ ‘हां।’ मैंने चादर से कसकर मुंह ढांप लिया। जिसी भारी मन से ठंडी सांस लेकर चली गई। वह…चली गई तो अपने को धिक्कारने लगा। उफ, कैसा स्वर्ण अवसर…कैसी बर्फ-सी धवल-नवल गदराई देह, उन्मत यौवन…पर दांत-पर-दांत कस लिए। तंत्र के क्षेत्र में जब पहला कदम रखा था, तब की प्रतिज्ञा का स्मरण हो आया, मैली साधना नहीं, मैला काम नहीं। धीरे-धीरे मन को बड़ी शांति मिली। मन पर विजय पाने का कैसा अद्भुत सुख मिलता है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रखा था। पराजय में अहा बड़ा सुख मिलता है। बड़ा रस, बड़ा आनंद, किंतु क्रिया समाप्ति के उपरांत उत्पन्न ग्लानि, पश्चाताप, लज्जा, छिः छिः। मन तब स्वयं को किस तरह धिक्कारता है और आत्मबल आहत हो जाता है। आहत आत्मबल पराजय की ओर ले जाता है। जाने कब, शायद इसी अवर्णनीय संतोष के कारण निद्रा आ गई। आंख खुली तो देखा, जिसी गरम कहवा लिए खड़ी थी। तिब्बती भेड़ के दूध का कहवा, अजीब ही स्वाद था। ‘कहवा लो।’ वह बोली। ओस से नहाए श्वेत कमल पुष्प-सा उसका चेहरा खिला था। होंठों पर शरारत थी। वह कहवा रख गई। जाते-जाते कहती गई-‘आदमी नई पत्थर से मुलाकात होया।’ मैं मुस्कराकर बाहर आ गया। बड़ी प्यारी धूप थी। कुछ देर में सभी आवश्यक कार्यों से निबट गया। तब डोलमा आ गया। ‘आइए।’ कहकर वह मुझे अपने साथ गोम्फा में ले गया। गोम्फा का मुख्य प्रवेश द्वार काफी बड़ा और भारी था। लकड़ी का बना था। उस पर बड़े-बड़े अजगर बने थे और बीचोंबीच दांत निकाले भैरव की भयानक मूर्ति थी।                    

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